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मुद्दा शिक्षा/रोजगार समाज

शिक्षा के मन्दिरों में बच्चे हिंसक क्यों बन रहे हैं?

नये भारत के निर्माण की नींव में बैठा इंसान सिर्फ हिंसा की भाषा में सोचता है, उसी भाषा मेें बोलता है और उससे कैसे मानव जाति को नष्ट किया जा सके, इसका अन्वेषण करता है। बदलते परिवेश, बदलते मनुज-मन की वृत्तियों ने उसका यह विश्वास और अधिक मजबूत कर दिया कि हिंसा हमारी नियति है, क्योंकि हमने इसे चाहा है। इस चाह के तहत ही आज बड़े ही नहीं, बल्कि हमारे बच्चों का ऐसा व्यक्तित्व उभरकर सामने आया है कि कभी गुरुग्राम तो कभी हैदराबाद और कभी लखनऊ तो अब यमुनानगर की त्रासद एवं बर्बरतापूर्ण घटनाएं। गुरुग्राम में एक किशोर स्कूल के बाथरूम में किसी जूनियर मासूम का गला रेत देता है, हायतौबा मचती है। आरोपी को सलाखों के पीछे पहुंचाकर वकीलों और अदालतों के भरोसे सौंपकर समाज खामोश हो जाता है। हैदराबाद में एक किशोर दसवीं क्लास के अपने सहपाठी को मामूली विवाद में चाकू मार देता है। तीसरी घटना लखनऊ के एक स्कूल में घटी है जहां आठवीं की?छात्रा ने स्कूल के पहली में पढऩे वाले मासूम को चाकू से मरणासन्न कर दिया। सिर्फ इसलिये ताकि जल्दी छुट्टी हो। एक किशोरी मामूली वजह हेतु किसी मासूम को बाथरूम में ले जाकर पेट और सीने पर किसी धारदार हथियार से वार करे या फिर अब यमुनानगर के एक निजी स्कूल में 12वीं में पढऩे वाला एक छात्र स्कूल से निष्कासित किए जाने से इतना नाराज और क्रूर हो जाता है कि वह अपनी प्रिंसिपल को ही गोली से मार देता है। स्कूलों में बढ़ रही हिंसा की ये डरावनी, खौफनाक, बर्बरतापूर्ण एवं क्रूर घटनाएं साफ चेतावनी है कि हम किस समाज में जी रहे हैं? हम कैसा समाज निर्मित कर रहे हैं? कैसे संस्कार हम अपने बच्चों को दे रहे हैं? कैसी हिंसक एवं क्रूर सोच पनप रही है? शिक्षा के मन्दिर जहां अहिंसा का पाठ पढ़ाया जाता है किस तरह हिंसा के केन्द्र बनते जा रहे हैं। भारत के शिक्षा के केन्द्र अपने हाथों अपनी भाग्यलिपि में कौन-से रंग भर रहे हंै, इसे आज पढऩा और समझना न केवल अभिभावकों, स्कूलों के लिये बल्कि सरकार के लिये भी जरूरी हो गया है। वैसे तो हमारा रोजाना अच्छी और बुरी खबरों से सामना होता हैं लेकिन इन दिनों समाचारपत्रों पर नजर डालें तो ऐसा लगता है कि खबरें आग उगल रही हैं, आए दिन भीषण नरसंहार, अत्याचार, आतंकवाद, आक्रमण, अन्याय की संगीन बातें, छोटी-छोटी बातों पर हत्याएं, मारकाट, आगजनी, हिंसा को आंखें पढ़ती है, सुनती है और देखती है, मन सोचता है कि मनुष्य मनुष्य का शत्रु कैसे बन गया? अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले शिक्षा के मन्दिर हिंसा के केन्द्र कैसे बन गये? समाज में जो कुछ हो रहा है, वह भयानक तो है ही साथ ही चिन्ताजनक भी है। लखनऊ एवं यमुनानगर की हिंसक घटनाएं अपने आप में ऐसी भयानक एवं बर्बरतापूर्ण त्रासदियां हैं जिनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। गुरुग्राम के स्कूल में अपराध करने वाला छात्र तो बालिग होने की दहलीज पर था लेकिन सातवीं कक्षा की छात्रा से ऐसे वहशीपन की तो उम्मीद ही नहीं की जा सकती। बारहवीं के छात्र शिवांश में बदले की भावना इतनी प्रबल हुई कि वह अपनी प्रिंसिपल ऋतु छाबड़ा को अपने पिता की रिवॉल्वर की गोलियों से छलनी कर दिया। यमुनानगर के एक निजी स्कूल परिसर के अंदर पैरेंट्स मीटिंग के दौरान शनिवार को घटी इस दर्दनाक घटना में प्रिंसिपल को अस्पताल पहुंचने के बाद मृत घोषित कर दिया गया। आरोपी छात्र शिवांश छात्र को गिरफ्तार कर लिया गया है। बीतों दिनों में स्कूल परिसर के अंदर छात्रों द्वारा अपराध की इस तरह की कई घटनाएं लगातार सामने आई हैं। आज दादा-दादी से शिकायत करने पर मां अपने बेटे को मार डालती है। लखनऊ में एक महिला ने इसलिए आत्महत्या कर ली कि उसके पति ने उसे शापिंग कराने से इंकार कर दिया था। एक डाक्टर इसलिए आत्महत्या कर लेता है क्योंकि नॉनवेज खाने पर उसकी पत्नी ने काफी गुस्सा जताया था। इसके अलावा माता-पिता की डांट से क्षुब्ध होकर बच्चों के आत्महत्या करने की खबरें लगातार आती रहती हैं। 
