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श्रीराम की सेना के प्रमुख बीर- सहचर और सखा

डॉ. राधे श्याम द्विवेदी
राम में विष्णु का आधा अंश था। भरत में विष्णु का एक चौथाई अंश था। लक्ष्मण और शत्रुघ्न में विष्णु का
एक आठवां -एक आठवां अंश रहा है। इसी अनुपात में इनमें दैवी गुणों का प्रस्फुटन हुआ है। जहां त्रेता युग के भगवान राम भगवान विष्णु के अंश थे। वहीं लक्ष्मण शेष नाग के अवतार थे । भरत गरुण और सुदर्शन चक्र के अवतार थे तथा शत्रुघ्न पांचजन्य शंख के अवतार थे।
लक्ष्मण राम के शाश्वत प्रधान योद्धा :-
दशरथ तथा सुमित्रा के पुत्र, उर्मिला के पति लक्ष्मण प्रधान योद्धाओं में शामिल थे।राम को वनवास मिलने के बाद उनकी रक्षा के लिए छोटे भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता भी जंगल चले गए, लेकिन वहां भाई और भाभी की रक्षा के लिए लक्ष्मण जी नींद पर विजय प्राप्त कर पूरे 14 साल तक जागते रहे.वे संसार के सबसे बड़े सुरक्षा सेवक रहे।
भक्ति और आदर्श भ्रातृप्रेम से सराबोर भरत :-
भरत हिंदू धर्म के पूजनीय देवता श्रीराम के भाई थे।
भरत का चरित्र समुद्र की भाँति अगाध है, बुद्धि की सीमा से परे है। लोक-आदर्श का ऐसा अद्भुत सम्मिश्रण अन्यत्र मिलना कठिन है। भ्रातृ प्रेम की तो ये सजीव मूर्ति थे।
भरत ने गुरु वसिष्ठ की आज्ञा से पिता की अन्त्येष्टि क्रिया सम्पन्न की। सबके बार-बार आग्रह के बाद भी इन्होंने राज्य लेना अस्वीकार कर दिया और दल-बल के साथ श्री राम को मनाने के लिये चित्रकूट चल दिये। भरत के समान शीलवान भाई इस संसार में मिलना दुर्लभ है। अयोध्या के राज्य की तो बात ही क्या ब्रह्मा, विष्णु और महेश का भी पद प्राप्त करके श्री भरत को मद नहीं हो सकता। श्री
रामभक्ति और आदर्श भ्रातृप्रेम के अनुपम उदाहरण श्री भरत धन्य हैं।
मौन सेवाव्रती शत्रुघ्न :-
शत्रुघ्न अयोध्या के राजा दशरथ के चौथे पुत्र और राम के छोटे भाई थे। सुमित्रा से लक्ष्मण एवं शत्रुघ्न उत्पन्न हुए थे। शत्रुघ्न ने मधुपुरी (आधुनिक मथुरा) के शासक लवणासुर को मारकर उसे फिर से बसाया था। शत्रुघ्न कम से कम बारह वर्ष तक मधुपुरी नगरी एवं प्रदेश के शासक रहे।
शत्रुघ्न का चरित्र अत्यन्त विलक्षण था। ये मौन सेवाव्रती थे। बचपन से भरत का अनुगमन तथा सेवा ही इनका मुख्य व्रत था। ये मितभाषी, सदाचारी, सत्यवादी, विषय-विरागी तथा भगवान श्री राम के दासानुदास थे। जिस प्रकार लक्ष्मण हाथ में धनुष लेकर राम की रक्षा करते हुए उनके पीछे चलते थे, उसी प्रकार शत्रुघ्न भी भरत के साथ रहते थे।
राम की सेना के प्रमुख बीर सहचर सखा:-
भक्तमाल के बीसवें छ्न्द में नाभादास ने राम के सहचर वर्ग को इस प्रकार गिनाया है।
दिनकर सुत हरिराज बालिबछ केसरि औरस।
दधिमुख द्विविद मयंद रिच्छपति सम को पौरस।।
उल्का सुभट सुषेन दरीमुख कुमुद नील नल।
