सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश ( एक से सातवें समुल्लास के आधार पर) अध्याय – 25 ( ख )

सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश

देश की वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था

राजनीति को इतना शुद्ध और पवित्र होना चाहिए कि वह दंड के योग्य को दंड दे सके और प्रशंसा के योग्य की प्रशंसा कर सके। इसके लिए वर्तमान समय में देश में जिस प्रकार की लोकतांत्रिक व्यवस्था काम कर रही है वह भी विकारग्रस्त है। देश की बहुदलीय संसदीय व्यवस्था देश के लिए घातक सिद्ध हो चुकी है। इसमें किसी एक नेता की बुद्धि से हांके जाने वाले कुछ लोग जनप्रतिनिधियों के नाम पर संसद में ले जाकर बैठाये जाते हैं । जिन्हें एक नेता अनुशासन के नाम पर हांकता है अर्थात उनसे वही बुलवाने का अनैतिक और अवैधानिक कृत्य करता है जिसे वह अपने लिए और अपने दल के लिए उचित मानता है। इससे देश की समस्याओं के बारे में गंभीर, स्पष्ट और निष्पक्ष चिंतन संसद या विधानमंडलों के माध्यम से निकल नहीं पाता । वह किसी व्यक्ति के इर्द-गिर्द केंद्रित होकर रह जाता है । उसकी सोच, उसके चिंतन और उसके पूर्वाग्रहों का दास बन जाता है।

इसके लिए उचित यह होगा कि जब कोई जनप्रतिनिधि जनता के द्वारा चुन लिया जाए तो वह अपने दल ,उसकी सोच या उसके चिंतन को या उसकी विचारधारा को संसद अथवा विधानमंडलों के द्वार पर छोड़कर संसद अथवा विधानमंडलों में जा कर बैठे। उस समय उसे केवल और केवल देश के बारे में सोचने का संकल्प लेना चाहिए। इतना ही नहीं, संसद अथवा विधान मंडलों में उसे वही बोलना चाहिए जो देश के लिए उचित हो। ऐसी स्थिति का समर्थन करते हुए स्वामी दयानंद जी महाराज सत्यार्थ प्रकाश के छठे समुल्लास में लिखते हैं कि :-
“जिस सभा में निन्दा के योग्य की निन्दा, स्तुति के योग्य की स्तुति, दण्ड के योग्य को दण्ड और मान्य के योग्य को मान्य होता है ,वहां राजा और सभासद् पाप से रहित और पवित्र हो जाते हैं, पाप के कर्त्ता ही को पाप प्राप्त होता है।”

भारत की प्राचीन न्याय व्यवस्था और आज की न्याय व्यवस्था

भारत में लगभग 34000 कानून ऐसे हैं जो अंग्रेजों के समय से ही चले आ रहे हैं। अंग्रेजों ने इन सारे कानूनों को अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए अर्थात अपने राज्य को यहां चिरकाल तक स्थापित किए रखने के उद्देश्य से प्रेरित होकर बनाया था। इसके अतिरिक्त उनका एक महत्वपूर्ण स्वार्थ यह भी था कि वे भारत के लोगों की आर्थिक रीढ़ को तोड़ देना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने भारतवासियों को कानूनी जटिलताओं में फंसाकर चूसने का एक कानूनी ढंग अपनाया । कानून की इस प्रकार की जटिलताओं में फंसाकर भारतवासियों को चूसने में उस समय की न्याय व्यवस्था ने भी अंग्रेजों का साथ दिया । इसे इस प्रकार भी कह सकते हैं कि अंग्रेजों ने अपनी न्यायव्यवस्था ही इस प्रकार की बनाई थी जिससे वे भारतवासियों का रक्त चूस सकते थे ।

