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मेरठ में राष्ट्रीय स्वाभिमान की पुनस्र्थापना में आर्य समाज का योगदान

भारत में आर्य समाज की स्थापना चैत्र शुक्ल 5 विक्रम संवत् 1932 तदनुसार 10 अपै्रल 1875 को बम्बई में गिरगांव रोड स्थित डाक्टर माणिक चन्द की वाटिका में हुयी। बाद में इसने एक प्रभावी लोकप्रिय भारतीय सांस्कृतिक पुनर्जागरण आन्दोलन का रूप ले लिया। इसकी सक्रिय राष्ट्रवादी एवं सुधारात्मक गतिविधियों के कारण अंगे्रज सरकार आर्य समाज के आन्दोलन को संदेह की दृष्टि से देखने लगी। तत्कालीन एक अंगे्रज पत्रकार ने लिखा था, ” किसी भी आर्य समाजी की खाल खुरच कर देखो, तो अन्दर छिपा हुआ क्रांतिकारी देशभक्त लिखा हुआ दिखायी देगा।”
महर्षि दयानंद सरस्वती का मेरठ से निकट का सम्बन्ध रहा है। यहां 1857 की क्रांति के असफल हो जाने के बाद भी जनमानस में स्वीधीनता प्राप्त करने के लिए कुछ करने और आगे बढऩे की प्रवृत्ति विद्यमान थी। 29 सितम्बर 1878 को आर्य समाज के प्रवर्तक महर्षि दयानंद सरस्वती ने स्वयं अपने हाथों से मेरठ में आर्य समाज की आधार शिला रखी। इसका उद्देश्य धर्मोपदेश के माध्यम से देश की उन्नति करना बताया गया। इससे मेरठ नगर की जनता में नवीन उत्साह का संचार हुआ। उस समय मेरठ पहले से ही आर्य समाज की गतिविधियों का महत्वूपर्ण केन्द्र बना हुआ था। यह मेरठ का सौभाग्य रहा कि महर्षि दयानंद सरस्वती मेरठ नगर में आठ बार और एक बार जिले के प्राचीन कस्बा परीक्षितगढ़ तथा प्रांचीन तीर्थ स्थान गढ़मुक्तेश्वर भी आए। सर्वप्रथम आगरा से महर्षि दयानंद सन् 1866 में मार्च के प्रथम सप्ताह में मेरठ आए। यहां एक सूर्यकुण्ड पर देवी मन्दिर में ठहरे। यहां से प्रस्थान करके महर्षि दयानंद 12 मार्च 1866 को हरिद्वार पहुंच गए। सन् 1867 के हरिद्वार कुम्भ मेले से लौटते समय स्वामी दयानंद परीक्षितगढ़ और गढ़मुक्तेश्वर आए और यहां से कर्णवास चले गए। 16 जनवरी सन् 1877 को स्वामी दयानंद दिल्ली से मेरठ आए और सूर्यकुण्ड के समीप डिप्टी महताब सिंह की कोठी में रूके। यहां से 4 फरवरी 1877 को महर्षि दयानंद सहारनपुर चले गए। 26 अगस्त सन् 1878 को महर्षि दयानंद अलीगढ़ से मेरठ आए और मेरठ छावनी से बाबू दामोदर दास की कोठी में रहे। यहां से महर्षि दयानंद ने 9 अक्टूबर सन् 1878 को प्रस्थान किया। 15 जनवरी सन् 1879 को महर्षि दयानंद दिल्ली से मेरठ आए। उन्होंने हरिद्वार कुम्भ के लिए मेरठ में कई सहस्त्र आर्य समाज के विचारों के पत्रक छपवाये। 16 फरवरी 1879 को महर्षि दयानंद सहारनपुर से मेरठ आये तब उनके साथ कर्नल अल्काट और मैडम ब्लैक्ट्सकी भी थे। इस बार वह मेरठ छावनी की एक कोठी में ठहरे। 22 मई सन् 1879 को महर्षि दयानंद ने मेरठ से अलीगढ़ प्रस्थान किया। 8 जुलाई सन् 1880 को महर्षि दयानंद मैनपुरी से मेरठ आए और मेरठ छावनी से लाला रामशरण दास जी के बंगले में रुके। 15 सितम्बर 1880 को महर्षि दयानंद ने यहां से प्रस्थान किया। 27 सितम्बर सन् 1880 को महर्षि दयानंद मेरठ आए और 6 अक्टूबर सन् 1880 को सहारनपुर होते हुए देहरादून चले गए। 21 नवम्बर सन् 1880 को महर्षि दयानंद देहरादून से मेरठ आए और 26 नवम्बर सन् 1880 को उन्होंने यहां से दिल्ली के लिए प्रस्थान किया।
मेरठ के पंडित शिवदयालु के कथनानुसार, ” रूढि़वाद के गढ़ उत्तर प्रदेश को झकझोरने में ऋषि ने अपनी सर्वाधिक शक्ति लगायी और एक-एक स्थान पर पर सात-आठ बार जाकर तथा महीनों रहकर प्रचार किया। उत्तर प्रदेश ऋषि का सबसे अधिक ऋणी है।