स्कूलों में बढ़ रही हिंसा की घटनाओं को लेकर अभिभावक, टीचर, स्कूल के संचालक, पुलिस-प्रशासन सबके हाथ-पांव फूले हुए हैं। इस समस्या से कैसे निपटा जाए? स्कूल के संचालकों को एक ही रास्ता सूझता है कि सिक्यॉरिटी बढ़ा दी जाए, बाउंसर खड़े कर दिए जाएं, सीसीटीवी कैमरे लगा दिए जाएं। लेकिन ये उपाय समस्या के समाधान की दिशा में औचित्यपूर्ण नहीं है। यह तो जड़ों की बजाय पत्तों को सींचने वाली बात हैं। लखनऊ के स्कूल में तो लड़कियों के कपड़े उतारकर तलाशी ली जाने लगी। इससे बच्चियों और उनके मां-बाप के भीतर भारी रोष फैला, जो कि स्वाभाविक है। ऐसे पहरे के बीच पढ़ाई-लिखाई का क्या मतलब रह जाएगा? देखते-देखते हमारे स्कूल क्या से क्या बन गए हैं? क्या शिक्षा पाना भी अब कोई युद्ध लडऩे जैसा हो जाएगा? हमें समस्या की मूल को पकडऩा होगा।
‘औरों ने मेरे साथ ऐसा किया, इसलिए मैं भी उससे बदला लूं’ यह प्रतिशोध की भाषा प्रतिहिंसा की जंजीर है जिसमें बंधनें के बाद बुराइयों का प्रायश्चित्त कभी संभव नहीं। कभी कभार यदि ऐसा हो भी जाए मगर निर्दोष प्राणियों की मासूमियत को निर्दयता से कुचलते समय, मां-बेटियों के साथ दुराचार करते समय, धर्म और जाति के नाम हिंसा को आग देते समय कहां खो जाती है मानवीय संवेदना, मनुष्य होने का अहसास, समाज और देश के प्रति दायित्वबोध, न्याय-अन्याय के बीच खींची लक्ष्मणरेखा और कानून की दण्ड संहिता? इस सदी का असंतोष, आक्रोश असहमति, हिंसा और भय का दौर सोचने को विवश करता है कि मन इतना क्रूर कैसे बनता है? बिना गुनाह दण्ड कैसा? वह कौन-सी भाव संवेदना है जो मनुष्य को पागल बना देती है?
क्या हम यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि हमारे बच्चों के मन में क्या चल रहा है? घर-परिवार, स्कूल और समाज को कहीं वे अपने शत्रु की तरह तो नहीं देखने लगे हैं? अगर वे ऐसा करते हैं तो इसके लिये उन्हें ही दोषी नहीं माना जा सकता है, कहीं-न-कहीं हमारे अभिभावक, वर्तमान शिक्षा प्रणाली एवं स्कूली परिवेश भी इसके जिम्मेदार है। स्कूलों में हिंसक अथवा यौन विकृतियों को समय रहते पहचानने और बच्चों के साथ हिंसक घटनाएं रोकने के बाबत चिंता समाज और सरकारों को करनी होगी। जरूरत है मूल कारणों पर गौर करने और यथाशीघ्र स्वस्थ समाज की खोयी कडिय़ों को पहचान कर उन्हें पुन: दुरुस्त करने की। प्रगति और विकास के तमाम दावों के बीच बढ़ता तनाव आज के समाज में लम्बे समय से प्रमुख जगह बनाता जा रहा है। वजह आम भी होती है और खास भी होती है।
जीवन तो संघर्ष है और संघर्ष करने की क्षमता अपने भीतर पैदा करना बहुत जरूरी है। न तो अभिभावक और न ही समाज बच्चों में ऐसी क्षमता पैदा करने के लिए प्रेरक बन रहा है और न ही हमारी शिक्षा यह जिम्मेदारी उठाने में सक्षम दिखाई दे रही है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्यों हम बच्चों की मानसिकता नहीं समझ पा रहे हैं? क्यों बच्चों पर तरह-तरह के बोझ लाद कर उन्हें असन्तुलित एवं असहनशील बना रहे हैं? हम सही अर्थों में जीना सीखें। औरों को समझना और सहना सीखें। जीवन मूल्यों की सुरक्षा के साथ सबका सम्मान करना भी जानें। इस अर्थ में कही-न-कही चूक तो हो रही है, उसी की निष्पत्ति है बच्चों में बढ़ रही हिंसा की प्रवृत्ति।

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