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कृषि जगत

दम क्यों निकल रहा आलू का

आलू किसानों की बदहाली के बारे में सुनना जरा अजीब लगता है क्योंकि आमतौर पर हर सब्जी में आलू का समावेश है और चिप्स-पापड़ से लेकर तमाम व्यंजनों में पडऩे वाले आलू की मांग बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी करती हैं। जिस देश में आलू के चिप्स का पैकेट हर दूसरे व्यक्ति के हाथ में दिख जाता हो, उस देश में आलू उगाने वाला किसान अपनी किस्मत कोसता नजर आए, यह कैसी विडबंना है! सचाई यही है कि जो आलू मंडियों-बाजारों में दस से पंद्रह रुपए किलो बिक रहा है, किसानों को उसके प्रति किलो चार रुपए भी नहीं मिल रहे हैं। घाटे में सिर्फ किसान नहीं हैं, आलू को कोल्ड स्टोरेज में रख कर उसका किराया लेने वाले भी परेशान हैं क्योंकि घटी कीमतों के असर से किसान अपना आलू लेने ही नहीं आते हैं, ऐसे में किराया किससे लिया जाए! 
फिलहाल जिस जगह से आलू उत्पादकों के परेशान होने की सबसे ज्यादा खबरें आई हैं, वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश का मशहूर ‘आलू बेल्ट’ है। आगरा और अलीगढ़ में बड़ी संख्या में किसान आलू की खेती करते हैं। आगरा में करीब साठ हजार हेक्टेयर और मथुरा में पंद्रह हजार हेक्टेयर में आलू की खेती होती है। आलू की यह खेती इस इलाके में कोल्ड स्टोरेज चलाने वालों को भी मुनाफा देती आई है क्योंकि अच्छी फसल के दौरान हुई पैदावार को किसान उनके यहां रखते हैं और नई फसल आने से थोड़ा पहले निकाल कर बाजार में ले जाते हैं। सिर्फ इन्हीं दो जिलों में करीब साढ़े तीन सौ कोल्ड स्टोरेज हैं जिनकी भंडारण क्षमता लगभग पैंतीस लाख टन है। पिछले रबी और खरीफ सीजन में इन इलाकों में आलू की बंपर पैदावार हुई थी, जिसे किसानों ने बाजार में उतारने के बाद बचे आलू को कोल्ड स्टोरेज में रखा था। लेकिन इस साल मंडियों में खरीफ की फसल के बाद से इतना आलू बचा हुआ है कि कोल्ड स्टोरेज से पुराना आलू निकालने की नौबत ही नहीं आई। इस बीच मंडियों में पंजाब और उत्तर प्रदेश के दूसरे हिस्सों से आलू की नई फसल आ गई। ऐसे में पुराने आलू का कोई खरीदार ही नहीं बचा।
उल्लेखनीय है कि खाद्य प्रसंस्करण की नीतियों पर अमल के अभाव में ज्यादातर किसान ज्यादा उपज के कारण बचे हुए और अनबिके आलू को पचास किलो के पैकेट बना कर अच्छी कीमतों की आस में कोल्ड स्टोरेज में भंडारित करते हैं। अकसर यह अवधि मार्च से नवंबर तक होती है, जिसके लिए कोल्ड स्टोरेज संचालक 110 से 125 रुपए प्रति बैग (पैकेट) के हिसाब से किराया लेते हैं। प्राय: नवंबर में मंडियों में आलू की किल्लत होती है, तब किसान कोल्ड स्टोरेज से आलू निकाल कर उसे ठीकठाक कीमतों में बेचते रहे हैं। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। गरमियों में मंडियों में आलू दो सौ रुपए प्रति बैग (पचास किलो) के हिसाब से बिका और बरसात के सीजन में भी आलू के दाम नहीं चढ़े। किसान उम्मीद कर रहे थे कि सर्दियों की शुरुआत में कोल्ड स्टोरेज में रखा सारा आलू निकल जाएगा, लेकिन इस बीच उत्तर प्रदेश के अन्य हिस्सों और पंजाब से आलू की नई फसल आ गई। ऐसे में पुराने आलू का कोई खरीदार नहीं बचा। हालत यह हो गई कि किसान न तो कोल्ड स्टोरेज का किराया चुका पा रहे हैं और न ही ढुलाई खर्च वहन करके आलू को मंडियों तक लाने की स्थिति में हैं। बड़ी मात्रा में आलू स्टोरेजों में बचा हुआ है, जिसे निकाल कर सडक़ों-खेतों में फेंकने या जानवरों को खिला देने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।