सरभ रु गवै गवाच्छ पनस गन्धमादन अतिबल।।
पद्म अठारह यूथपति रामकाज भट भीर के।
सुभ दृष्टि वृष्टि मो पर करौ जे सहचर रघुबीर के।।
उक्त सूची के अलावा अन्यानेक सहचर और बीरों का नाम भी मिलता।कुछ की कुछ सूचनाएं भी मिलती है और कुछ का केवल नाम ही मिलता है। ये सब किसी ना किसी देव के अंश से उत्पन्न हुए थे। ब्रह्मा जी के आदेश से इन लोगों ने बानर और रीक्ष का शरीर रामकाज के लिए धारण किया था। इनमें अथाह बल था। भगवान इन सबको अपना सखा मानते थे। इनकी प्रशंसा करते हुए राम गुरुदेव वशिष्ठ से कहते हैं —
ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे।
भए समर सागर कहँ बेरे।।
मम हित लागि जन्म इन्ह हारे।
भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे।।
इन सहचरों का भी प्रभु पर इतना प्रेम था कि वे लोग जी जान से युद्ध करने पर भी इसे प्रभु की सेवा में तुच्छ कार्य भी नहीं गिनते। भगवान द्वारा प्रशंसा किए जाने पर वे कहते हैं —
सुनि प्रभु बचन लाज हम मरही।
मसक कहूं खग पति हित करहीं।।
सुग्रीव की आज्ञा के अनुसार लंका पर चढ़ाई करते समय बड़े-बड़े वानर वीर माल्यवान पर्वत लक्ष्मण आदि के साथ बैठे हुए भगवान श्रीराम के पास पहुँचने लगे। तुलसी दासजी कहते हैं कि उस सेना में 18 पद्म तो यूथपति ही थे। श्री राम प्रमुख सहयोगी जैसे सुग्रीव, हनुमान, अंगद, जामवंत, नल और नील से तो सभी परचित हैं वानर सेना में वानरों के अलग अलग झूंड थे। हर झूंड का एक सेनापति होता था जिसे यूथपति कहा जाता था। यूथ अर्थात झूंड। लंका पर चढ़ाई के लिए सुग्रीव ने ही वानर तथा ऋक्ष सेना का प्रबन्ध किया था। नल, नील, अंगद, क्राथ, मैन्द तथा द्विविद के द्वारा सुरक्षित हुई वह विशाल वानर सेना श्रीरामचन्द्र जी का कार्य सिद्ध करने के लिये आगे बढ़ती जा रही थी। जहाँ फल-मूल की बहुतायत होती, मधु और कन्द-मूल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते तथा जल की अधिक सुविधा होती, ऐसे कल्याणकारी और उत्तम विविध पर्वतीय शिखरों पर डेरा डालती हुई वह वानर सेना बिना किसी विघ्न-बाधा के खारे पानी के समुद्र के निकट जा पहुँची। असंख्य ध्वजा-पताकाओं से सुशोभित वह विशाल वाहिनी दूसरे महासागर के समान जान पड़ती थी। सागर के तटवर्ती वन में पहुँचकर उसने अपना पड़ाव डाला।
हनुमान:-
सुग्रीव के मित्र और वानर यूथ पति। प्रधान योद्धाओं में से एक। ये रामदूत भी हैं। हनुमान एक दिव्य वानर साथी और भगवान राम के भक्त हैं। हनुमान महाकाव्य के केंद्रीय पात्रों में से एक हैं। वह एक ब्रह्मचारी (जीवन भर ब्रह्मचारी) और चिरंजीवी में से एक है। उन्हें शिव के अवतार के रूप में वर्णित किया गया है।
सुग्रीव :-
