एनसीईआरटी का पाठ्यक्रम और प्रकाश जावड़ेकर

प्रकाश जावड़ेकर इस समय केंद्र की मोदी सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्री है। उन्होंने भाजपा के संगठन और सरकार में अपना स्थान अपनी मेहनत और पुरुषार्थ से बनाया है। वह मोदी सरकार के परिश्रमी मंत्रियों में गिने जाते हैं। यही कारण है कि उन्हें मोदी सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्रालय का भारी भरकम और महत्वपूर्ण दायित्व सौंपा गया है।
श्री जावडेकर ने घोषणा की है कि एनसीईआरटी का पाठ्यक्रम अगले सत्र से आधा किया जाएगा। मानव संसाधन विकास मंत्री की यह घोषणा सचमुच स्वागत योग्य है, वास्तव में ही देश का बचपन किताबों के बोझ तले दब रहा है। यह बड़ी मूर्खतापूर्ण बात है कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली में नन्हे-मुन्ने नौनिहाल तो पुस्तकों के बोझ से मर रहे हैं और बीए या बीकॉम के विद्यार्थी लगभग खाली हाथ विद्यालयों में लेक्चर सुनने के लिए जा रहे हैं। जबकि इसके उल्टा होना चाहिए। नन्हें-मुन्ने नौनिहालों का बोझ हल्का होना चाहिए और बड़ी कक्षाओं के विद्यार्थियों का दायित्व बोध (बोझ) बढ़ना चाहिए।
जावड़ेकर जी को देखना चाहिए कि शिक्षा में व्यापक सुधारों की आवश्यकता इस समय देश को है। इसके लिए उन्हें सुधारों की व्यापक रणनीति को अपनाना होगा। इस रणनीति की रूपरेखा बनाते समय हिंदी की उपयोगिता पर विशेष बल दिया जाए। आज हिंदी के नाम पर ‘हिंगलिश’ का प्रचलन बढ़ रहा है। यह प्रवृत्ति बहुत ही भयंकर है। इससे देश की भाषा का विकृतीकरण हो रहा है और आज की नई पीढ़ी को ऐसा लग रहा है कि हिंदी का अर्थ ही खिचड़ी भाषा है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय को ऐसे कवियों, लेखकों या साहित्यकारों को ही सम्मानित करना चाहिए जिन्होंने अपने लेखन में वास्तव में ही हिंदी के शब्दों का ही प्रयोग किया हो। इस समय देश में ऐसे कवियों, लेखकों, साहित्यकारों व पत्रकारों की भरमार है जो हिंदी में लिखकर भी हिंदी में नहीं लिखते। क्योंकि उनके लेखन में उर्दू आदि भाषा उनके शब्दों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया जाता है। हम किसी भाषा के विरोधी नहीं है पर इतना अवश्य कहना चाहते हैं कि भारत की राष्ट्रभाषा यदि हिंदी है तो राष्ट्रभाषा के अपने शब्दों को ही उस भाषा के साहित्य में स्थान मिलना चाहिए।
इसके लिए समाचार पत्रों को भी अपनी भूमिका का सकारात्मक निर्वाह करना होगा। समाचार पत्रों में ऐसे कवियों/लेखकों व साहित्यकारों की रचनाएं प्रकाशित होती हैं जिनके लेख या कविता में अन्य भाषाओं के शब्दों की भरमार होती है, नए पाठ्यक्रम में सरल हिंदी के सरल शब्दों को स्थान दिया जाए।
श्री जावडेकर को यह भी ध्यान रखना होगा कि भारत में जब लॉर्ड मैकाले ने वर्तमान शिक्षा प्रणाली लागू की थी तो उस समय उसने एक सर्वेक्षण में यह पाया था कि भारत के गुरुकुलों को समाप्त कर दिया जाए तो भारत से कभी भी ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ा नहीं जा सकेगा। सचमुच इस ओर मैकाले से पहले किसी का ध्यान नहीं गया था- मुगल और तुर्क भारत के विद्रोह को तो झेलते रहे और विद्रोह का अपने क्रूर दमनचक्र से शमन कर शासन भी करते रहे परंतु कभी उन्होंने भारत की प्रचलित शिक्षा व्यवस्था को समाप्त करने की योजना पर काम नहीं किया। मैकाले को समझ में आ गया कि भारत में अपनी संस्कृति के प्रति और धर्म के प्रति लोगों में मिलने वाला असीम अनुराग वास्तव में विद्यालयों/गुरुकुलों की क्रांतिकारी और राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत शिक्षा प्रणाली से ही जन्मता है। उसने समझा कि देश का राजधर्म नपुंसक हो सकता है पर शास्त्र धर्म नपुंसक नहीं हो सकता और यह तभी संभव है जब गुरुकुलों को बंद कर दिया जाए। वास्तव में हमारे तथाकथित पराधीनता के काल में देश का राजधर्म तो नपुंसक होकर दग्धबीज हो गया था, परंतु यह गुरुकुल ही थे जिन्होंने देश से राष्ट्रभक्ति को मरने नहीं दिया। यहां चाणक्य का सूत्र काम करता रहा कि यदि शिक्षक राष्ट्रभक्ति से शून्य है तो वह देश के लिए कुछ नहीं कर सकता। अच्छे शिक्षक को अपने विद्यार्थियों के लिए ऐसी शिक्षा प्रदान करनी चाहिए जिससे उनका रोम-रोम राष्ट्रभक्ति की भावना से फड़कने लगे।
आज की शिक्षा प्रणाली का दोष ही यह है कि यह शिक्षा प्रणाली हमारे बच्चों को ह्यपेट भक्तह्ण तो बना रही है पर देशभक्त नहीं बना रही है। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि जे०एन०यू० जैसे प्रतिष्ठान में ह्यभारत तेरे टुकड़े होंगेह्ण के नारे लगते हैं और फिर उन नारे लगाने वालों के बचाव के लिए राजनीति के कुछ खिलाड़ी सामने आ जाते हैं?
