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इतिहास के तथ्यों को छुपाते इतिहासकार

केके मुहम्मद
अयोध्या के स्वामित्व के संबंध में 1990 में राष्ट्रीय स्तर पर बहस ने जोर पकड़ा। इसके पहले 1976- 77 में पुरातात्विक अध्ययन के दौरान अयोध्या उत्खनन में भाग लेने का मुझे अवसर मिला। प्रो बीबी लाल के नेतृत्व में अयोध्या उत्खनन की टीम में ‘दिल्ली स्कूल ऑफ आर्कियोलॉजी’ के 12 छात्रों में से मैं एक था। उस समय के उत्खनन में मंदिर के स्तंभों के नीचे के भाग में ईंटों से बनाया हुआ आधार देखने को मिला। किसी ने इसे समग्रता के साथ नहीं देखा। एक पुरातत्वविद की ऐतिहासिक सोच के साथ हम लोगों ने उसे निस्संग होकर देखा। उत्खनन के लिए जब मैं वहां पहुंचा तब बाबरी मस्जिद की दीवारों में मंदिर के स्तंभ थे। उन स्तंभों का निर्माण ‘ब्लैक बसाल्ट’ पत्थरों से किया गया था। स्तंभ के नीचे भाग में 11वीं-12वीं सदी के मंदिरों में दिखने वाले पूर्ण कलश बनाए गए थे। मंदिर कला में पूर्ण कलश आठ ऐश्वर्य चिन्हों में एक हैं।
1992 में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के पहले इस तरह के एक या दो स्तंभ नहीं, 14 स्तंभों को हमने देखा। पुलिस सुरक्षा में रही मस्जिद में प्रवेश मना था, लेकिन उत्खनन और अनुसंधान से जुड़े होने के कारण हमारे लिए किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं था। उत्खनन के लिए हम करीब दो महीने अयोध्या में रहे। बाबर के
सेनानायक मीर बकी द्वारा तोड़े गए या पहले से तोड़े गए मंदिरों के अंशों का उपयोग करके मस्जिद का निर्माण किया गया था। उत्खनन से मिले सुबूतों के आधार पर मैंने 15 दिसंबर, 1990 को बयान दिया कि बाबरी मस्जिद के नीचे मंदिर के अंशों को मैंने स्वयं देखा है। उस समय माहौल गरम था। हिंदू और मुसलमान दो गुटों में बंटे थे। कई नरमपंथियों ने समझौते की कोशिश की, परंतु राम जन्मस्थान पर विश्व हिंदू परिषद ने अपनी पकड़ मजबूत कर ली थी। बाबरी मस्जिद हिंदुओं को देकर समस्या का समाधान करने के लिए नरमवादी मुसलमान तैयार थे, परंतु इसे खुलकर कहने की किसी में हिम्मत नहीं थी।
बाबरी मस्जिद पर दावा छोडऩे से विहिप के पास फिर कोई मुद्दा नहीं होगा, कुछ मुसलमानों ने ऐसा भी सोचा। इस तरह के विचारों से समस्या के समाधान की संभावना होती। खेद के साथ कहना पड़ेगा कि उग्रपंथी मुस्लिम गुट की मदद करने के लिए कुछ वामपंथी इतिहासकार सामने आए और उन्होंने मस्जिद नहीं छोडऩे का
उपदेश दिया। उन्हें यह मालूम नहीं था कि वे कितना बड़ा पाप कर रहे हैं। जेएनयू के केएस गोपाल, रोमिला थापर, बिपिन चंद्रा जैसे इतिहासकारों ने कहा कि 19वीं सदी के पहले मंदिर तोडऩे का सुबूत नहीं है। उन्होंने अयोध्या को ‘बौद्घ-जैन केंद्र’ कहा। उनका साथ देने के लिए आरएस शर्मा, अनवर अली, डीएन झा, सूरजभान, प्रो. इरफान हबीब आदि भी आगे आए। इनमें केवल सूरजभान पुरातत्वविद् थे। प्रो आरएस शर्मा के साथ रहे कई इतिहासकारों ने बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के विशेषज्ञों के रूप में कई बैठकों में भाग लिया।
इस कमेटी की कई बैठकें भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष प्रो इरफान हबीब की अध्यक्षता में हुईं। कमेटी की बैठक इस परिषद के कार्यालय में आयोजित करने का परिषद के तत्कालीन सदस्य सचिव एवं इतिहासकार प्रो एमजीएस नारायण ने विरोध भी किया, किंतु प्रो इरफान हबीब ने उसे नहीं माना। वामपंथी इतिहासकारों ने अयोध्या की वास्तविकता पर सवाल उठाते हुए लगातार लेख लिखे और उन्होंने जनता में भ्रम और असमंजस पैदा किया। वामपंथी इतिहासकार और उनका समर्थन करने वाले मीडिया ने समझौते के पक्ष में रहे मुस्लिम बुद्घिजीवियों को अपने उदार विचार छोडऩे की पे्ररणा दी। इसी कारण मस्जिद को हिंदुओं के लिए छोडक़र समस्या के समाधान के लिए सोच रहे मुसलमानों ने अपनी सोच में परिवर्तन कर लिया और मस्जिद नहीं देने के पक्ष में विचार करना शुरू कर दिया। साम्यवादी इतिहासकारों के हस्तक्षेप से उनकी सोच में परिवर्तन हुआ। इस तरह समझौते का दरवाजा हमेशा के लिए बंद कर दिया गया। अगर समझौता होता तोहिंदू- मुस्लिम संबंध ऐतिहासिक दृष्टि से नए मोड़ पर आ जाते और कई समस्याओं का सामाजिक हल भी हो सकता था।