यह बाली का छोटा भाई और राम सेना का प्रमुख प्रधान सेना अध्यक्ष था । यह सूर्य के पुत्र थे ।सूर्य के सारथी अरुण इनकी जैविक मां थे। सूर्य के आदेश से उनके परम प्रिय शिष्य हनुमान इनके मंत्री थे। वानरों के राजा सुग्रीव 10,00,000 से ज्यादा सेना के साथ युद्ध कर रहे थे।भगवान् राम को सेना के पीछे का भाग सुग्रीव के नेतृत्व में था। भगवान् राम ने किष्किन्धापति सुग्रीव को परकोटे का वायव्य भाग घेरने के लिए तैनात किया था। वे 36 करोड़ यूथपतियों के साथ वहॉं स्थित थे।
विभीषण:-
विभीषण रावण का छोटा भाई था। वह खुद एक राक्षस विभीषण एक महान चरित्र का था। यह राम का प्रमुख सलाहकार भी था।जब रावण ने सीता का अपहरण किया, तो उसने रावण को सलाह दी कि वह उसे अपने पति राम को एक क्रमबद्ध तरीके से लौटा दे और तुरंत रावण ने सख्ती से मना कर दिया। जब रावण ने उसकी सलाह नहीं मानी और उसे राज्य से बाहर निकाल दिया, तो विभीषण ने रावण को छोड़ दिया और राम की सेना में शामिल हो गया। बाद में, जब राम ने रावण को हराया, राम ने विभीषण को लंका के राजा के रूप में ताज पहनाया।
अंगद: –
इंद्र के पुत्र और सुग्रीव के भाई बाली तथा तारा का पुत्र वानर यूथ पति एवं प्रधान योद्धा था। अंगद रामदूत भी था. अंगद ने युद्ध में अदुभुत साहस दिखाया. उन्होंने रावण के पुत्र नरान्तक और रावण की सेना के प्रमुख योद्धा महापार्श्व का वध किया था उसने रावण की शक्तिशाली सेना दस दिनों के अंदर ही धूल चटा दी थी.भगवान् राम को सेना के हृदय वाला स्थान अंगद को दिया गया था।साथ ही अंगद ने दक्षिणी द्वार का मोर्चा संभाल रखा था|
जामवंत:-
जाम्बवन्त रामायण के एक प्रमुख पात्र हैं। वे ऋक्ष प्रजाति के थे। काले रंग के शतकोटि सहस्र (दस अरब) रीछों की सेना के साथ वहाँ जाम्बवान रावण युद्ध में समलित हुए थे।
स्यमंतक मणि के लिये श्री कृष्ण एवं जामवन्त में नंदिवर्धन पर्वत (तत्कालीन नाँदिया, सिरोही, राजस्थान ) पर 28 दिनो तक युध्द चला था। जामवंत को जब श्रीकृष्ण के भीतर श्रीराम के दर्शन हुए तब जामंवत ने अपनी पुत्री जामवन्ती का विवाह श्री कृष्ण द्वारा स्थापित शिवलिंग ( रिचेश्वर महादेव मंदिर नांदिया ) की शाक्शी में करवाया। युद्ध मे जाम्बवन्त ने यज्ञ कूप नामक राक्षस का वध किया था। हनुमान की माता अंजना ने जाम्बवन्त को अपना बड़ा भ्राता माना था जिससे वह शिवान्श हनुमान के मामा बन गये। सुग्रीव के मित्र रीछ, रीछ सेना के सेनापति एवं प्रमुख सलाहकार जामवंत जी थे।अग्नि पुत्र जाम्बवंत एक कुशल योद्धा के साथ ही मचान बांधने और सेना के लिए रहने की कुटिया बनने में भी कुशल थे। ये रामदूत भी हैं।
नल : –
यह भगवान विश्वकर्मा के पुत्र हैं और विश्वकर्मा के समान ही शिल्पकला में निपुण हैं । सुग्रीव की सेना का वानर वीर और सुग्रीव के सेना नायक थे। वह सुग्रीव सेना में इंजीनियर भी थे। उन्होंने सेतुबंध की रचना की थी।नल और नील को ऋषियों ने श्राप दिया था कि वे जिस चीज को छुएंगे वह पानी में नहीं डूबेगी.