श्री जावडेकर को यह तथ्य ध्यान में रखकर अपनी नई शिक्षा नीति की घोषणा करनी चाहिए। भारत के राष्ट्रवाद में जिस मानवीय गरिमा का निरूपण किया गया है उसी से भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का उद्भव और विकास हुआ है। इसी से भारत की वैश्विक संस्कृति का निर्माण हुआ है और इसी से भारत के एकात्ममानववाद की उत्तुंग विचारधारा का निर्माण हुआ है। भारत के किसी भी धर्म शास्त्र में विपरीत मतावलंबी का वध करने की बात नहीं कही गई है और ना ही उसके बीवी बच्चों को ‘लूट का माल’ माना गया है। इसके उपरांत भी कुछ लोगों को भारत की वैश्विक मानव संस्कृति में से ‘तालिबानी संस्कृति’ की गंध आती है, ऐसे लोगों को नहीं पता कि तालिबानी विचारधारा क्या है, और भारत की संस्कृति का एकात्ममानववाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद क्या है? जिन्हें भारत के विषय में क, ख, ग की पता नहीं है, वे लोग ही भारत के विषय में सूचना देते हैं कि भारत क्या है? फलस्वरुप भारत जो है नहीं- वह विश्व को बताया जाता रहा है और जो है- वह विश्व से छुपाया जाता है, जैसे आतंकियों के विनाश को भारत हिंसा नहीं मानता, यह तथ्य ह्यगांधी के भारतह्ण के नाम पर छुपा लिया जाता है और यह भ्रामक तथ्य स्थापित किया जाता है कि भारत प्रत्येक समस्या का समाधान प्रेम से चाहता है। जबकि इसके स्थान पर यह तथ्य स्पष्ट करना चाहिए कि दुष्टों का संहार करना सज्जनों की सुरक्षा के दृष्टिगत राज्य का पहला कार्य है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली भ्रम और भ्रांति के संसार में रहकर कल्पनालोक में शयन कर रही है। मानव संसाधन विकास मंत्री को इस शिक्षा प्रणाली को उसके व्यामोह से बाहर निकालने की आवश्यकता है।
यह संभव नहीं है कि अगले सत्र से ही शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन कर दिया जाए। सुधारों में प्रमुख विषय की प्रक्रिया को अपनाया जा सकता है। परंतु जो कुछ भी किया जाए उसके ठोस व सकारात्मक परिणाम आने चाहिएं। अब समय आ गया है कि जिन लोगों ने भारत की वैदिक संस्कृति को कोसने का ठेका ले रखा है- उन्हें सही उत्तर दिया जाए। लॉर्ड मैकाले के मानस पुत्रों को हमारा यह लेख हो सकता है रुचिकर न लगे। हम उनके लिए इतना ही कहना चाहेंगे कि लॉर्ड मैकाले ने जब गुरुकुलों के विनाश की प्रक्रिया को अपनाया था तो उसी समय भारत के ‘पुनरुज्जीवी पराक्रम’ का प्रतीक बन कर महर्षि दयानन्द मैदान में आए थे और उन्होंने गुरुकुलीय शिक्षा प्रणाली पर बल देकर भारत के राष्ट्रवाद के लिए उसे ही आधार बनाया था। उनका यह सपना स्वामी श्रद्धानंद जैसी विभूतियों ने गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना करके पूर्ण किया तो यह गुरुकुल एक प्रकार से क्रांतिकारियों की पौधशाला ही बनकर रह गया था। आज भी देश में ऐसे ही गुरुकुलों की आवश्यकता है जो देश के लिए मचलते हुए यौवन का निर्माण कर सकें। चुनौतियों को चुनौती देना भारत की शिक्षा प्रणाली का मुख्य उद्देश्य होता था ना कि ह्यएक गाल पर कोई चांटा मारे तो दूसरा गाल उसके सामने कर दोह्ण- की चुनौतियां से बच कर चलने की और वैकल्पिक व्यवस्थाओं को खोजना भारत की शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य रहा है। अब समय संकल्प का है विकल्प का नहीं। इसी सूत्र को ध्यान में रखकर भारत की नई शिक्षा नीति की घोषणा श्री जावडेकर को करनी चाहिए। हमें आशा है कि वह ऐसा करेंगे।

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