चीनी भाषा अध्ययन है, कठोर परिश्रम: भा. (१)

डॉ. मधुसूदन:

मौलिक सारांश:
संसार की कठिनतम भाषा है चीनी. कठोर परिश्रम से ही, चीनी अपनी भाषा सीखते हैं. शालेय शिक्षा के दस वर्ष प्रति-दिन ३०% से अधिक समय चीनी भाषा सीखने में लगाते हैं. इस भाषा में भूत, भविष्य और वर्तमान काल दर्शाए नहीं जा सकते. नवीन शब्द रचना भी अति कठिन है. ऐसी भाषा के अध्ययन का चीनी नागरिक के विशिष्ट चारित्रिक गठन पर भी प्रभाव पडता है. इतना समय यदि आप दें, तो तीन-चार भारतीय भाषाएँ सीख जाएँगे. और यदि संस्कृत सीख लें तो कम से कम पाँच-सात भारतीय भाषाओं में सिद्धहस्त हो जाएंगे. 
भाषा वैज्ञानिक एडवर्ड सपीर कहते हैं: 
*जिस समाज में मनुष्य जन्म लेता है; उस समाज की भाषा को, वह जन्म से ही स्वीकारता है; भाषा चुनने का कोई अधिकार बालक को नहीं होता. अतः बालक उस भाषा में पूर्वप्रचलित मान्यताओं को अनचाहे, और अनजाने ही, स्वीकार करता है. परिणामतः उसकी मानसिकता भी उस भाषा में प्रचलित पूर्वाग्रहों से गठित हो जाती हैं. *उसको जो संसार दिखाई देता है, वह उसकी इस मानसिकता से (फिल्टर होकर) छनकर उसके मस्तिष्क में अधिष्ठित हो जाता है. 
विषय को कुछ सूक्ष्मता में जानने के लिए आगे पढें. विषय सरल बनाने की चेष्टा लेखक करेगा. कुछ कठिन हो सकता है. आत्मसात करते हुए पढने का अनुरोध है. इस विषय का ज्ञान भारतीय विद्वानों को अतीव आवश्यक मानता हूँ. (जब चीन हमारी सीमा पर घुसपैंठ में व्यस्त है.)
(एक)यदि आप चीन में जन्मे होते तो? 
तो क्या होता?
आपको चीनी भाषा सीखने के लिए, कठोर परिश्रम करना पडता.
शाला की पढाई के १० वर्ष, प्रतिदिन ३०%+ अध्ययन का समय मात्र चीनी भाषा के शब्द सीखने में लगाना पडता. इतना कठोर परिश्रम करने पर आप चीनी भाषा का समाचारपत्र ही पढ पाते. समाचारपत्र भी उन्हीं सीमित और सरल शब्दों का प्रयोग कर समाचार छापते हैं.
*दूरदर्शन के सुधार (रिपैर) के लिए बुलाये गए, और अमरिका में नवागत ऐसे, चीनी सज्जन ने, जब उनकी स्थूल अंग्रेज़ी में ऐसा कहा.* जो मैंने जा कर जालस्थलों पर सत्त्यापित भी किया, और भाषा वैज्ञानिकी आलेखों में भी देखा. वैसे, मैंने ही कुतूहल वश प्रश्न पूछा था; जिसका उत्तर वे दे रहे थे. आगे उन्होंने कहा, *उनकी २ बेटियाँ (शायद इसी लिए) चीनी सीखना नहीं चाहती; पर एक तीसरी बेटी चीनी सीख रही है.* उन्होंने मुझे कुछ वाक्य चीनी में लिखकर दिखाए. 
पर चीन में अंग्रेज़ी जाननेवाले भी नहीं के बराबर हैं. यह मेरा १७-१८ दिवसों के चीन के प्रवास (२००७) का अनुभव है. अमरिका में भी धारा प्रवाह अंग्रेज़ी बोलनेवाले चीनी कम ही मिले हैं. जो चीनी अमरिका में वर्षों से बसे हैं, उनकी अंग्रेज़ी कुछ अच्छी होती है. संभवतः वे चीनी नहीं जानते. अंग्रेज़ी में ही पढे होते हैं. 