नील : –
यह भगवान अग्नि देव के पुत्र हैं और एक ही मां से पैदा होने के कारण नल के भाई थे। ये सुग्रीव का सेनापति थे। उनके स्पर्श से पत्थर पानी पर तैरते थे। वह सेतुबंध की रचना में सहयोग दिया था। वह सुग्रीव सेना में इंजीनियर और सुग्रीव के सेना नायक रहे। नील के साथ 1,00000 से ज्यादा वानर सेना थी।नल और नील को ऋषियों ने श्राप दिया था कि वे जिस चीज को छुएंगे वह पानी में नहीं डूबेगी.महर्षि वाल्मीकि के अनुसार नील की सेना में 10 अरब 8 लाख सैनिक थे।राजा रावण का मंत्री और वीर सेनापति प्रहसत था। युद्ध में अकम्पन की मृत्यु हो जाने के बाद रावण ने अपने वीर सेनापति प्रहस्त को युद्ध के लिए भेजा था। वानर सेनापति नील और प्रहस्त का युद्ध भी बहुत भयंकर था। नील ने एक बड़ी सी शिला उठाकर प्रहस्त के सिर पर दे मारी, जिससे उसका सिर फट गया और वह मृत्यु को प्राप्त हुआ।
शतबली :-
शतबली के साथ भी 1,00000 से ज्यादा वानर सेना थी। यह सुग्रीव के नेतृत्व में एक महान वानर था। वह सीता की खोज के लिए उत्तरी क्षेत्रों में प्रतिनियुक्त वानरों का नेता था। (वाल्मीकि रामायण, किष्किंधा कांड सर्ग 43, : पुराणिक इनसाइक्लोपीडिया)। शतबलि को 20 करोड़ योद्धाओं के साथ आग्नेय दिशा की ओर से आक्रमण करने के लिए भगवान् ने तैनात किया।
क्राथ :-
क्राथ हिन्दू मान्यताओं और पौराणिक महाकाव्य महाभारत के उल्लेखानुसार एक वानर यूथपति था।
मैन्द:-
मंद द्विविद नामक दो भाई भी सुग्रीव के यूथ पति थे। हर झूंड का एक सेनापति होता था जिसे यूथपति कहा जाता था। ये बहुत ही बलवान और शक्तिशाली थे, इनमें दस हजार हाथियों का बल था। महाभारत सभा पर्व के अनुसार किष्किन्धा को पर्वत-गुहा कहा गया है और वहां वानरराज मैन्द और द्विविद का निवास स्थान बताया गया है। ये दोनों भाई दीर्घजीवी थे। रामायण के बाद भी ये जिंदा रहे और महाभारत काल में भी इनकी उपस्थिति मानी गई थी।यह भी कहा जाता है कि एक बार महाभारत के सहदेव किष्किन्धा नामक गुफा में जा पहुंचे। वहां वानरराज मैन्द और द्विविद के साथ उन्होंने सात दिनों तक युद्ध किया था। परंतु वे उन दोनों महान योद्धाओं का कुछ बिगाड़ नहीं सके। तब दोनों वानर भाई प्रसन्न होकर सहदेव से बोले- ‘पाण्डव प्रवर! तुम सब प्रकार के रत्नों की भेंट लेकर जाओ। परम बुद्धिमान धर्मराज के कार्य में कोई विघ्न नही पड़ना चाहिये।’ मैंद (वानर) अश्विनी कुमारो के अंश से उत्पन्न हुआ था।
द्विविद:-
सुग्रीव के मन्त्री और मैन्द के भाई थे। ये बहुत ही बलवान और शक्तिशाली थे, इनमें दस हजार हाथियों का बल था। महाभारत सभा पर्व के अनुसार किष्किन्धा को पर्वत-गुहा कहा गया है और वहाँ वानरराज मैन्द और द्विविद का निवास स्थान बताया गया है। द्विविद को भौमासुर का मित्र भी कहा गया है। महाभारत सभा पर्व के अनुसार किष्किन्धा को पर्वत-गुहा कहा गया है और वहाँ वानरराज मैन्द और द्विविद का निवास स्थान बताया गया है। महाबाहु सहदेव दक्षिणापथ की ओर गये और लोक विख्यात किष्किन्धा नामक गुफा में जा पहुँचे। वहाँ सहदेव से वानरराज मैन्द और द्विविद के साथ सात दिनों तक युद्ध किया था। वे उन दोनों महान योद्धाओं का कुछ बिगाड़ नहीं सके। तब दोनों वानर भाई प्रसन्न होकर सहदेव से बोले- ‘पाण्डव प्रवर! तुम सब प्रकार के रत्नों की भेंट लेकर जाओ। परम बुद्धिमान धर्मराज के कार्य में कोई विघ्न नही पड़ना चाहिये।’ वानर यूथपति द्विविद अश्विनी कुमारो के अंश से जनमे हुए थे ।
