नेट निरपेक्षता की मुश्किलें

राहुल लाल
ट्रंप प्रशासन ने पूर्ववर्ती ओबामा प्रशासन के एक और फैसले नेट निरपेक्षता (नेट निरपेक्षता) को पलट दिया है। ओबामा के बहुचर्चित नेट निरपेक्षता कानून के विरोध में अमेरिका के नियामकों ने भारतीय समयानुसार शनिवार (16 दिसंबर) को वोट किया। संघीय संचार आयोग ने 3-2 के बहुमत से 2015 के नेट निरपेक्षता कानून को समाप्त कर दिया। वहीं कुछ दिन पहले ही भारतीय दूरसंचार नियामक यानी ट्राई ने मुक्त इंटरनेट के बुनियादी सिद्धांतों को बरकरार रखने की सिफारिश की है। ट्राई ने उन इंटरनेट सेवा प्रदाताओं की गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की है, जो मुनाफे के लिए इंटरनेट इस्तेमाल में रुकावट या रफ्तार में कमी-तेजी कर वेबसाइटों तक आम उपभोक्ताओं की पहुंच सीमित करते हैं।
अमेरिका में राज्यों को भरपूर स्वायत्तता प्राप्त है, लेकिन नेट निरपेक्षता के नए अमेरिकी कानून में राज्यों के अधिकारों को भी सीमित कर दिया गया है। अमेरिकी राज्यों को अपने मनमुताबिक नेट निरपेक्षता कानून बनाने का अधिकार भी अब समाप्त कर दिया गया है।
अंग्रेजी उपन्यासकार जेम्स हिल्टन ने कहा है कि यदि नेट निरपेक्षता खत्म हो गई तो इंटरनेट में कुछ भी पहले जैसा नहीं रहेगा। यही कारण है कि भारत सरकार हमेशा नेट निरपेक्षता के पक्ष में रही है। ट्राई ने नेट निरपेक्षता के पक्ष में सिफारिश पेश करते हुए कहा कि इंटरनेट सेवा प्रदाता वेब पहुंच उपलब्ध कराते समय ट्रैफिक में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं कर सकते। वे न तो किसी ऐप, वेबसाइट और सेवाओं को रोक कर उन पर अंकुश लगा सकते हैं और न ही दूसरों को तीव्र सेवा उपलब्ध करा सकते हैं। ऐसा करने वालों पर सरकार से पूरी तरह प्रतिबंध लगाने को कहा गया है। ट्राई का कहना है कि इंटरनेट सभी के लिए ‘खुला मंच’ है। इसके उपयोगकर्ताओं के बीच किसी तरह का भेदभाव स्वीकार्य नहीं है।
ट्राई की सिफारिशें ऐसे समय आई हैं जबकि अमेरिकी संघीय संचार आयोग के अध्यक्ष अजित पई ने 2015 के उन नियमों को समाप्त करने का प्रस्ताव किया था, जिनके तहत आईपीएस को सभी सामग्रियों के साथ समान व्यवहार करना होता है। नेट निरपेक्षता की अवधारणा के नियमों को रद्द करने के बाद अमेरिका में इंटरनेट समानता समाप्त हो चुकी है, जबकि विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत अब इंटरनेट पर भी समानता के नए क्षितिज की ओर अग्रसर है।
नेट निरपेक्षता या नेट तटस्थता एक सिद्धांत है, जिसके अनुसार इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियों और सरकारों को इंटरनेट के डाटा समान मानना चाहिए और उन्हें चाहिए कि वे प्रयोगकर्ता, सामग्री, वेबसाइट, मंच या संचार की तरकीब के आधार पर कोई भेदभावपूर्ण रवैया न अपनाएं। सामान्य भाषा में कहें तो नेट निरपेक्षता वह सिद्धांत है, जिसके तहत माना जाता है कि इंटरनेट सेवा प्रदान करने वाली कंपनियां इंटरनेट पर हर तरह की सामग्री को एक जैसा दर्जा देंगी। ‘नेटवर्क निरपेक्ष रहेगा’ यह अवधारणा काफी पुरानी है, पर नेट निरपेक्षता शब्द का प्रयोग वर्ष 2000 के बाद चलन में अधिक आया। 2003 में कॉमकास्ट और एटीएंडटी नामक इंटरनेट कंपनियों पर मुकदमा दायर हुआ, क्योंकि इन्होंने बिट-टोरेंट और फेसटाइम सेवाओं को रोक कर इंटरनेट आवाजाही में बाधा डाली थी। किसी देश की सरकार अपनी नीतियों के अनुसार पूरे देश में इंटरनेट पर कुछ वेबसाइटों और सेवाओं को अवरुद्ध कर सकती है, लेकिन कोई भी सेवा प्रदाता कंपनी यह नहीं कर सकती। यही नेट निरपेक्षता का मूल तत्त्व है।
कई दूरसंचार कंपनियां नेट निरपेक्षता खत्म करने के पक्ष में हैं। इससे प्रयोगकर्ता सिर्फ उन्हीं वेबसाइट या एप का प्रयोग कर सकेंगे जो उनकी दूरसंचार कंपनी उन्हें मुहैया कराएगी। बाकी वेबसाइटों और सेवाओं के लिए प्रयोगकर्ता को अलग से राशि देनी होगी। अलग-अलग वेबसाइट के लिए रफ्तार भी अलग-अलग मिलेगी। इससे इंटरनेट का प्लेटफार्म सभी के लिए समान उपलब्ध नहीं रहेगा।