अंग्रेजों के द्वारा जिस न्याय व्यवस्था को भारतवर्ष में लागू किया गया वह प्रारंभ से ही दोषपूर्ण थी। इस न्याय व्यवस्था में स्वतंत्र और निष्पक्ष साक्षियों के लिए कभी कोई स्थान नहीं रहा। आज भी ऐसे अनेकों प्रकरण सामने आते हैं जिनमें न्यायालयों में जाकर झूठे साक्षी गवाही देते हैं। इस संबंध में भारत की प्राचीन न्याय व्यवस्था सचमुच अनुकरणीय रही है। स्वामी दयानंद जी महाराज न्यायालयों में न्यायिक व्यवस्था की पारदर्शिता को सुनिश्चित करते हुए लिखते हैं कि सब वर्णों में धार्मिक, विद्वान्, निष्कपटी, सब प्रकार धर्म को जानने वाले, लोभरहित, सत्यवादियों को न्यायव्यवस्था में साक्षी करे, इन से विपरीतों को कभी न करे। स्वामी जी महाराज यह भी स्पष्ट करते हैं कि न्यायालय में स्त्री के लिए स्त्री, शूद्र के लिए शुद्र और अंत्यजों के लिए अंत्यज साक्षी के रूप में प्रस्तुत किए जाने चाहिए। इस प्रकार की व्यवस्था से नारियों की शीलता का उल्लंघन नहीं होता।

नारी के प्रति भारत का दृष्टिकोण

भारत में वेद आदि आर्ष ग्रंथों के अध्ययन से स्पष्ट हो जाता है कि नारी प्राचीन काल से ही सम्मान की अधिकारिणी रही है। भारत के समाज में उसका महत्वपूर्ण और सम्माननीय स्थान था। वेदों की आर्ष परंपरा में नारी के लिए एक भी शब्द ऐसा कहीं ना तो लिखा गया और ना ही प्रयोग किया जाता था जिससे उसकी गरिमा को ठेस पहुंचे। महिलाओं को समानता का अधिकार था। पुरुष वर्ग भी महिलाओं को सम्मान की दृष्टि से देखता था। धार्मिक क्रियाकलापों और अनुष्ठानों में भी नारी को सम्मान पूर्ण स्थान दिया जाता था।
मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जी इसके उदाहरण हैं। जिनके नारी के प्रति सम्मान भाव को देखने से स्पष्ट होता है कि रामायण काल तक भी वेदों की परंपराओं का कठोरता से पालन किया जाता था। श्री राम ने जितने भी अनुष्ठान किए उसमें सीता जी को अपने साथ रखा। प्राचीन भारत में अनेक विदूषी महिलाएं हुईं जिन्होंने अपने महान कार्यों से भारत का नाम रोशन किया। लोपामुद्रा, घोषा, अपाला इत्यादि इसके श्रेष्ठ उदाहरण हैं।
स्वामी दयानंद जी महाराज भारतवर्ष की नारियों को फिर लोपामुद्रा, घोषा , अपाला जैसी बना देने के पक्षधर थे। इसके लिए उन्होंने नारियों के लिए शिक्षा के द्वार खोले। गुरुकुलों के माध्यम से उन्होंने नारियों को शिक्षा दिलाने का बड़ा भारी आंदोलन खड़ा किया । उनके देहांत के पश्चात इस दिशा में आर्य समाज ने महत्वपूर्ण कार्य भी किया। जिससे वर्तमान अतीत के इतिहास से जा जुड़ा और आर्य समाज के मंच पर अनेक विदुषी महिलाओं ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।
यही कारण है कि स्वामी दयानंद जी महाराज सत्यार्थ प्रकाश में नारियों के सम्मान का पूरा ध्यान रखते हुए यह भी व्यवस्था करते हैं कि “जितने बलात्कार काम, चोरी, व्यभिचार, कठोर वचन, दण्डनिपातन रूप अपराध हैं उन में साक्षी की परीक्षा न करे और अत्यावश्यक भी न समझे क्योंकि ये काम सब गुप्त होते हैं।”