दधिमुख:-
वानरों में वृद्ध तथा अत्यन्त पराक्रमी श्रीमान दधिमुख भयंकर तेज से सम्पन्न वानरों की विशाल सेना साथ लेकर आये। वे बड़े सौम्य, भगवत भक्त और मधुरभाषी थे।
जिनके मुख (ललाट) पर तिलक का चिह्न शोभा पा रहा था तथा जो भयंकर पराक्रम करने वाले थे। इन्हें चंद्रमा का अंश कहा जाता है। वह वानर राज सुग्रीव का मामा था। उन्हें सुग्रीव के मधुवन नामक मनोहर बाग की रखवाली का भी दायित्व भी मिला था। जब हनुमान जी ने सीता का पता लगा वापस लौटे तो बानर दल खुशी में उपवन से फल खाने , शहद पीने और बाग उजारने की सूचना सुग्रीव को दी। वह दधिमुख वीर वानर मुझे सूचित करता है कि अंगद के नेतृत्व में उन युद्ध के समान वनवासियों ने शहद पी लिया है और बाग के फल खाने के लिए हैं। जो लोग अपने मिशन में विफल रहे थे, वे इस तरह से पलायन में शामिल नहीं होते। निश्चित रूप से वे सफल रहे हैं क्योंकि उन्होंने लकड़ी को नष्ट कर दिया है। इसी कारण से उन्होंने उन लोगों को घुटनों से पकड़ लिया है जिन्होंने अपनी लीला-क्रीड़ा में बाधा डाली है और उस वीर दधिमुख का तिरस्कार किया है जिसे मैंने स्वयं अपने बाग का संरक्षक नियुक्त किया था। अंगद के नेतृत्व में उन वीर वानरों ने निश्चित रूप से मधुर वन को उजाड़ दिया है। दक्षिणी क्षेत्र की खोज करने के बाद, उनके वापसी पर इस बाग ने अपने लोलुपता को उत्तेजित कर दिया, जिसके बाद उन्होंने इसे लूट लिया और शहद पी लिया, पहरेदारों पर हमला किया और उन्हें अपने घुटनों से पकड़ लिया। अपने पराक्रम के लिए विख्यात यह मृदुभाषी दधिमुख बानर मुझे यह समाचार सुनाने आया है।
जटायु:-
महाकाव्य में एक दिव्य पक्षी और अरुण का छोटा पुत्र है। वह दशरथ (राम के पिता) के पुराने मित्र थे। जटायु को रावण ने तब मारा था जब उसने सीता के अपहरण के दौरान सीता को बचाने की कोशिश की थी। यह रामभक्त पक्षी,रावण द्वारा वध, राम द्वारा अंतिम संस्कार किया गया।
संपाति:-
संपाति राम के समर्थक थे। वह जटायु का भाई और अरुण का पुत्र था। उसने श्री राम की मदद करने के लिये अपनी दिव्यदृष्टी से सीता का पता लगाया और श्रीराम को बतलाया की सीता लंका मे है ।
निषादराज गुह :-
निषादराज गुह निषादों के राजा का उपनाम है। वे ऋंगवेरपुर के राजा थे, उनका नाम गुह था। वे निषाद समाज के थे और उन्होंने ही वनवासकाल में राम, सीता तथा लक्ष्मण को गंगा पार करवाया था। वह राम के बाल सखा थे । वे एक ही गुरुकुल में रहकर शिक्षा प्राप्त की।
उन्होंने वन गमन के समय राम का स्वागत किया था।
सुषेण वैद्य:-
रामायण आदि के अनुसार यह वरुण का पुत्र, बाली का ससुर और सुग्रीव का वैद्य था । वह धर्म के अंश से उत्पन्न हुए थे। इसने राम रावण के युद्ध में रामचंद्र की विशेष सहायता की थी ।उनके साथ वेगशाली वानरों की सहस्र कोटि सेना थी। सुषेण वैद्य सुग्रीव के ससुर थे। पहले ये लंका के राजा राक्षसराज रावण का राजवैद्य थे। बालि की पत्नी अप्सरा तारा सुषेण की धर्म पुत्री थीं। बालि वध के बाद तारा का विवाह सुग्रीव से कर दिया गया था। वैसे बालि की पत्नी रूमा थीं। अंगद बालि का पुत्र था। उन सुषेण का जन्म वरुण के अंश से हुआ था।