गौरतलब है कि एयरटेल ने 2014 में इंटरनेट के जरिए फोन कॉल करने पर अलग से शुल्क वसूलने का फैसला किया था, जिसे बाद में ट्राई और उपभोक्ताओं के विरोध के कारण टाल दिया गया। इसी तरह कुछ दूसरी कंपनियों ने वाट्सएप, ट्वीटर, स्काइप आदि के लिए अलग से शुल्क लेने की तैयारी कर ली थी। जाहिर है, ऐसी कोई भी योजना उपभोक्ता अधिकारों के उलट है।
शुल्क वसूलने में समानता और पारदर्शिता पहली शर्त है। लेकिन नेट सेवा प्रदाता कंपनियों की इस स्वेच्छाचारिता के खिलाफ ट्राई ने आम लोगों से राय जाननी चाही तो उसके सामने लगभग चौबीस लाख लोगों ने इंटरनेट की आजादी यानी नेट निरपेक्षता के पक्ष में अपनी राय जाहिर की। तब से देश भर में नेट निरपेक्षता के लिए समर्थन बढ़ता ही गया।
सोशल नेटवर्किंग की दिग्गज कंपनी फेसबुक की फ्री बेसिक्स सेवा के चलते 2015 में नेट निरपेक्षता का मुद््दा गर्म हुआ था। फेसबुक के मुताबिक वह अधिक से अधिक लोगों तक इंटरनेट की सेवाएं पहुंचाना चाहती थी।
कंपनी एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के दूरदराज इलाकों तक मुफ्त बुनियादी इंटरनेट कनेक्टिविटी फ्री बेसिक्स प्लेटफार्म के माध्यम से देना चाहती थी। इसके लिए उसने उन्नीस देशों के एक दर्जन से अधिक मोबाइल ऑपरेटरों से साझेदारी की थी। इस सेवा पर लोगों ने आपत्ति जताई कि यह इंटरनेट की स्वतंत्रता की राह में रोड़ा है। इसके चलते प्रयोगकर्ता का इंटरनेट पर दायरा सिमट कर रह जाएगा। मुद््दे पर विवाद गहराने के बाद दिसंबर में रिलायंस कम्युनिकेशन ने फेसबुक की इस सेवा को भारत में कुछ समय के लिए रोक दिया। फरवरी 2016 में ट्राई ने नेट निरपेक्षता का समर्थन करते हुए इस पर रोक लगा दी।
चिली दुनिया का पहला देश है जिसने नेट निरपेक्षता को बनाए रखने के लिए अपने दूरसंचार कानून में वर्ष 2010 में बदलाव किए। इसके बाद इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियां चिली में इस बात पर पहरा नहीं लगा सकतीं कि प्रयोगकर्ता वैध रूप से कौन-सी वेबसाइट देखता है या किस एप का इस्तेमाल करता है। 2012 में नेट निरपेक्षता नियम लागू करने वाला नीदरलैंड यूरोप का पहला और दुनिया का दूसरा देश बना। 2016 में रूसी दूरसंचार नियंत्रण संस्था ने भी नेट निरपेक्षता को लागू किया। वहां सिर्फ उन वेबसाइटों को अवरुद्ध किया जाएगा जिन पर केंद्रीय दूरसंचार, सूचना प्रौद्योगिकी व मीडिया मंत्रालय ने रोक लगाई है।
अमेरिका में नेट निरपेक्षता को खत्म करने के फैसले का विरोध शुरू हो गया है। डेमोक्रेटिक पार्टी के सीनेटर चाल्र्स शूमर ने संघीय संचार आयोग(एफसीसी) के निर्णय पर सदन में मतदान की मांग की है। 2015 में प्रभावी कानून के अनुसार, अमेरिका में इंटरनेट सेवा प्रदान करने वाली कंपनी किसी साइट को अवरुद्ध नहीं कर सकती थी, पर अब एफसीसी के नए आदेश के अनुसार इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनी किसी भी साइट को अवरुद्ध कर सकती है। हालांकि ऐसा करने वाली कंपनी को संबंधित जानकारी सार्वजनिक भी करनी होगी। ऐसे में ट्राई द्वारा नेट निरपेक्षता के पक्ष में सिफारिश करना भारतीय लोकतंत्र की मजबूती को ही प्रतिबिंबित करता है।
भारत प्रारंभ से ही मुक्त इंटरनेट की वकालत करता रहा है। ट्राई ने कहा है कि सेवा प्रदाताओं को किसी के साथ ऐसा करार नहीं करना चाहिए जिससे सामग्री के आधार पर भेदभाव हो सकता है। हालांकि ट्राई ने सेवा प्रदाताओं को ट्रैफिक प्रबंध व्यवस्था लागू करने की अनुमति दी है, लेकिन जब ऑपरेटर उसे लगाएंगे तो इसके बारे में बताना होगा और प्रयोगकर्ता पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा उसकी भी जानकारी देनी होगी। आज के दौर में इंटरनेट सेवा एक बहु-उपयोगी जरूरत बन गई है। सरकार खुद डिजिटलीकरण के पक्ष में है। ऐसे में अगर इंटरनेट को सर्वसुलभ और सस्ता नहीं किया जाएगा तो आम उपभोक्ता को ही इसका खमियाजा भुगतना होगा।

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