इससे एक बात स्पष्ट हो जाती है कि मुस्लिमर्-ंहदू उग्रपंथी ही नहीं, साम्यवादी उग्रपंथी भी राष्ट्र के लिए खतरनाक हैं। पंथनिरपेक्ष होकर समस्या को देखने के बजाय वामपंथियों की आंख से अयोध्या मामले का विश्लेषण करके एक बड़ा अपराध किया गया। इसके लिए राष्ट्र को बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। इतिहास अनुसंधान परिषद में समस्या का समाधान चाहने वाले थे, परंतु इरफान हबीब के सामने वे कुछ नहीं कर सके। संघ परिवार की असहिष्णुता को पाकिस्तान की असहिष्णुता और आइएस के निष्ठुर कार्यों से तुलना करने में इतिहास अनुसंधान परिषद के कई सदस्य सहमत नहीं होंगे, लेकिन विरोध में बोलने के लिए कोई तैयार नहीं हुआ।
अयोध्या मामले के पक्ष और विपक्ष में इतिहासकार और पुरातत्वविद् दो गुटों में बंटे हुए थे। बाबरी मस्जिद तोडऩे से प्राप्त हुआ महत्वपूर्ण पुरातत्व अवशेष है-‘विष्णु हरिशिला पटल’। इसमें 11वीं-12वीं सदी की नागरी लिपि में संस्कृत भाषा में लिखा गया है कि यह मंदिर बाली और दस हाथों वाले (रावण) को मारने वाले विष्णु (श्रीराम विष्णु के अवतार माने जाते हैं) को समर्पित किया जाता है।
डॉ. वाईडी शर्मा और डॉ. केएन श्रीवास्तव द्वारा 1992 में किए गए निरीक्षण में वैष्णव अवतारों और शिव-पार्वती के कुशान जमाने (100-300 एडी) की मिट्टी की मूर्तियां प्राप्त हुईं। 2003 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच के निर्देशानुसार किए गए उत्खनन में करीब 50 मंदिर-स्तंभों के नीचे के भाग में ईंट से बनाया चबूतरा दिखाई पड़ा। इसके अलावा मंदिर के ऊपर का आमलका और मंदिर के अभिषेक का जल बाहर निकालने वाली मकर प्रणाली भी उत्खनन से प्राप्त हुई। पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के उप्र के निदेशक की रिपोर्ट में बताया गया कि बाबरी मस्जिद के आगे के भाग को समतल करते समय मंदिर से जुड़े हुए 263 पुरातत्व अवशेष प्राप्त हुए। उत्खनन से प्राप्त सुबूतों और पौराणिक अवशेषों के विश्लेषण से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग इस निर्णय पर पहुंचा कि बाबरी मस्जिद के नीचे एक मंदिर था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच भी इसी निर्णय पर पहुंची।
उत्खनन को निष्पक्ष रखने के लिए कुल 137 श्रमिकों में 52 मुसलमान थे। बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के प्रतिनिधि के तौर पर सूरजभान मंडल, सुप्रिया वर्मा, जया मेनन आदि के अलावा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक मजिस्ट्रेट भी शामिल थे। उत्खनन को इससे ज्यादा निष्पक्ष कैसे बनाया जा सकता था? उच्च न्यायालय का फैसला आने के बाद भी वामपंथी इतिहासकार गलती मानने को तैयार नहीं हुए। इसका मुख्य कारण यह था कि उन्होंने बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के प्रतिनिधि के रूप में उत्खनन में भाग लिया था। इनमें तीन-चार को ही तकनीकी दृष्टि से पुरातत्व मालूम था।
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के उत्तरी क्षेत्र के पूर्व क्षेत्रीय निदेशक हैं और यह लेख उनकी हालिया पुस्तक- मैं हूं भारतीय (प्रभात प्रकाशन) का एक संपादित अंश है। )

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