केसरी:-
केसरी एक पुरुष वानर है , और हिंदू पौराणिक कथाओं में एक पात्र है । वह हनुमान के पिता और अंजना के पति हैं ।
जब केसरी मेरु पर्वत में निवास कर रहा था , तब ब्रह्मा ने मनगर्वा नाम की एक अप्सरा को श्राप दिया और उसे वानर बना दिया। उन्होंने अंजना के नाम से केसरी से विवाह किया। लंबे समय तक दंपति निःसंतान थे। अंजना ने वायु को एक बच्चे के लिए प्रपोज किया। शैव परंपरा में , शिव से विष्णु की मदद करने के लिए एक पुत्र पैदा करने का अनुरोध किया गया था, जो रावण को मारने के लिए राम के रूप में अवतार लेने वाले थे । शिव और पार्वती ने वानर का रूप धारण किया और संभोग में लगे रहे। जब वायु प्रकट हुई, तो युगल ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और पार्वती ने अपने अंदर के बच्चे को प्रकट किया। पार्वती ने वानर के रूप में भ्रूण को कैलाश ले जाने से मना कर दिया। जैसा कि शिव ने निर्देश दिया था, पार्वती ने बच्चे को वायु को अर्पित किया, जिसने इसे अंजना के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया, जिसने हनुमान को जन्म दिया ।
वह महान योद्धा थे। वह 1,00000 से ज्यादा वानर सेना के साथ युद्ध कर रहे थे।
परपंजद पनस :-
यह रामदल का एक बंदर यूथ पति था। विभीषण के चार मंत्रियों में से एक पनस रहा। यह 1,00000 से ज्यादा वानर सेना के साथ युद्ध कर रहा था । ये यूथपति थे। उनका जन्म वृहस्पति के अंश से हुआ था। यह परियात्र पर्वत पर रहता था।
गज :-
पुराणों के अनुसार गज विभावसु के भाई थे। महाभारत के अनुसार गज (यूथपति) थे। वह 1,00000 से ज्यादा वानर सेना के साथ युद्ध कर रहे थे। ये यूथपति थे। महापराक्रमी वानरराज ‘गज’ एक अरब सेना के साथ युद्ध किए।गज वानर यूथपति यमराज अंश से जन्मे थे।
त्रिजटा :-
त्रिजटा एक राक्षसी है जिसे सीता की रक्षा का कर्तव्य सौंपा गया था जिसे लंका के राजा ने अपहरण कर लिया था। रामायण के बाद के रूपांतरणों में, उन्हें विभीषण की बेटी के रूप में वर्णित किया गया है। त्रिजटा एक बुद्धिमान राक्षसी के रूप में प्रकट होती है, जो रावण के विनाश और राम की जीत का सपना देखती है। वह राम और रावण के बीच युद्ध के मैदान के सर्वेक्षण में सीता के साथ जाती है और सीता को राम की भलाई के लिए आश्वस्त करती है जब सीता अपने पति को बेहोश देखती है और उसे मृत मान लेती है।
तार (वानर) :-
तार हिन्दू पौराणिक ग्रंथ के अनुसार श्रीरामचन्द्र की सेना का एक वानर यूथपति था। महाभारत वन पर्व के अनुसार यह निखर्वट नामक राक्षस से भिड़ने लगा था।वानर यूथपति तार वृहस्पति देव के अंश से जनमे थे।
विनथ :-#
महर्षि वाल्मीकि के अनुसार विनथ की सेना में 60 लाख सैनिक थे।
पनस :-
पनस नामक बुद्धिमान तथा महाबली वानर सत्तावन करोड़ सेना साथ लेका आया था। महर्षि वाल्मीकि के अनुसार पनस की सेना में 50 लाख सैनिक थे। ये परियात्र पर्वत पर रहते थे।
ॠक्षराज धूम्र :-