मोटे तौर पर आलू उत्पादकों की समस्याएं बढऩे के तीन-चार कारण अहम हैं। पहला यही है कि आलू-बेल्ट में आलू का उत्पादन लगातार बढ़ता गया लेकिन उसके मुकाबले भंडारण क्षमता और बाजार उपलब्ध नहीं हुआ। साल 2011-12 में उत्तर प्रदेश में आलू की पैदावार 123 लाख मीट्रिक टन थी, जो 2017-18 में 160 लाख मीट्रिक टन पहुंच रही है। उत्पादन के हिसाब से आलू की मांग में इजाफा नहीं हुआ है। दूसरी अहम समस्या लक्ष्य के मुताबिक सरकारी खरीद नहीं हो पाना है। उत्तर प्रदेश में ही पिछले साल उत्पादित आलू की खरीद शुरू की गई, लेकिन लक्ष्य का पंद्रह फीसद भी पूरा नहीं हो सका। इसका बड़ा कारण यह रहा कि खरीद के मानक काफी ऊंचे रखे गए थे। गुणवत्ता के ऐसे मानक तय कर दिए गए कि सामान्य आकार के आलू खरीदे नहीं जा सके।
गौरतलब है कि देश में तीन साल पहले भी आलू किसानों की बरबादी को लेकर ऐसी ही सुर्खियां दिखी थीं। यह उदाहरण पश्चिम बंगाल का था, जहां 2015 में आलू की रिकॉर्डतोड़ पैदावार हुई थी। बताया गया था कि उस साल पश्चिम बंगाल में लगभग 1.20 करोड़ टन आलू की फसल हुई थी। वहां आलू की घरेलू खपत लगभग 74 लाख टन है और राज्य में इसकी भंडारण क्षमता 65 लाख टन है। एक आकलन के मुताबिक जितने इलाके में साल 2014 में 95 लाख किलो आलू पैदा हुआ था, उतने में ही वर्ष 2015 में 1.20 करोड़ किलो आलू की पैदावार हुई। इस तरह पैदावार में करीब छब्बीस फीसद इजाफा हुआ। बंपर फसल देख किसानों की खुशी का ठिकाना नहीं रहना चाहिए था, पर उनकी मुश्किलें तब शुरू हुईं जब बाजार ने इसके बेहद कम दाम लगाए। आलू उत्पादकों ने प्रति किलो आलू पैदा करने में साढ़े पांच से छह रुपए खर्च किए थे, जबकि बाजार ने इसकी खरीद तीन रुपए प्रति किलो के हिसाब से की। इससे किसान टूट गए और कई ने खुदकुशी कर ली। इन हालात के लिए ममता सरकार को जिम्मेदार माना गया, क्योंकि पिछले तीन साल से प्रदेश सरकार ने आलू निर्यात पर रोक लगा रखी थी ताकि राज्य को इस मामले में आत्मनिर्भर बनाया जा सके। लेकिन वर्ष 2015 में जब बंपर उत्पादन के बाद कम कीमत मिलने से किसानों की आत्महत्या की खबरें आईं, तो उन्होंने यह पाबंदी हटा दी थी, हालांकि इससे नुकसान नहीं थमा।
ध्यान रहे कि आलू को कोल्ड स्टोरेज में रखने की एक निर्धारित क्षमता और मियाद है। देश में करीब सात हजार कोल्ड स्टोर हैं। इनमें से पैंसठ फीसद स्टोर उत्तर प्रदेश और बंगाल में हैं, जिनमें से बानवे फीसद स्टोरों में सिर्फ आलू रखा जाता है। इसके बावजूद अकसर उनमें आलू रखने के लिए जगह नहीं बचती है। ऐसे में अगर सरकार सही नीति तैयार करे तो आलू वाकई सोना उगल सकता है। यह नीति आलू को खाद्य प्रसंस्करण से जोडऩे की है। जिस तरह आलू पैकेटबंद चिप्स बनाने के काम आता है, उसी तरह यदि उससे दूसरे उत्पाद बनाए जा सकें और किसानों को उनके लिए प्रोत्साहित किया जा सके तो आलू के सडऩे और किसान के मरने की नौबत नहीं आएगी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों का दावा है कि वे बीते डेढ़ दशक से सरकार से मांग कर रहे हैं कि सरकार उन्हें आलू से वोदका बनाने का लाइसेंस दे। गौरतलब है कि वोदका आलू से ही बनती है, लेकिन देश इसका आयात करता है। इसी तरह ज्यादा कृत्रिम सेंट आलू से तैयार किए गए अल्कोहल के बेस पर बनते हैं। आलू से कई तरह के पैकेटबंद व्यंजन बाजार में उपलब्ध हैं, लेकिन उनकी निर्माता कंपनियों पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कब्जा है। अगर सरकार चाहती है कि आलू के साथ-साथ उत्पादकों का दम नहीं निकले, तो उसे गंभीरता से किसानों की बात सुननी होगी।

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