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अयोध्या का कल्पवास एक साधना है ?

आचार्य डा.राधे श्याम द्विवेदी

अयोध्यावास की लालसा:-
राम करणामृतम(१/६३-६५) में अयोध्यावास की लालसा
का वर्णन कुछ इस प्रकार किया गया है।यह अयोध्या दर्शन गीताप्रैस के पृष्ट 111 से उद्धित किया गया है।

कदा वा साकेते विमल सरयू पुनीत पुलिने
समासीन: श्रीमदरघुपतिपदाबजे हृदि भजन।
अये राम स्वामिन जनक तनया बल्लभ विभो
प्रसीदेति क्रोशन्नीमिषमिव नेष्यामि दिवसान।।

कदा वा साकेते तरुणतुलसीकाननतले
निविष्टस्तम पश्यन्नविहतविशालोर्द्ध तिलकम।
अये सीतानाथ स्मृतजनपते दानवजयिन
प्रसीदेति क्रोशन्नीमिषमिव नेष्यामि दिवसान।।

कदा वा साकेते मणिखचितसिंहासनतले
समासीनम रामम जनकतनयालिंगिततनुम।
अये सीताराम त्रुटितहरधनवन रघुपते
प्रसीदेति क्रोशन्नीमिषमिव नेष्यामि दिवसान।।