*अभिव्यक्ति में चीनी की अपेक्षा अंग्रेज़ी कई गुना सक्षम है. * 
==>*पर अंग्रेज़ी की अपेक्षा हिन्दी अनेक गुना श्रेष्ठ है.<===
क्या हमारे सिवा विश्व के सारे -संस्कृत-शिक्षित-विद्वान (विना अपवाद) यह सत्त्य जानते हैं? 
जी हाँ. मेरी वैयक्तिक सीमा में, मुझे यही अनुभव हुआ है.
दुःख होता है. *हमारे ही करम फूटे हैं. हम राह देख रहें हैं, किसी कल्कि अवतार की. 
*स्वयं भगवान आ कर इस शवासन करती पीढी के मुँह में अमृत डाल जाएँ. तो बात बनें. *
*भगवान भी गीता में आने का चचन देकर कहाँ खो गए?*
(दो) जन्म-भाषा का प्रभाव: 
मनुष्य जिस भाषा में जन्म लेता है, वह भाषा उसके जन्म के साथ जीवन भर जुड जाती है; उस भाषा को स्वीकारने या न स्वीकारने का उसके लिए कोई प्रश्न ही नहीं उठता. जन्मतः बालक विवश और पराश्रित होता है. अपनी निजी, प्राथमिक आवश्यकताओं के लिए भी परवश होता है. इस लिए, परिवार में प्रचलित भाषा को अपनाने पर विवश होता है. ऐसे अनजाने और अनचाहे ही उसके व्यक्तित्व पर उसकी भाषा का प्रभाव जन्म भर पडते रहता है. उसकी रुचि-अरुचि का प्रश्न तब उठता, जब उसके पास भाषा चुनने के लिए, एक से अधिक शक्यताएँ होती. 
(तीन) जन्मजात भाषा  
यदि कोई रूस में जन्म लेता, तो रूसी उसकी भाषा होती. और फ्रांस में जन्मा होता तो फ्रान्सीसी. मातृभाषा को मतदान द्वारा कोई स्वीकारता नहीं है. और भाषा की तुलनात्मक उपादेयता तो बडों को भी गहरे अध्ययन और चिन्तन बिना समझ में नहीं आती. 
इस प्रकार भाषा के जन्मजात प्रभाव पर, भाषा वैज्ञानिक एडवर्ड सपीर जो कहते हैं; मनन करने योग्य है. (कुछ पुनरावृत्ति होगी) 
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(१) एड्वर्ड सपीर (१९२९) कहते हैं:==>
*जिस समाज में मनुष्य जन्म लेता है; उस समाज की भाषा, जन्म के साथ ही वह स्वीकारता है; (या यूँ कहे, उसे स्वीकारनी पडती है.) भाषा चुनने का कोई अधिकार उस बालक को नहीं होता. अतः बालक उस भाषा में पूर्वप्रचलित मान्यताओं (और संस्कारों) को अनचाहे और अनजाने, स्वीकार करने पर बाध्य होता है. परिणामतः उसकी सोच और मानसिकता उस भाषा में प्रचलित पूर्वाग्रहों और मान्यताओं से प्रभावित ही नहीं गठित भी हो जाती हैं.*
उस को जो संसार दिखाई देता है, वह उसकी इस विशेष मानसिकता से (फिल्टर होकर) छनकर उसके मस्तिष्क में पहुँचता है.
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अंग्रेज़ी में : (२) sapir- Hypothesis (1929)
Human beings…..are very much at the mercy of the particular language which has become the medium of expression for that society…the ‘real world’ is to a large extent unconsciously built upon the language habits of the group.
