इतिहास की अमूल्य निधि औरंगजेब के नाम गुरु गोविन्द सिंह का ऐतिहासिक पत्र

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-वि० स० बिनोद

  आजकल कुछ सिख उग्रवादियों और औरंगजेब के अनुयायियों के बीच बहुत गाढ़ी छन रही है। उन्हें गुरु गोविन्द सिंह का वह पत्र पढ़ना चाहिये जो गुरुजी ने औरंगजेब को लिखा था। मूल पत्र गुरुमुखी में लिखा गया था , इसलिए इस पत्र का उपयोग पश्चिमी इतिहासकार न कर सके। यहां प्रस्तुत हैं उक्त पत्र के कुछ अंश। सिक्खों के दशम गुरु श्री गोविन्द सिंह ने तत्कालीन भारतीय सम्राट औरंगजेब के नाम जो पत्र लिखे थे , उन के सम्बन्ध में जनसामान्य को बहुत कम मालूम है। छत्रपति शिवाजी महाराज का राजा जयसिंह के नाम लिखा हुआ महान् और ऐतिहासिक पत्र पर्याप्त प्रकाश में आ चुका है परन्तु गुरु गोविन्द सिंह जी द्वारा सम्राट औरंगजेब को लिखे हुए पत्र अभी तक गुरुमुखी अक्षरों में बद्ध होने के कारण हिन्दी संसार के समक्ष नहीं आ पाये। फारसी भाषा में लिखा हुआ शिवाजी का पत्र सन् १६२२ के अगस्त मास की नागरी प्रचारिणी सभा , काशी की ' नागरी प्रचारिणी पत्रिका ' में बाबू जगन्नाथ दास रत्नाकर की ओर से प्रकाशित हुआ था। 

    इसकी भूमिका में रत्नाकर जी ने लिखा था कि उन्होंने तब से लगभग तीस वर्ष पूर्व पटना गुरुद्वारे के महन्त स्वर्गत बाबा सुमेरसिंह के पास दो पत्र देखे थे। इनमें से एक तो गुरु गोविन्द सिंह का वह पत्र था जो उन्होंने दक्षिण जाने के पूर्व औरंगजेब के नाम लिखा था , और दूसरा मिर्जा राजा जयसिंह के नाम लिखा हुवा शिवाजी का पत्र था। रत्नाकर जी ने इन दोनों पत्रों की प्रतिलिपियां प्राप्त कर ली थी। 

   गुरु गोविन्द सिंह का औरंगजेब के नाम लिखा हुआ पत्र वह नहीं या जो इतिहास में " जफरनामा ' के नाम से विख्यात है। रत्नाकर जी का कथन है कि जफरनामे में आठ - नौ सौ शेर थे , जबकि इस पत्र में जो उन्होंने बाबा सुमेर सिंह से प्राप्त किया था , सौ से अधिक शेर नहीं थे। ये दोनों पत्र दुर्भाग्यवश रत्नाकर जी से गुम हो गये। पर्याप्त समय पश्चात् शिवाजी वाला पत्र उन्हें अपने पुराने कागजों में मिल गया जिसे उन्होंने नागरी प्रचारिणी पत्रिका में प्रकाशित करा दिया। गुरु गोविन्द सिंह का पत्र रत्नाकर जी से खो चुका था और उस समय तक बाबा सुमेर सिंह की मृत्यु हो चुकी थी। इस कारण उसे पुनः प्राप्त करने का मार्ग अवरुद्ध हो चुका था। 

   रत्नाकरजी ने उस पत्र के कुछ बंद अपनी स्मृति से सरदार उमराव सिंह मजीठिया को भेजे थे। सरदार जी ने उन्हें अपनी ओर से क्रमबद्ध कर उसकी एक प्रतिलिपि पंजाबी के वयोवृद्ध विद्वान भाई वीरसिंह बी को भेजी। भाई वीरसिंह ने उन बन्दों को ' उच्च का पी नामक लेख में खालसा समाचार के १६ जुलाई १६४२ अंक में प्रकाशित करा दिया। 

  इस सम्पूर्ण पत्र में कितने शेर थे और किस क्रम में थे यह आज तक ज्ञात नहीं हो सका। अभी तक २४ शेर ही प्राप्त हो सके हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से पत्र अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इस पत्र में जितने शेर अभी तक प्राप्त हुए हैं , वे आंशिक रूप है उसकी महत्ता प्रकट करने में सर्वथा समर्थ हैं। उन्हें यहां दिया जा रहा है 

१ तलवार और कटार के स्वामी का स्मरण कर और धनुष – बाण तथा ढाल के कर्ता का नाम लेकर ,

२ युद्ध क्षेत्र में वीरगति प्राप्त शेर वीरों के इष्ट का और वायु के समान गतिशील अश्वों के निर्माता का ,

३ उसका जिसने तुझे बादशाहत दी और हमें धर्म रक्षा का गौरव प्रदान किया।

४. तुझको दिया विश्वासघात और धोखे का क्षेत्र और मुझे सत तथा स्वच्छ हृदय से युक्त उपाय।