ॠक्षराज धूम्र भगवान् राम को बायीं ओर से सहायता देने के लिए ॠक्षराज धूम्र स्थित थे।
कुमुद:-
कुमुद के नेतृत्व में 10 करोड़ सैनिक ईशान दिशा से आक्रमण के लिए तैनात किए गए थे|
शरभ:-
महर्षि वाल्मीकि के अनुसार शरभ की सेना में 1 लाख 40 हजार सैनिक थे। ये पर्जन्य देव के पुत्र थे।
गवय:-
महर्षि वाल्मीकि के अनुसार गवय की सेना 70 लाख सैनिक थे।महापराक्रमी वानरराज ‘गवय’ -एक अरब सेना के साथ आते दिखाई दिए। वानर यूथपति गवय यमराज के अंश से जन्मे और उन्ही की तरह पराक्रमी थे।
गन्धमादन:-
गन्धमादन पर्वत पर रहने वाला गन्धमादन नाम से विख्यात वानर वानरों की दस खरब सेना साथ लेकर आया। भगवान् राम को सेना के बायें पार्श्व में गन्धमाधन के नेतृत्व में विशाल सेना थी|गंधमादन (वानर) को कुबेर अपने अंश से उत्पन्न किया था।
गवाक्ष:-
लंगूर वानरों के यूथपति गवाक्ष थे। महर्षि वाल्मीकि के अनुसार गवाक्ष की सेना 1 करोड़ सैनिक थे। लंका युद्ध में दायीं ओर से सहायता देने के लिए लंगूरपति गवाक्ष उपस्थित थे। गोलांगूल (लंगूर) जाति के वानर गवाक्ष, जो देखने में बड़ा भयंकर था, साठ सहस्र कोटि (छः अरब) वानर सेना साथ लिये दृष्टिगोचर हुआ। वानर यूथपति गवाक्ष यम राज अंश से जनमे थे।
श्वेत :-
वानर यूथपति श्वेत का जन्म सूर्य अंश से हुआ था।
क्रथन :-
महर्षि वाल्मीकि के अनुसार कृथन की सेना में 10 अरब सैनिक थे।
प्रजंघ:-
रामभक्त हनूमान् , प्रघस आदि योद्धाओं के साथ पश्‍चिमी द्वार को घेरे हुए थे।
प्रमथी :-
महर्षि वाल्मीकि के अनुसार प्रमाथी की सेना में 10 करोड़ सैनिक थे। रामभक्त हनूमान् प्रमाथी, आदि योद्धाओं के साथ पश्‍चिमी द्वार को घेरे हुए थे।
रम्भ:-
महर्षि वाल्मीकि के अनुसार रम्भ की सेना में 1 करोड़ 30 लाख सैनिक थे ।
ऋषभ:-
भगवान् राम को सेना के दाहिने पार्श्व में ॠषभ के नेतृत्व में सेना थी।
वेगदर्शी (वानर) मृत्यु यमराज का अंश था।
हेमकूट (वानर) वरुण अंश से जनमा था।
निम्नलिखित रामजी के बीर सखा थे — पृथु, जम्भ, ज्योतिर्मुख,महोदर,सानुप्रस्थ,सभादन,सुन्द,वालीमुख, शतवलि, वेगदर्श और वेमदर्शी आदि कुछ बानर यूथ पतियों के बारे में केवल नामोल्लेख ही मिलता है।
रावण की मृत्यु के बाद उनके अनुचर सखा गण को राम आभार सहित अपने अपने धाम को जाने को कहा।पर कोई नहीं वापस गया। सभी अयोध्या देखने आए । छः माह तक उनकी खूब आव भगत होती रही। उन्हें उपहार वस्त्र आभूषण देकर विदा किया गया।वे राम की छवि अपने हृदय में बसाकर लौट गए।परंतु कई वीर सखा स्थाई रूप से अयोध्या वासी हो गए। जब रामजी बैकुंठ जा रहे थे तो अपने इन सखा वीरों को रामकोट और अयोध्या की रखवाली का दायित्व भी दे दिया था।
श्री रुद्रयामलोक्त अयोध्या महात्म्य के अध्याय 6 श्लोक 30 से 46 के मध्य रामकोट की सुरक्षा में लगे सभी वीरों और सखाओं के स्थान के बारे में विस्तार से जानकारी दिया गया है। इनमे अनेक स्थल तो राम जन्म भूमि न्यास के अधिग्रहण क्षेत्र की सीमा में आते हैं। कुछ को तो न्यास अपनी नई संरचना में स्थान भी दे रहा है।