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(चार) भाषा वैज्ञानिक *बेन्ज़ामिन व्होर्फ*  
सपीर के पश्चात कुछ वर्षों बाद, दूसरे भाषा वैज्ञानिक *बेन्ज़ामिन व्होर्फ* भी इसी तथ्य को अलग शब्दों में दुहरा गए हैं. उनके अनुसार:
*मनुष्य अपनी विशिष्ट भाषा का गुलाम होता है. उसके लिए, उसकी दुनिया अनजाने ही उसके भाषा संस्कारों से निर्मित होती है. उसको जो दुनिया दिखाई देती है; वह बहुरूपी होती है. उसमें रंग उसकी भाषा ही भरती है. उस भाषा के शब्द, शब्दों के अर्थ ,भाषा की लिपि और शब्दों की जो सीमाएँ होती हैं; उन्हीं से उसके पूर्वाग्रह गठित होते हैं. उसे दुनिया अलग रंग और मानसिकता की दिखाई देती है.* 
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(३)बेन्ज़ामिन व्होर्फ का मूल कथन:
Several years later, Whorf expressed essentially the same sentiment when he made the following claim. 
We dissect nature along lines laid down by our native language. The categories and types that we isolate from the world of phenomena we do not find there because they stare every observer in the face; on the contrary , the world is presented in a kaleidoscopic flux of impressions which has to be organized by our minds —this means largely by the linguistic systems in our minds.
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इन २ विद्वानों के कथन के प्रकाश में चीनी भाषापर विचार आगे बढाते हैं.
(पाँच) चीनी लिपि और भाषा का इतिहास: 
चीनी लिपि प्रारंभ में चित्र लिपि थी. फिर भावचित्र (अमूर्त भावों के चित्र) भी जोडे गये. चित्र बनाना समय साध्य और कठिन था. तो चित्रों को सरल बनाते बनाते आज उनकी पहचान भी लुप्त हो गयी है. तो वह लिपि आज संकेत-लिपि में परिवर्तित हो गयी है. और संकेत के चिह्न में *उच्चारण दर्शाया नहीं जाता.* 
वह शब्दका संकेत होता है. उसमें उच्चारण कहीं भी लिखा नहीं होता. [आज कल चीनी शब्द के ऊपर रोमन में उच्चारण लिखा जाता सुना है.]
चीनी लिपि शब्दों की लिपि है, जिसमें शब्द ही अनुक्रम में लिखे जाते हैं. उच्चारण लिखा नहीं जाता. पर उच्चारण स्मरण में रखना पडता है. 
(छः) कुछ चीनी अनुवाद के उदाहरण: 
कुछ चीनी अनुवाद के उदाहरण देखने से पाठकों को चीनी भाषा की कठिनता का अनुमान होगा. (गुगल के ट्रान्सलेटर से अनुवाद किया है.) 
*प्रेम* और *भावना* चीनी भाषा में स्वतंत्र शब्द हैं. पर *श्रद्धा*, *आदर*, *निष्ठा*, *भक्ति* को दो चित्रों को जोडकर बनाया जाता है. 
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(१) प्रेम=爱,, —-(२)भावना = 感 —- (३) श्रद्धा=尊敬,—–(४)आदर= 荣誉, —–(५)निष्ठा=忠诚,—-(६)भक्ति =忠诚
(२) *हम शब्दों द्वारा अभिव्यक्ति करते हैं.* का अनुवाद .==>* 我们用言语表达.*
(३) *चीनी रेखाओं के पुंज द्वारा अभिव्यक्ति करता है.* का अनुवाद===> *中国线的豆表达*
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{ यह अनुवाद मुझे जैसा गुगल ट्रान्सलेटर पर मिला वैसा काट के चिपकाया है.}
(सात) संकेत लिपि कैसी होती है? कुछ स्पष्टीकरण और उदाहरण 
उदाहरणार्थ: हमारे सारे अंक संकेत लिपि में होते हैं. जैसे *७* हम इसका उच्चारण *सात* करते हैं. उसी प्रकार *५२* (*बावन*) या और कोई भी संख्या. हम *सात* या *बावन* यह उच्चारण अपनी स्मृति में संग्रहित कर रखते हैं. ऐसा उच्चारण ७ या ५२ ऐसे लिखित चिह्नों में, कहीं लिखा या दर्शाया गया नहीं है. उसी प्रकार +, -, इत्यादि चिह्न भी संकेत ही हैं. और उदाहरण हो सकते हैं (! ), (%), (*), (=), (>), (<) ये सारे संकेत चिह्न हैं. इनका अर्थ भी आप जानते हैं, और उच्चारण भी. इनका उच्चारण उन चिह्नों के साथ दर्शाया नहीं गया है. 
