सौरी-दशा ब्रह्म लोक का द्वार है

बिखरे मोती-भाग 209

गतांक से आगे….
अब प्रश्न पैदा होता है आत्मा शरीर से निकलता कैसे है? मुक्तात्मा के लिए सुषुम्णा नाड़ी, जो काकू में से गुजरकर, कपाल को भेदकर , बालों का जहां अंत है, वहां से जाती है। यह सुषुम्णा नाड़ी आत्मा के शरीर में से निकलने का मार्ग है। इस प्रकार जो मुक्तात्मा होता है वह कपालों को भेदकर शरीर से बाहर निकल जाता है। साधारण पुरूष का आत्मा हृदय की रश्मि रूपी नाडिय़ां के माध्यम से निकल जाता है। ये नाडिय़ां आंख, कान, नाक, मुख आदि सभी इन्द्रियों को गई हैं। आत्मा जिस विषय में जीवन भर रमा रहा होता है, उसी विषय की नाड़ी से उसी द्वार से निकल जाता है। ब्रह्म का उपासक ‘ओ३म्’ का उच्चारण करता हुआ ऊपर से प्रयाण करता है। इधर इसका मनस्तत्तव क्षीण होता है और वह आदित्य लोक को पहुंच जाता है सौरी दशा को प्राप्त होता है। यह सौरी-दशा ब्रह्म लोक का द्वार है-ब्रह्मज्ञानी इस द्वार में से निकल कर ब्रह्म लोक में पहुंच जाते हैं, दूसरे यहां रूक जाते हैं। सौरी-दशा के संदर्भ में गीता के आठवें अध्याय के 23 से 26 तक श्लोक पढ़ें जो लोग जीवन में आत्मा का हनन करते हैं अर्थात पाप करने के लिए आत्मा का गला घोंटते हैं वे असूर्य लोकों में जाते हैं अर्थात ऐसे लोकों में जाते हैं जहां सूर्य के प्रकाश की किरण तक नहीं पहुंच पाती है। संक्षेप में कहें तो पुण्य कार्य करने से हृदय में बैठे हुए आत्मा को ‘उदान’ नाम का प्राण ‘पुण्य-लोक’ में ले जाता है, पाप-कर्म करने से आत्मा को ‘उदान’ ‘पाप-लोक’ में ले जाता है और दोनों प्रकार के कर्म करने से आत्मा को उदान ‘मनुष्य लोक’ में ले जाता है (तैैत्तिरीय उपनिषद 1-6 ऐतरेय उपनिषद 1-3-12)
अब चौथा प्रश्न है-आत्मा के साथ क्या जाता है? इस गूढ़ प्रश्न का उत्तर प्रश्नोपनिषद् का ऋषि इस प्रकार देते हैं-”मृत्यु के समय जिस प्रकार का चित्त होता है, उसी प्रकार का चित्त ‘प्राण’ के पास पहुंचता है। प्राण अपने तेज के साथ आत्मा के पास पहुंचता है। ‘प्राण’ ही ‘तेज’ चित्त और आत्मा को अपने संकल्पों के अनुसार के लोक में ले जाता है (इसी संदर्भ में गीता के अध्याय में कहा गया है-अंत मति सो गति)
अब इस बात पर भी विचार करें-ये तेज चित्त आत्मा क्या है? इन तीनों का प्राण के साथ क्या संबंध है? प्राण की दो शक्तियां हैं-शारीरिक तथा मानसिक। प्राण की शारीरिक शक्ति उसका तेज है, प्राण के तेज से ही तो शरीर क्रियाशील रहता है। प्राण की मानसिक शक्ति उसका ‘चित्त’ है। इस चित्त के द्वारा ही संकल्प विकल्प होते हैं, इस चित्त में ही विद्या (ज्ञान) कर्म और पूर्व-प्रज्ञा अर्थात पहले जन्मों की प्रजा (बुद्घि, वासना-स्मृति-संस्कार) रहती है, जो मृत्यु के समय आत्मा के साथ जाते हैं। ध्यान रहे शरीर से कूच करते समय ‘प्राण’ अपने ‘तेज’ और चित्त को साथ लेकर चलता है, परंतु इस शरीर में रहते हुए जिसका जैसा तेज और चित्त हो चुका होता है, वह वैसे ही लोक में जाता है इसलिए मनुष्य को चित्त की पवित्रता कर्म शुद्घि और भावशुद्घि के प्रति सर्वदा सतर्क रहना चाहिए। चित्त को कभी मैला न होने दें।
 जिस समय प्राण निकलते हैं तो आत्मा भी साथ-साथ कूच करती है क्योंकि आत्मा और प्राण मनुष्य की छाया की तरह साथ-साथ रहते हैं। इस प्रकार प्राण शरीर से कूच करते हुए अपनी शारीरिक शक्ति (तेज) मानसिक शक्ति (चित्त) तथा आत्मिक शक्ति (आत्मा) इन तीनों आधारों को साथ लेकर चल देता है।
क्रमश:

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