दिशाएं होते सत्पुरूष, देते सत्सन्देश

बिखरे मोती-भाग 222
गतांक से आगे….
दिशाएं होते सत्पुरूष,
देते सत्सन्देश।
परहित जिनका धर्म है,
रहते खुशी हमेश ।। 1159 ।।
व्याख्या:-विश्वमंगल करने के लिए विधाता धरती पर ऐसी दिव्यात्माओं का आविर्भाव किया करता है, जो सत्पुरूष कहलाती हैं। ऐसी दिव्यात्माओं का स्वभाव ऋजुता (कुटिलता रहित होना) से ओत-प्रोत रहता है। सरलता, शीलता, प्रेम और एकता इत्यादि सद्गुण इनके व्यक्तित्व के गहने होते हैं। इनके कण्ठ में माधुर्य और वाणी में ज्ञान की गम्भीरता होती है, इनका दृष्टिकोण विस्तृत और व्यापक होता है इनके जीवन का उद्देश्य प्रभावित करना नहीं अपितु विश्व को प्रकाशित करना होता है। ये प्राणीमात्र का कल्याण करने आते हैं, मानव मात्र को गति और दिशा देने आते हैं। इसीलिए भारतीय मनीषियों ने सत्पुरूषों को दिशाएं कहा है। जीवन तो विश्व विधाता देता है, किंतु जीवन जीया कैसे जाए?- इस विधा को सत्पुरूष ही दिया करते हैं। उनके श्रीमुख से निकली वाणी-वेदवाणी होती है, लोक कल्याणी होती है, अमृतवाणी होती है, जैसे-वेद, उपनिषद गीता, नीति एवं विभिन्न स्मृतियां इत्यादि। सत्पुरूष अपने प्रवचनों से ज्ञान की अमृत वर्षा करते हैं। दूसरों का उपकार करना इनका सहज स्वभाव होता है, जिसमें कृत्रिमता (बनावट) लेशमात्र की भी नहीं होती है। जैसे गाय अपना दूध बछड़े को पिलाकर प्रसन्न होती है, ठीक इसी प्रकार सत्पुरूष भी लोकोपकार में जीवन-यापन करके ही प्रसन्न होते हैं। प्रसंगवश अपने पाठकों को युधिष्ठिर और यक्ष के संवाद से अवगत कराना चाहता हूं :-
1. यक्ष :-धर्म से भी पुरातन क्या है?
युधिष्ठिर-महाराज! विधाता का विधान धर्म से भी पुरातन है।
2. यक्ष-हृदयहीन क्या है?
युधिष्ठिर-महाराज! पत्थर हृदयहीन होता है, क्योंकि वह संवेदनाशून्य होता है।
3. यक्ष-विष क्या है?
युधिष्ठिर-महाराज! कामनाएं विष हैं।
4. यक्ष-अमृत क्या है?
युधिष्ठिर-गाय का दूध अमृत है महाराज!।
5 यक्ष-तप क्या है?
युधिष्ठिर-अपने धर्म का पालन तप है महाराज!
6. यक्ष-क्षमा क्या है?
युधिष्ठिर-विपरीत परिस्थिति में भी अपने मन के तेज को न खोना क्षमा है महाराज!
7. यक्ष-ज्ञान क्या है?
युधिष्ठिर-महाराज! यह ‘वह’ और ‘मैं’ अर्थात संसार, संसार का स्रष्टा (परमात्मा) तथा आत्मा का वास्तविक बोध ‘ज्ञान’ कहलाता है।
8. यक्ष-लज्जा क्या है?
युधिष्ठिर-महाराज! गलत कामों से अपने मन को हटाने का नाम लज्जा है।
9. यक्ष-शम क्या है?
युधिष्ठिर-चित्त की प्रशान्ति शम है महाराज!
10. यक्ष-दया क्या है?
युधिष्ठिर-सबके सुखों की इच्छा रखना दया है, महाराज!
11. यक्ष-धर्म मूढ़ता क्या है?
युधिष्ठिर-महाराज! कत्र्तव्य का बोध न होना धर्म मूढ़ता है।
12. यक्ष-अहंकार क्या है?
युधिष्ठिर-महाराज! महा अज्ञान अहंकार है।
13. यक्ष-दम्भ क्या है?
युधिष्ठिर-महाराज! अपने को झूठ- मूठ श्रेष्ठ सिद्घ करना दम्भ है।
14. यक्ष-प्रिय वचन बोलने वाले को क्या मिलता है?
युधिष्ठिर-महाराज! प्रिय वचन बोलने वाला व्यक्ति सबका प्रिय हो जाता है।
क्रमश:

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