*चीनी छात्र पूरी की पूरी चीनी भाषा को ऐसे शब्द-संकेतों द्वारा संभवतः स्मरण में रख नहीं सकता.* इस लिए पूरी चीनी भाषा कोई चीनी नहीं जानता. दस वर्षों की शालेय पढाई के उपरान्त चीनी समाचार पत्र पढ सकता है. 
एक बार एक चीनी भाषी को मैंने चीनी परिच्छेद के अंश का अर्थ पूछा था. उसने कुछ समय उसे निहारकर मुझे अनुमानित अर्थ ही बताया. जैसे आप किसी आधुनिक चित्रकारी (मॉडर्न पेन्टीग) का अर्थ लगाते हैं बस वैसे ही. 
*चीन में विशेषज्ञ अपने विशिष्ट विषय के शब्द ही जानते होंगे. ऐसा अनुमान करता हूँ.* 
(आठ ) चीनी भाषा पूरी की पूरी संकेतों की भाषा है. 
बस यहाँ तक ही विकसित हो कर चीनी भाषा ही रुक जाती है. न व्याकरण है. न भूत, वर्तमान, या भविष्यकाल. न विशेषण न क्रिया विशेषण. 
*इस भाषा की सीमा में चीनी मस्तिष्क कैसा अनुभव करता होगा? कविता कैसे लिखता होगा? गीत कैसे लिखता होगा? मैं भी सोच रहा हूँ.* 
पर कुछ अनुभव है, कि, इस लिए, चीनी भाषी माप-तौल कर अभिव्यक्ति नहीं कर पाता. यह उसकी भाषिक धरोहर की सीमा और त्रुटि उसकी भाषा से जुडी हुयी है. 
सपीर और व्हॉर्फ के कथन के प्रकाश में देखने से और चीनी भाषी मित्रों के प्रत्यक्ष अनुभव से यह कहने का साहस कर रहा हूँ. *यह मेरा अनुमानित तर्क ही नहीं है. यह वैयक्तिक निरीक्षण की वास्तविकता भी है.* 
चीनी मित्र भी रहे हैं. एक ताइवान का था, एक चीन से आया था. दोनों पराकोटि के परिश्रमी थे. एक रसायन में पी. एच. डी. कर रहा था. संगणक के कक्ष में ही सोता था. दूसरे के घर मैं गया था. तो वह ऍबेकस (अंक गणक) पर समीकरण सुलझाता था. दोनो मूलतः चीनी और कठोर परिश्रमी थे. 
*अनुमानतः चीनी भाषा सीखते सीखते ही कठोर परिश्रम का आदी बन जाता होगा. गठ्ठन बाँध लेता होगा, कि कठोर परिश्रम ही सफलता की कुंजी है.* 
भाग (२) भी इसी कडी में जोडा जाएगा.
संदर्भ: 
(१) भाषाविज्ञान की भूमिका-देवेन्द्रनाथ शर्मा, (२) Contemporary Linguistics –O’GRADY, DOBROVOLSKY, ARONOFF (3) Google Translator (4) Wikipedia

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