रामकोट राजप्रासाद के मुख्य फाटक पर अंजनी नन्दन पवन पुत्र श्रीहनुमानजी का निवास है | उनके दक्षिण पाशर्व में श्रीसुग्रीवजी प्रतिष्ठित है। इसी दुर्ग से मिला हुआ अंगदजी का दुर्ग है | रामकोट के दक्षिण द्वार पर नल नील की स्थिति है। नवरत्न कुबेर जी से पूर्व में सुषेण रहते है | नवरत्न कुबेर नामक स्थान के उत्तर में गवाक्ष जी का स्थान है।रामकोट के पश्चिम द्वार पर दाधिवक्त्र जी प्रतिष्ठित हैं | उसी पश्चिम भाग में दाधिवक्त्र
के उत्तर में स्थित द्वारदेश में दुर्गेश्वर के में से स्थान रहा है।
उनके निकट शतवली जी का और कुछ दूर पर गन्धमादन जी का स्थान है।उससे आगे ऋषभ जी तथा उनके आगे शरभ जी , उनसे आगे पनस जी विराजमान हैं | राम दुर्ग के उत्तर द्वार पर प्रधान रक्षक का भार विभीषण जी पर रहा| उनके साथ उनकी स्त्री ‘सरमादेवी’ भी रहा करती हैं जो अयोध्या में हर्ष पूर्वक रहकर धर्मशील जनों की रक्षा और दुष्ट बुद्धि वालों का भक्षण करती है। शरमा जी के पूर्व में विघ्नेशवर देव का स्थान है। जिनके स्मरण मात्र से विघ्नों का लेश भी नहीं आ सकता है।विघ्नेशवर देवजी के पूर्व दिशा में बलवान श्री पिण्डारक जी का स्थान है। ये पापियों को दंड दिया करते हैं। पिण्डारक जी के पूर्व दिशा में
बड़े ही बीर और मंगल करने वाले विभीषण जी के पुत्र
मतगजेंद्र (मात गैंड) जी का स्थान है। ये अयोध्या के कोटपाल ( कोतवाल) हैं तथा सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं। इनको रामकोट के उत्तर फाटक के पाशर्व स्थापित किया गया | इनके पूर्व दिशा में द्विविदजी का स्थान है। मतगजेंद्र जी के ईशान कोण में बुद्धिशाली मयंद
जी बिराजते हैं।मयंद जी के दक्षिण दिशा की प्रधान रक्षा का भार जांबवान जी बिराजते हैं। जांबवान जी के दक्षिण तरफ केशरीजी बिराजते हैं।| इस प्रकार दुर्ग रामकोट की चतुर्दिक रक्षा होती रही है|

लेखक परिचय – 27.06.1957 को उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में जन्में डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ने अवध विश्वविद्यालय फैजाबाद से बी.ए. और बी.एड. की डिग्री,गोरखपुर विश्वविद्यालय से एम.ए. (हिन्दी),एल.एल.बी., सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी का शास्त्री, साहित्याचार्य , ग्रंथालय विज्ञान शास्त्री B.Lib.Sc. तथा विद्यावारिधि की (पी.एच.डी) “संस्कृत पंच महाकाव्य में नायिका” विषय पर उपार्जित किया। आगरा विश्वविद्यालय से प्राचीन इतिहास से एम.ए. तथा ’’बस्ती का पुरातत्व’’ विषय पर दूसरी पी.एच.डी.उपार्जित किया। डा. हरी सिंह सागर विश्व विद्यालय सागर मध्य प्रदेश से MLIS किया। आप 1987 से 2017 तक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण वडोदरा और आगरा मण्डल में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद पर कार्य कर चुके हैं।
प्रकाशित कृतिः ”इन्डेक्स टू एनुवल रिपोर्ट टू द डायरेक्टर जनरल आफ आकाॅलाजिकल सर्वे आफ इण्डिया” 1930-36 (1997) पब्लिस्ड बाई डायरेक्टर जनरल, आकालाजिकल सर्वे आफ इण्डिया, न्यू डेलही। आप
अनेक राष्ट्रीय पोर्टलों में नियमित रिर्पोटिंग कर रहे हैं।
साहित्य इतिहास पुरातत्व और अध्यात्म विषयों पर आपकी लेखनी सक्रिय है।

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