वर्तमान में न्याय और न्याय के मंदिर

आज की पूरी न्याय व्यवस्था में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि जितने बलात्कार काम ,चोरी व्यभिचार, कठोर वचन, दंडनिपातन, रूप अपराध हैं, उनमें साक्षी की परीक्षा नहीं होगी। आज की न्याय व्यवस्था अथवा आज के कानून सच्ची साक्षी देने वाले लोगों लोगों को सुरक्षा देने में असफल रहे हैं। झूठे साक्षी समाज में खुले घूमते हैं और सच्चा साक्षी गवाही देने से इसलिए मुकर जाता है कि ऐसा करने से उसके प्राण संकट में पड़ जाएंगे।
परिस्थितियों के आधार पर बने पारिस्थितिकीय साक्ष्य का अवलोकन करने और उसके आधार पर न्याय करने की स्थिति अब न्यायालय में कम ही बनती हुई देखी जाती है। जब न्यायिक क्षेत्रों में काम कर रहे अधिकारियों और न्यायाधीशों पर घूस या रिश्वतखोरी के आरोप लगते हैं तो बड़ा दुख होता है। न्याय के मंदिर में भी यदि न्याय बिकेगा तो फिर न्याय की अपेक्षा कहां से की जा सकती है ?
साक्षी देने वाले लोगों के संबंध में स्वामी जी की व्यवस्था है कि जो साक्षी सत्य बोलता है वह जन्मान्तर में उत्तम जन्म और उत्तम लोकान्तरों में जन्म को प्राप्त होके सुख भोगता है। इस जन्म वा परजन्म में उत्तम कीर्त्ति को प्राप्त होता है, क्योंकि जो यह वाणी है वही वेदों में सत्कार और तिरस्कार का कारण लिखी है। जो सत्य बोलता है वह प्रतिष्ठित और मिथ्यावादी निन्दित होता है।
सत्य बोलने से साक्षी पवित्र होता और सत्य ही बोलने से धर्म बढ़ता है, इससे सब वर्णों में साक्षियों को सत्य ही बोलना योग्य है। आत्मा का साक्षी आत्मा और आत्मा की गति आत्मा है इसको जान के हे पुरुष ! तू सब मनुष्यों का उत्तम साक्षी अपने आत्मा का अपमान मत कर अर्थात् सत्यभाषण जो कि तेरे आत्मा मन वाणी में है वह सत्य और जो इस से विपरीत है वह मिथ्याभाषण है।
जिस बोलते हुए पुरुष का विद्वान् क्षेत्रज्ञ अर्थात् शरीर का जानने हारा आत्मा भीतर शंका को प्राप्त नहीं होता उस से भिन्न विद्वान् लोग किसी को उत्तम पुरुष नहीं जानते।
न्यायालयों में जाकर न्याय को प्रभावित करने के उद्देश्य से प्रेरित होकर जो लोग किसी भी प्रकार से झूठी गवाही देते हैं उनके लिए मनु महाराज ने विभिन्न प्रकार के दंड निश्चित किए हैं। सत्यार्थ प्रकाश में स्वामी दयानंद जी महाराज के द्वारा मनु महाराज की उस व्यवस्था का समर्थन किया गया है अर्थात झूठी गवाही देने वालों को शासन में बैठे लोगों द्वारा दंडित करना चाहिए। इससे भी न्याय और न्याय की प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहती है। इसके अतिरिक्त झूठी गवाही देने के लिए जब एक व्यक्ति को दंडित कर दिया जाएगा तो दूसरे पर उसका प्रभाव पड़ेगा और वह चाह कर भी झूठी गवाही देने के लिए न्यायालय में नहीं जाएगा।

झूठे गवाहों का क्या हो?

स्वामी दयानंद जी लिखते हैं कि जो लोभ से झूठी साक्षी देवे उस से १५।।=)(पन्द्रह रुपये दश आने) दण्ड लेवे, जो मोह से झूठी साक्षी देवे उस से ३=) (तीन रुपये दो आने) दण्ड लेवे, जो भय से मिथ्या साक्षी देवे उस से ६।) (सवा छः रुपये ) दण्ड लेवे और जो पुरुष मित्रता से झूठी साक्षी देवे उससे १२।।) (साढ़े बारह रुपये) दण्ड लेवे।
जो पुरुष कामना से मिथ्या साक्षी देवे उससे २५) (पच्चीस रुपये) दण्ड लेवे, जो पुरुष क्रोध से झूठी साक्षी देवे उससे ४६।।।=) छयालीस रुपये चौदह आने) दण्ड लेवे, जो पुरुष अज्ञानता से झूठी साक्षी देवे उससे ३) (तीन रुपये) दण्ड लेवे और जो बालकपन से मिथ्या साक्षी देवे तो उससे १।।-) (एक रुपया नौ आने) दण्ड लेवे।
यदि न्याय देने में किसी प्रकार का पक्षपात किया जाता है तो इससे धर्म की हानि होती है। ऐसे राजा को इस लोक में ही नहीं परलोक में भी कभी शांति प्राप्त नहीं हो सकती। ऐसी व्यवस्थाओं से यह स्पष्ट किया गया कि राजा को हर स्थिति में न्यायशील होना चाहिए और न्याय व धर्म की रक्षा के लिए समर्पित होकर कार्य करना चाहिए। राजा को ऐसी व्यवस्था हर स्थिति में बनाकर रखनी चाहिए कि कोई ऐसा व्यक्ति जो दंड का अधिकारी नहीं है, उसे भूलकर भी दंड का पात्र न माना जाए। यदि न्याय व्यवस्था अदंडनीय व्यक्ति को दंडित करती है तो इससे बड़ा पाप कोई नहीं हो सकता।