५ . औरंगजेब नाम तुझे शोभा नहीं देता। राज सिंहासन को शोभा यमान करने वाले द्वारा विश्वासघात और धोखा अच्छा नहीं लगता।

६ . तेरी तसबीह मनके और धागे से अधिक कुछ नहीं क्योंकि तू उन मनकों को चुगने के दाने बनाता है और धागे को अपना जाल।

७. तूने अपने पिता की मिट्टी निकृष्ट कर्म करके अपने भाई के लहू से गूधी है।

८. और उसके साथ अपने साम्राज्य के लिए काच्चे भवन की नींव रखी है।

९. मैं अब ईश्वर कृपा से लोहे के पानी ( तलवार की धार की तरह वर्षा करूंगा।

१०. जिससे इस पवित्र भूमि पर उस अशुभ साम्राज्य का चिह्न भी शेष न रहे ।

११. दक्षिण के पर्वतों से तू प्यासा जौटा है। मेवाड़ से भी कड़वा चखा है।

१२. तेरे तलवों के नीचे मैं इस तरह आग रखूगा कि कि तू पंजाव का पानी मीनपी सके।

१३ . क्या हुआ जो गीदड़ ने विश्वासघात करके सिंह के बच्चे को मार डाला।

१४. जवकि खू ख्बार शेर अभी तक जिन्दा है और वह तुझसे बदला लेगा।

१५ मैं अब तेरे खुदा ( के नाम पर खाई सौगन्ध ) पर कोई विश्वास नहीं करूंगा , क्योंकि मैं तेरे खुदा के कलाम ( के नाम पर किये गये कार्यो ) को देख चुका हूं। तेरी सौगन्ध पर विश्वास नहीं रहा और अन तलवार पकड़ने के सिवाय कोई उपाय नहीं बचा है।

१७ . यदि तू चतुर बाच है तो मैं भी एक सिंह को कठघरे से छोडूगा।

१८. यदि मेरे साथ तेरी बातचीत हुई तो मैं तुझे उचित मार्ग प्रदर्शित करूंगा।

१९. युद्ध क्षेत्र में दोनों सेनाएं पंक्तिबद्ध हो जाएं और शीघ्र ही आप में परिचित हों।

२०. दोनों के मध्य दो फरसंग ( सात या साढ़े सात मील ) क अन्तर हो ।

२१ . रण क्षेत्र में मैं अकेला आऊंगा और तू दो अश्वारोही साथ ला सकता है।

२२. तूने लाड़ – प्यार और सुख के फल खाए हैं , युद्धरत शूरों सम्मुख नहीं आया है।

२३ . तू स्वयं तलवार लेकर युद्धक्षेत्र में आ , ईश्वर की सृष्टि का नाश मत कर।

इन शेरों से सम्पूर्ण पत्र की भावना तथा शैली का ज्ञान हो जाता है। रत्नाकर जी के अनुसार इस पत्र में सौ से अधिक शेर थे। इस प्रकार इसका तीन चौथाई भाग अभी अन्धकार में है जिसकी खोज करना आवश्यक है। यह पत्र कब लिखा गया तथा यह इतिहासप्रसिद्ध जफरनामे से पहले का है अथवा बाद का , इसका निर्णय करना कठिन है , किन्तु इतन निश्चित है कि तब तक गुरु गोविन्द सिंह के चारों पुत्रों का बलिदान है चुका था।

चमकौर के युद्ध ( २३ दिसम्बर १७०४ ) के पश्चात् गुरु गोविन्द सिंह जब भटिंडे की ओर जा रहे थे , तब दीने नामक स्थान पर उन्हें औरंगजेब का पत्र प्राप्त हुआ था जिसमें उन्हें मिलने के लिए दक्षिण आमंत्रित किय गया था। उस पत्र में खुदा तथा कुरान की सौगंधों सहित इस बात का विश्वास दिलाया गया था कि उन्हें किसी प्रकार का कष्ट या धोखा न दिया जाएगा। साथ ही धमकियों के भी कुछ वाक्य इस पत्र में थे।

गुरु गोविन्द सिंह ने शाही हरकारों को उत्तर दिया था कि हम इस पत्र का उत्तर विस्तार सहित भेजेंगे और फिर हमें बादशाह का कोई पत्र प्राप्त होना तो हम उनसे मिलने अवश्य अवश्य आयेंगे।

औरंगजेब के पत्र के उत्तर में लिखे गए फारसी भाषा के जफरनामा नामक पत्र में , कुछ इतिहासकारों के मतानुसार , एक हजार चार के लगन ही शेर थे , और जिस पत्र का ऊपर उल्लेख किया गया है उसमें केवल सो के के लगभग शेर थे। अतः प्रतीत होता है कि यह पत्र उन्होंने जफरनामे वाले विस्तृत पत्र की भूमिकास्वरूप उससे पूर्व ही लिखा होगा। इस पत्र में तत्कालीन परिस्थितियों का बहुत स्पष्ट विवरण मिल जाता है। औरंगजेब तथा गुरु गोविन्द सिंह के पारस्परिक सम्बन्ध कैसे थे , इस बात का भी ज्ञान होता है। यह पत्र इतिहास की अमूल्य निधि है।

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