सठ सुधरहिं सत्संगति पाई पारस परसि कुधात सुहाई

बिखरे मोती-भाग 224

गतांक से आगे….
सत्संग की महिमा
सूर्य उगे तो दीप सब
होते कान्तिहीन।
सत्संग जिनको हो गया,
हो गये व्यसन विहीन।। 1161।।
व्याख्या:-उपरोक्त दोहे की व्याख्या करने से पूर्व सत्संग का अर्थ समझना प्रासंगिक रहेगा। सत्य के संग को सत्संग कहते हैं। सत्य का संग तभी होता है, जब आप अपना आत्मावलोकन करते हैं, अन्यथा ताली बजा-बजाकर भजन गाने अथवा कीर्तन करने से कोई लाभ नहीं है। सत्य का संग कोई जरूरी नहीं कि आपको मंदिर में ही हो, यह तो सच्ची आत्मा से अपनी गलतियां सुधारने की प्रेरणा स्वत: भी उठते-बैठते, चलते-फिरते, आपको मिल सकती है अथवा किसी सन्त के प्रवचन से भी प्राप्त हो सकती है। जैसे-महात्मा बुद्घ की प्रेरणा से अंगुलिमाल डाकू भिक्षु बन गया। सत्संग एक वेश्या को किस प्रकार धर्मानुरागिनी बना देता है, यह आम्रपाली के जीवन से प्रकट होता है। वैशाली में रहने वाली आम्रपाली एक वेश्या थी जो महात्मा बुद्घ के प्रवचनों से प्रभावित होकर एक धर्मपरायणा स्त्री बन गयी।
महर्षि देवदयानंद के जीवन से अनेक आत्माओं ने नवजीवन प्राप्त किया। जब महर्षि दयानन्द वेद प्रचार करते हुए जेहलम (पाकिस्तान) पधारे तो महता अमीचन्द भी महर्षि के सत्संग में आया करते थे। जो अपनी मधुर आवाज में प्रभु-भक्ति के गीत गाकर लोगों को मन्त्रमुग्ध कर देते थे। इसलिए महर्षि दयानन्द उनसे प्रेम करते थे, कि न्तु कुछ सत्संगियों ने महर्षि दयानन्द को बता दिया-महाराज! यह अमीचन्द-मांसाहारी, मद्यप और दुराचारी है, इसने अपनी पत्नी को छोड़ा हुआ है तथा एक रखैल रखी हुई है। ऋषि यह सुनकर खामोश रहे और जब अगले दिन अमीचन्द ने सत्संग में ईश्वर भक्ति का गीत गाकर लोगों को आनन्द विभोर किया तो ऋषिवर दयानंद ने उसे शाबाशी देते हुए कहा,-”अमीचन्द तुम हो तो हीरे, किन्तु कीचड़ में पड़े हो।”
महर्षि का यह वाक्य अचूक बाण की तरह अमीचन्द के मर्मस्थल पर लग गया और वह सारे व्यसन छोडक़र धर्मानुरागी बन गया।
दूसरा दृष्टान्त जालन्धर में पैदा हुए मुंशीराम का देखिये-मुंशीराम ने अभी यौवन की दहलीज पर पांव ही रखा था कि शराब, धूम्रपान, मांसाहार, दुराचार, दुव्र्यवहार इत्यादि दुर्गुण और दुव्र्यसनों ने उसे जकड़ लिया था। किन्तु महर्षि दयानन्द के सत्संग ने उसे महात्मा मुंशीराम बना दिया। यही मुंशीराम आगे चलकर स्वामी श्रद्घानन्द के नाम से विख्यात हुआ, जिसने हरिद्वार में गुरूकुल कांगड़ी की स्थापना की तथा स्वतंत्रता आन्दोलन में कूदकर देश के लिए प्राणोत्सर्ग किया। हिन्दू महासभा जैसे राष्ट्रवादी संगठन का अध्यक्ष बनकर उसका सफल नेतृत्व किया।
स्वामी रामकृष्ण परमहंस के सत्संग से प्रभावित होकर युवक नरेन्द्र स्वामी विवेकानन्द बन गया, जिसने शिकागो (अमेरिका) में जाकर हिन्दू धर्म की धाक जमायी। सारांश यह है कि सत्संग में ऐसी शक्ति है जो व्यक्ति के जीवन का कायाकल्प कर देती है। इस सन्दर्भ में चाणक्य ने ठीक ही कहा था-संसार में चन्दन शीतल है, चन्द्रमा चन्दन से भी अधिक शीतल है, किन्तु साधु संगति चन्द्रमा और चन्दन से भी अधिक शीतल है। सत्संग के सन्दर्भ में गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं :-
सठ सुधरहिं सत्संगति पाई।
पारस परसि कुधात सुहाई।।
अर्थात-दुष्ट व्यक्ति सज्जनों की संगति से सुधरते हैं जैसे-पारसमणि के स्पर्श से बुरी धातुएं भी शोभायमान हो जाती हैं। तुलसी की निम्नपंक्तियां भी बड़ी प्रेरणास्पद हैं :-
तुलसी लोहा काठ संग, चलत फिरत जल माहि।
बड़े न डूबन देत है, जाकी पकड़ें बांहि।।
हमेशा याद रखो, सत्संगी बनोगे तो कुछ बन जाओगे और यदि कुसंग में जाओगे तो गिर जाओगे। जिस प्रकार सूर्य के सामने सारे दीप कान्तिहीन हो जाते हैं, ठीक इसी प्रकार सत्संग के सामने सारे व्यसन प्रभावहीन हो जाते हैं। इसलिए सत्संगी बनो, कुसंगी नहीं।
क्रमश:

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