मन घटता बढ़ता रहै, अटल विधि का विधान

बिखरे मोती-भाग 237

गतांक से आगे….

हम मंदिर अथवा पूजागृह में भी जाते हैं, तो मांगों की फहरिश्त लेकर जाते हैं और अपने आराध्य देव की अथवा परमात्मा की पूजा सशर्त करते हैं-यदि तुम मेरी यह मांग पूरी कर दोगे, तो मैं इतना चढ़ावा अथवा प्रसाद बांटूंगा। कैसी घटिया सोच हो गयी है, आज के आधुनिक इंसान की? यह देखकर इनकी बुद्घि पर तरस भी आता है और हंसी भी। क्या परमात्मा तुम्हारे चढ़ावे अथवा प्रसाद के भूखे हैं? आसमान से ओस की बूंदें रोज थोड़ी थोड़ी टपकती हैं लेकिन दिखाई नहीं देती हैं, ठीक इसी प्रकार वह परमपिता परमात्मा हमारे जीवन में रोज थोड़ी-थोड़ी खुशियां अथवा कृपाएं बरसाता रहता है किंतु हम समझ नहीं पाते हैं। उसकी कृपाओं को कोई बिरला ही विवेकशली व्यक्ति समझता है और फिर सच्चे दिल से आभार व्यक्त करता है।

यह संसार सापेक्षता के सिद्घांत पर टिका हुआ है। बिना पारस्परिक सहयोग के सांसारिक जीवन चल नहीं सकता है। इसलिए हमारे जीवन को सुखकर बनाने में यदि कोई थोड१ा भी सहयोग दे तो उसका तहेदिल से आभार व्यक्त करना चाहिए और प्रभु को भी तहेदिल से धन्यवाद देना चाहिए तथा यह कहना चाहिए कि हे प्रभु! अमुक व्यक्ति तो आपने निमित्त बनाया था अन्यथा आप ही मेरी मदद करने आये थे तेरा लाख-लाख शुक्रिया….।

यदि आपके हाथों किसी की मदद अथवा परोपकार का कार्य हो जाए, तो भी परमात्मा का आभार यह कहकर कीजिए-हे प्रभु! तेरी कृपा है, जो मैं दूसरों का हमदर्द बन सका, मददगार बन सका अन्यथा मेरी क्या हस्ति है? इसके लिए आपका तहेदिल से शुक्रिया…। ऐसा आचरण करने से आप अहंकार के अंधकार से बचे रहेंगे और प्रभु-कृपा के पात्र भी निरंतर बने रहेंगे।

इन चार बातों पर चिंतन अवश्य करें।

मन घटता बढ़ता रहै,

अटल विधि का विधान।

आयु घटती रोज है,

तृष्णा होय जवान ।। 1172 ।।

व्याख्या:-यह दृश्यमान विश्व विधाता ने ऐसा बनाया है कि विचित्रताओ और विविधताओ से भरा पड़ा है। हमारे ऋषियों ने मनीषियों ने इस पर गहन चिंतन किया तो पाया कि हमारे मन का संबंध चंद्रमा से है-जैसे चंद्रमा रोज घटता बढ़ता रहता है, ठीक इसी प्रकार हमारा मन कभी मायूस हो जाता है, तो कभी उत्साह से ओत-प्रोत हो जाता है। हमारी आयु प्रतिपल घटती जा रही है, वृद्घावस्था और मृत्यु उतनी ही समीप आती जा रही है किंतु सबसे बड़ा आश्चर्य इस बात का है कि बेशक हमारे अंग बुढ़ापे की वजह से शिथिल होते जा रहे हैं लेकिन हमारी तृष्णा दिनोंदिन युवा होती जा रही है। इस परिवर्तनशील संसार में यदि कोई अटल है, शाश्वत है, तो वह केवल परमपिता परमात्मा के नियम ही हैं जो अपरिवर्तनशील हैं। भाव यह है कि ऋत के नियम कल भी सच थे, आ भी सच हैं और कल भी सच रहेंगे। सच पूछो तो इस सृष्टिï क्रम का आधार ऋत के शाश्वत नियम ही हैं जिनसे यह सृष्टिï यज्ञ चल रहा है।

हे परमपिता परमात्मना मेरे अंत:करण में बस जाओ।

लोह तत्त्व अंत:करण,

अग्नि तत्त्व अज्ञेय।

ऊर्जा बन चेतन करै,

जीवन नैया खेय ।। 1173।।

व्याख्या :-परमपिता परमात्मा को ऋग्वेद में हे अग्नेय! कहकर पुकारा गया है। अग्नि में प्रकाश, ऊर्जा और दाहकता की शक्ति निहित होती है, वह अपनी ऊर्जा से लोहे से बने कल-पुर्जे अथवा मशीनरी को गतिमान रखती है। परमपिता परमात्मा को अज्ञेय इसलिए कहते हैं कि उसको तथा उसके रहस्यों को अथवा अपरम्पार महिमा को कोई आजतक नहीं जान सका है। इसीलिए ऋषियों ने हार थककर उसे नेति-नेति कहा, अज्ञेय कहा है। परमपिता परमात्मा ने जब यह इच्छा की कि-‘एको अहं बहुस्यां’ अर्थात मैं एक से अनेक हो जाऊं तो यह दृश्मान संसार उत्पन्न हुआ।

क्रमश: 

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