गतांक से आगे….

गुरू व्यक्ति नहीं, एक दिव्य शक्ति है :-

नर-नारायण है गुरू,

देानों ही उसके रूप।

संसारी क्रिया करै,

किन्तु दिव्य स्वरूप ।। 1168 ।।

व्याख्या :-”गुरू व्यक्ति नहीं, एक दिव्य शक्ति है।” वे बेशक इंसानी चोले में खाता-पीता उठता बैठता, सोता-जागता, रोता-हंसता तथा अन्य सांसारिक क्रियाएं करता हुआ दिखाई देता है, किंतु जब वह अपने दिव्य स्वरूप में विचरण करता है, दिव्य जीवन जीता है तब वह परमपिता परमात्मा की दिव्यशक्ति का प्रतिनिधि होता है। सृष्टिï के आदि काल से आज तक जितना भी सभ्यता और संस्कृति का बहुआयामी विकास हुआ है, इसके पीछे यदि कोई प्रेरक तत्त्व छिपा है, तो वह परमपिता परमात्मा की दिव्यशक्ति का प्रतिनिधि ‘गुरू’ है।

जल हमेशा नीचे की तरफ बहता है, किंतु जब वह अग्नि तत्त्व के संपर्क में आता है तो वही जल वाष्प बनकर आकाश की ऊंचाईयों को छूने लगता है और बादल बनकर प्यासी धरती की प्यास बुझाता है। चारों तरफ हरियाली लाता है। पावस ऋतु और सुख समृद्घि का कारक बनता है। ठीक इसी प्रकार गुरू अपनी ज्ञानरूपी अग्नि से नीचे पड़े हुए व्यक्ति को ऊंचा उठाता है, अर्थात उसके व्यक्तित्त्व को अपने ज्ञान से आलोकित करता है, उसे अपने जैसा प्रकाशपुंज बना देता है। ऐसे व्यक्ति आने वाली पीढिय़ों के लिए प्रेरणास्रोत होते हैं, आदर्श होते हैं, देश धर्म, सभ्यता संस्कृति और सुख-समृद्घि के प्राण होते हैं, युग-प्रवर्तक होते हैं। जैसे-गुरू बिरजानंद ने अपनी ज्ञान-अग्नि से मूलशंकर को महर्षि देव दयानंद बना दिया। स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने बालकनरेन्द्र को स्वामी विवेकानंद बना दिया। आचार्य चाणक्य ने दासी पुत्र चंद्रगुप्त को भारत का सम्राट बना दिया। इतिहास में इस प्रकार के उदाहरण एक नहीं अनेक हैं। इतना ही नहीं अपितु गुरू के महत्व के संदर्भ में यह कहा जाए कि जिस प्रकार शरीर और आत्मा का मिलन प्राण कराते हैं, ठीक इसी प्रकार गुरू भी वह दिव्य शक्ति है, जो आत्मा का परमात्मा से मिलन कराती है, साक्षात्कार कराती है। यहां तक कि एक साधारण से मनुष्य को इतना ऊंचा उठाती है कि मोक्षधाम तक पहुंचाती है।

संसार में यदि कोई पूजनीय है तो परमात्मा के बाद माता-पिता और आचार्य अर्थात गुरू है। परमात्मा तो केवल जीवन देग है, जबकि जीवन जीने की विधि अथवा जीवन उत्कर्षता को कैसे प्राप्त हो? इसके लिए मनुष्य के अंतस्थ में सोयी हुई शक्ति को गुरू ही तो जाग्रत करता है, जीवन जीने की विधि बताता है। इसे ऐसे समझिये मान लीजिये किसी के पास वाद्य-यंत्र हारमोनियम अथवा वीणा है, किंतु उसे बजाना नहीं जानता है तो वह वाद्य-यंत्र उसके लिए व्यर्थ हैं, ठीक इसी प्रकार यदि किसी को जीवन तो मिल गया किंतु उसे जीवन जीना नहीं आता तो उसके लिए जीवन व्यर्थ हो जाता है।

यदि कोई वाद्य यंत्र बजाना सिखा दे उससे तरह-तरह की धुन और उर्मियां (स्वर लहरी) निकालना सिखा दे तो वही वाद्य-यंत्र कितना अच्छा लगता है? ठीक इसी प्रकार कोई जीवन जीने की विद्या सिखा दे, तो जीवन कितना रूचिकर लगता है? बताया नहीं जा सकता है। यह पुनीत कार्य वह दिव्य शक्ति ही कर सकती है, जिसे समाज ‘गुरू’ के नाम से संबोधित करता है।

क्रमश:

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