जब महर्षि दयानंद सरस्वती 26 अगस्त 1878 को मेरठ आए और ठहरे तभी उन्होंने 29 सितम्बर 1878 को मेरठ आर्य समाज की स्थापना की। शीघ्र ही मेरठ उत्तर प्रदेश आर्य समाज का मुख्य केन्द्र बन गया।”
महर्षि दयानंद की मान्यता थी कि ” आर्यावर्त आर्यों के लिए है, आर्य विशिष्ट जाति है, वेद विशिष्ट ग्रंथ है और आर्यावर्त विशिष्ट भूमि है।” महर्षि दयानंद सरस्वती ने भारतीय संस्कृति व गौरव की पुनस्र्थापना के कार्य को आगे बढ़ाया। उनकी शिक्षाओं ने मवाना व मेरठ ही नहीं अपितु भारत के नवयुवकों में उत्साह और आत्मविश्वास की वह तरंग उत्पन्न कर दी, जिसने राष्ट्रीय भावनाओं के संचार के साथ-साथ हिन्दू समाज को संकोच का वह आवरण उतार देने को विवश कर दिया, जिससे वह भयभीत था।
यद्यपि आर्य समाज कोई राजनीतिक संस्था नहीं थी, परन्तु राष्ट्रीय भावनाओं के विस्तार में आर्य समाज ने सदैव सक्रिय योगदान दिया। महर्षि दयानंद की गर्जना, ” वेदों की ओर लौटो, अतीत से पे्ररणा लेकर आगे बढ़ो। भारत आर्य भूमि है, हमें पुन: विश्व में आदर्श राष्ट्र बनना है, पराधीनता अभिशाप और विकासमय बाधक होती है” ने न केवल राष्ट्रीय एकता, राष्ट्रीय गौरव व राष्ट्रीय सार्वभौमिकता को पुर्नस्थापित करने का मूल मंत्र दिया, वरन् भारतवासियों में पराधीनता की अपमानजनक बेडिय़ों से मुक्त होने की अदम्य अकांक्षा को भी जन्म दिया। वैलेन्टाईन चीरॉल ने अपनी पुस्तक ‘इण्डियन अनरेस्ट’ में लिखा कि, ”महर्षि दयानंद सरस्वती के उपदेशों का उद्देश्य हिन्दुओं की कुरीतियों में सुधार से अधिक विदेशी प्रभाव को निष्प्रभावी करने का है।” देश में जब आर्य समाज की स्थिति सुदृढ़ हो गयी तब आर्य समाज से प्रभावित भारतीयों में अंगे्रज विरोधी भावना और तीव्र हो गयी।”
स्वामी दयानंद मूलत: राष्ट्रवादी थे। पश्चिमी प्रभाव की परम्परा को नकारने वाले वह प्रथम सुधारवादी संत थे। उन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद को तेजस्विता की धार देते हुए सही अर्थों में एक स्वदेशीय दृष्टिकोण प्रदान किया। अपने ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में स्वराज्य की महत्ता का निरूपण करते हुए उन्होंने लिखा, ”चाहे कोई कितना ही कहे, परन्तु स्वदेशी राज्य ही सर्वोपरि उत्तम होता है।” भारत की अवनति व राजनीतिक परतन्त्रता के लिए महर्षि दयानंद आपसी फूट, मतभेद, ब्रह्मचर्य का पालन न करना, बाल्यावस्था में विवाह, विषयासक्ति, मिथ्याभाषणादि, कुलक्षण, वेदविद्या का अप्रचार आदि को उत्तरदायी मानते थे। महर्षि दयानंद का विचार था कि भारतीय संस्कृति के पुनस्र्थापन से ही हिन्दू समाज की इन विसंगतियों और कुरीतियों को दूर किया जा सकता है। उनके विचार से राजनैतिक स्वतन्त्रता, सामाजिक सुधार और वैदिक सभ्यता के पुनरोद्धार में कार्य-कारण-भाव का सम्बन्ध था।”
मेरठ जनपद से प्रारम्भ हुयी आर्य समाज की गतिविधियों का जहां नगरीय क्षेत्रों में जनमानस पर प्रभाव पड़ा, वहीं जनपद के ग्रामीण अंचलों में भी आर्य समाज के भजनोपदेशकों के माध्यम से आर्य समाज का संदेश पहुंचा। जनपद का मवाना क्षेत्र ऐसा रहा, जहां आर्य समाज द्वारा उत्पन्न की गयी राष्ट्रीय संचेतना का व्यापक व प्रभावी परिणाम देखने को मिला। फलस्वरूप मेरठ आर्य समाज की स्थापना के बाद मवाना में 11 अपै्रल 1886 को मवाना आर्य समाज की स्थापना हुयी। इसके बाद फलावदा, परीक्षितगढ़ और ढिक़ौली में आर्य समाज की विधिवत् स्थापना की गयी। महिला आर्य समाज की स्थापना 21 सितम्बर 1921 को हुयी। फलावदा आर्य समाज की नींव 1885 में रखी गयी। 