“जो राजा दण्डनीयों को न दण्ड और अदण्डनीयों को दण्ड देता है अर्थात् दण्ड देने योग्य को छोड़ देता और जिस को दण्ड देना न चाहिये उस को दण्ड देता है वह जीता हुआ बड़ी निन्दा को और मरे पीछे बड़े दुःख को प्राप्त होता है इसलिये जो अपराध करे उस को सदा दण्ड देवे और अनपराधी को दण्ड कभी न देवे।”
जब शासन और शासन बैठे लोग न्याय व्यवस्था को इसी प्रकार निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने के लिए समर्पित होते हैं तो ऐसी शासन व्यवस्था और न्याय व्यवस्था को विवेकी जनों की शासन व्यवस्था और न्याय व्यवस्था कहा जाता है। यह लोग अपने अपने धर्म के प्रति समर्पित होते हैं और उन्हें संसार का किसी प्रकार का लोभ, मोह या आकर्षण उनके कर्तव्य धर्म से डिगा नहीं पाता है।
अपने अपने नैतिक सिद्धांतों अथवा कर्तव्य कर्म या धर्म पर मजबूती से स्थिर रहने से और उसके निभाने के प्रति समर्पित रहने से समाज में धर्म का शासन बना रहता है।
इसके लिए न्याय व्यवस्था और शासन व्यवस्था में बैठे लोगों का निष्पक्ष और न्याय प्रिय होना आवश्यक है । उनकी यह निष्पक्षता उन्हें एक तपस्वी राजा या तपस्वी न्यायाधीश का सम्मान दिलाती है।
वास्तव में स्वामी जी महाराज ने सत्यार्थ प्रकाश में कदम कदम पर जिस प्रकार भारत के अतीत को उल्लिखित करने का कार्य किया है उससे हमें अपने अतीत के स्वर्णिम इतिहास का बोध होता है। हमें पता चलता है कि हम प्रत्येक क्षेत्र में एक बहुत ही उत्कृष्ट व्यवस्था को लेकर चल रहे थे। आज हमें इस बात पर विचार करने की आवश्यकता है कि हमारी यह उत्कृष्ट व्यवस्था कहां और कैसे लुप्त हो गई ?

डॉ राकेश कुमार आर्य


मेरी यह पुस्तक डायमंड बुक्स नई दिल्ली के द्वारा प्रकाशित हुई है । जिसका अभी हाल ही में 5 अक्टूबर 2000 22 को विमोचन कार्य संपन्न हुआ था। इस पुस्तक में सत्यार्थ प्रकाश के पहले 7 अध्यायों का इतिहास के दृष्टिकोण से विश्लेषण किया गया है। पुस्तक में कुल 245 स्पष्ट हैं। पुस्तक का मूल्य ₹300 है।
प्रकाशक का दूरभाष नंबर : 011 – 407122000।

Comment:

Latest Posts

hititbet giriş
betgaranti giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
hititbet giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
hititbet
hititbet
Tuzla İpek Kirpik
hititbet giriş
hititbet
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
hititbet
hititbet
Hititbet
Hititbet Güncel Giriş
Hititbet Yeni Giriş
Hititbet Resmi Gİriş
betnano
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betyap giriş
hititbet giriş
betpark giriş
betnano
betnano
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
grandpashabet
betgaranti giriş
hititbet
hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti
betgaranti güncel giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
betnano
betnano
betkom giriş
hitbet giriş
hitbet giriş
betbox giriş
betbox giriş
betpas giriş
betpas giriş
betkom giriş
betpas giriş