1925 में खेड़ी आर्य समाज की स्थापना की गयी। आगे चलकर धार्मिक व सामाजिक अभियानों के संचालनार्थ, हिन्दी के प्रचार हेतु तथा इन जैसी अन्य गतिविधियों को चलाने के लिए परोपकारिणी सभा, आर्य प्रतिनिधि सभा, कुमार आश्रम, महिला आर्य समाज जैसी अनेक संस्थायें आर्य समाज के विचारों को केन्द्र में रखकर स्थापित की गयीं। आर्य समाज ने शिक्षा प्रसार का कार्य स्वयं किया। परिणामस्वरूप मेरठ के आसपास के गांवों, कस्बों मे अनेक विद्यालयों की स्थापना हुई। आर्य समाज के इन शिक्षण संस्थानों से डी.ए.वी. व गुरुकुलों से ऐसे स्नातकों की श्रृंखला तैयार हुयी, जिन्होंने राष्ट्रपे्रम, लोकसेवा, आत्मनिर्भरता, राष्ट्रीय एकता, मानसिक स्वतन्त्रता, आत्मत्याग के उद्दात्त आदर्शों को अपने सम्मुख रखा। यह गुरूकुलीय शिक्षा निम्न जातियों तथा अनुसूचित जातियों के लिए वरदान सिद्ध हुयी। इन जातियों के बालकों व युवकों को इनमें प्रवेश दिया गया और उन्हंह गायत्री प्रार्थना, संध्या, हवन तथा वेदाध्ययन का वैसा ही अवसर प्रदान किया गया, जैसा कि उच्च वर्ण के छात्रों को उपलब्ध था। आर्य समाज के इस कार्य से जहां हरिजनों को आर्य समाज के शिक्षण संस्थानों के बाहर भी शिक्षा का विस्तृत अवसर मिला, वहां अछूतों में आत्मविश्वास की भावना का अभ्युदय हुआ तथा उन्हें यह अनुभव हुआ कि वे भी भारतीय समाज, विशेषत: हिन्दू समाज के वैसे ही अंग हैं, जैसे कि अन्य और वह भी उच्च स्थिति प्राप्त कर सकते हैं।
आर्य समाज के माध्यम से स्वामी दयानंद सरस्वती ने महिलाओं की शिक्षा और उनके कल्याण का भी बीड़ा उठाया। परिणामस्वरूप मेरठ जनपद में अनेक आर्य कन्या विद्यालयों की स्थापना हुयी। इन्द्र विद्यावाचस्वति ने अपनी पुस्तक ”आर्य समाज का इतिहास” में लिखा है कि ”भारत के उत्तर के प्रांतों में स्त्रियों में जो अद्भुत जागृति दिखायी देती है, उसका बहुत-सा श्रेय आर्य समाज को है।”
इस प्रकार आर्य समाज के प्रयत्नों से मेरठ और विशेषत: मवाना में स्त्रियों की स्थिति में हर दृष्टि से परिवर्तन हुआ। नारी ने अपने कत्र्तव्यों के साथ-साथ अधिकारों को जाना और समाज में अपने महत्व को समझा। पारिवारिक दायित्वों को पूरा करने के अतिरिक्त स्त्रियों ने सार्वजनिक कार्यों में भी रूचि प्रदर्शित करनी प्रारम्भ की, स्त्री समाज गठित किये तथा आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम उठाया। इस स्थिति में पुरूषों ने भी नारी के सहयोग के महत्व को अनुभव किया। यही कारण रहा कि मेरठ की स्त्रियों ने स्वाधीनता संग्राम के प्रत्येक चरण में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया।
यहां बहुत बड़ी संख्या में आर्य समाज के विचार-प्रसार के लिए समर्पित कार्यकर्ताओं का निर्माण हुआ। जिन्होंने आर्य समाज के विचारों और सिद्धान्तों के प्रचार-प्रसार में अथक परिश्रम किया। चौधरी चंदन सिंह, ढिकौली के चौधरी भरत सिंह व फतह सिंह, परीक्षितगढ़ के लाला घासी राम, लाला फकीर चन्द्र, लाला देवी सहाय, लाला बाल मुकुंद, लाल छज्जू सिंह, पंडित जब्बन लाल, लाला गंगा सहाय, हर स्वरूप सिंह, चतुर्भुज, शांति सरन, जयन्ती सरन, महादेव शर्मा, नंदलाल आदि ऐसे व्यक्तित्व रहे, जिन्होंने आर्य समाज के माध्यम से सांस्कृतिक पुनरोत्थान के यज्ञ में अभूतपूर्व योगदान किया।
-प्रो. आराधना, विभागाध्यक्ष
इतिहास विभाग चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ

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