कार्तिक मास की महत्ता:-
भगवान विष्‍णु का प्रिय कार्तिक मास का इस बार 10 अक्‍टूबर से लगा था । आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि के बाद से कार्तिक मास का आरंभ माना जाता है। इस बार शरद पूर्णिमा 9 अक्‍टूबर को था। उसके अगले दिन से यानी कि 10 अक्‍टूबर से कार्तिक मास प्रारंभ हो गया था।
शरद पूर्णिमा पर्व से शुरुवात : –
शास्त्रीय मान्यता है कि शरद पूर्णिमा के पर्व पर चन्द्र किरणों से अमृत की वर्षा होती है। इसी अमृत मिश्रित खीर प्रसाद के सेवन से नाना प्रकार की शारीरिक व्याधियों का शमन हो जाता है। सामान्यतया इसी तिथि से शरद ऋतु का भी आगमन हो जाता है। इसी समय में स्वाति नक्षत्र में गिरने वाली ओस की बूदें सीप के मुंह में जाकर बहुमूल्य मोती का स्वरुप धारण करती हैं। इन्हीं मान्यताओं को लेकर सभी मंदिरों में आश्विन शुक्ल पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा महोत्सव का भी आयोजन मठ-मंदिरों में होता है। इस अवसर पर भगवान के चल विग्रह को खुले आसमान के नीचे मंदिर के आंगन में प्रतिष्ठित कर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है और खीर का विशेष भोग लगाकर श्रद्धालुओं में प्रसाद का वितरण किया जाता है।
कल्पवास एक साधना है:-
कल्पवास एक प्रकार की साधना है, जो पूरे कार्तिक मास के दौरान पवित्र नदियों के तट पर की जाती है। भविष्य पुराण में वर्णित है कि कार्तिक का व्रत आश्विन की पूर्णिमा को शुरू कर कार्तिक की पूर्णिमा को पूरा किया जाता है।
स्कन्ध पुराण के अनुसार कार्तिक मास समस्त मासों में सर्वश्रेष्ठ है। कहा जाता है कि इस मास में तीर्थ नगरियों में प्रवाहमान पवित्र नदियों के पावन सलिल में सूर्योदय के पूर्व स्नान करने और तुलसी दल के साथ भगवान विष्णु की आराधना करने का विशेष फल प्राप्त होता है। कार्तिक मास की शुरुआत से ही अयोध्या में कल्पवासी श्रद्धालुओं का जमावड़ा शुरू हो जाता है। इस दौरान रामनगरी में बड़ी संख्या में श्रद्धालु कल्पवास के लिए आते हैं। अयोध्या के विभिन्न मंदिरों ,आश्रमों , होटलों, धर्मशालाओं व गुरु स्थानों पर रुक कर कार्तिक कल्पवास करते हैं। कार्तिक पूर्णिमा तक चलने वाले इस अनुष्ठान के दौरान श्रद्धालुगण तीर्थ नगरी में आकर पूर्ण नियम और संयम के साथ प्रवास करते हैं और दैनिक पूजा-पाठ के साथ रामकथा- भागवत प्रवचनों के श्रवण के साथ विविध धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन कर पुण्य लाभ अर्जित करते हैं।
कार्तिक सर्वोत्तम मास :-
कार्तिक मास सभी मासों में श्रेष्ठ व सर्वोत्तम फलदायक माना गया है। व्रत, स्नान व दीपदान के लिए सरयू तट पर सुबह-शाम कल्पवासी श्रद्धालुओं की भीड़ शुरू होने जाती है। कार्तिक मास त्योहारों का माह कहा जाता है। ऋतु परिवर्तन की दृष्टि से कार्तिक का महीना समशितोष्ण होता है। अर्जुन को गीता का ज्ञान देते समय भगवान कृष्ण ने स्वयं को महीनों में कार्तिक बताया था। इस महीने में व्रत त्योहारों की संख्या भी अधिक होती है। चातुर्मास का सबसे प्रमुख मास होता है कार्तिक मास। इस मास में गंगा यमुना सरयू आदि पवित्र नदियों में स्‍नान, दीप दान, यज्ञ और अनुष्‍ठान परम फल देने वाले माने गए हैं। इसे करने से कष्‍ट दूर होने के साथ पुण्‍य की प्राप्ति होती है और ग्रह दशा भी सुधरती है। शरद पूर्णिमा से प्रारंभ होकर करवा चौथ, धनतेरस, वी आई पी अयोध्या दीपोत्सव,हनुमान जयंती ,दीपावली ,भैया दूज , छठ पूजा,अक्षय नवमी चौदह कोसी परिक्रमा ,देवोत्थान एकादशी पंच कोसी परिक्रमा, बीतुलसी शालिग्राम विवाह, कार्तिक पूर्णिमा तक शायद ही कोई दिन हो जिस दिन का विशेष महत्व न हो। इसी दौरान मंत्रार्थ मंडप में अंतर्राष्ट्रीय राम महायज्ञ का एक भव्य आयोजन और संत सम्मेलन 5 से 14 अक्टूबर के मध्य आयोजित हुआ था।
देवोत्‍थान एकादशी :-
कार्तिक मास की ही देवोत्‍थान एकादशी पर भगवान विष्‍णु चार महीने की निद्रा के बाद जागृत होते हैं। इस महीने में भगवान विष्‍णु के साथ तुलसी पूजन का विशेष महत्‍व माना गया है। इसी महीने में तुलसी और शालिग्राम का विवाह आयोजित होता है।
तुलसी का विशेष पूजन :-
कार्तिक मास भगवान विष्‍णु की पूजा के लिए सबसे खास माना गया है। इस मास में तुलसी पत्र के अलावा आंवले के वृक्ष के पूजन का भी खास महात्म्य है। इसलिए इस महीने में विष्‍णुप्रिया तुलसी की पूजा करना भी बहुत अच्‍छा माना जाता है। इस पूरे महीने में तुलसी के पौधे के नीचे घी का दीपक जलाने की परंपरा है। ऐसा करने से धन लाभ होता है और घर में मां लक्ष्‍मी का वास होता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन शालिग्राम और तुलसी का विवाह करवाया जाता है।
आंवले का पूजन :-
कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी को श्रद्धालु जन आंवले के पूजन के साथ वृक्ष के नीचे ही भोजन का निर्माण कर प्रसाद भी ग्रहण करते हैं। कार्तिक महात्म्य की कथा के अनुसार भगवान के दस अवतारों में प्रथम मत्स्यावतार इसी मास में हुआ था। पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार इस महीने में श्रीहरि मत्‍स्‍य अवतार में रहते हैं, इसलिए इस महीने में भूलकर भी मछली या फिर अन्‍य प्रकार की तामसिक चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए। इसी मास में भगवान श्रीहरि योग निद्रा से जागृत होते हैं और मंत्रों की शक्ति का हरण करने वाले शंखासुर का वध करके मंत्रों की रक्षा करते हैं और देवताओं को सुरक्षित करते हैं।
कार्तिक माह के दान :-
कलयुग में दान को सभी पापों से मुक्ति का सबसे बड़ा माध्यम माना गया है. पौराणिक मान्यता के अनुसार कार्तिक मास में कुछ चीजों का दान करने पर व्यक्ति को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है. कार्तिक मास में तुलसी, अन्न, आंवले का पौधा, गोदान आदि का बहुत ज्यादा महत्व है।
कार्तिक मास में दीपदान :-
कार्तिक मास में तमाम तरह के दान के साथ व्यक्ति को विशेष रूप से दीपदान करना चाहिए. मान्यता है कि यदि कार्तिक मास में यमुना अथवा किसी पवित्र नदी, तुलसी, या देवस्थान पर श्रद्धा के साथ दान करने का बहुत ज्यादा महत्व है. मान्यता है कि यदि पूरे मास कोई व्यक्ति दीपदान करता है तो उसकी बड़ी से बड़ी कामना पूरी होती है। दीपदान की यह पूजा शरद पूर्णिमा से प्रारंभ होकर कार्तिक पूर्णिमा तक की जाती है।
तुलसी को घी का दीपक :-
कार्तिक के महीने में पूरे 30 दिन तुलसी के नीचे घी का दीपक जरूर जलाना चाहिए। अगर हम लगातार इतने दिन दीपक जलाने में असमर्थ हैं तो देवोत्‍थान एकादशी से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक कम से कम 5 दिन दीपक जरूर जलाना चाहिए। तुलसी के पूजा करने पर मां लक्ष्‍मी के साथ-साथ कुबेरजी की विशेष कृपा भी प्राप्‍त होती है।
कार्तिक के महीने में भगवान विष्‍णु का स्‍मरण करते हुए शाम के वक्‍त पूजा के स्‍थान में तिल के तेल का दीपक जलाकर रखें। पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार भगवान विष्‍णु ने स्‍वयं कुबेरजी से कहा के कार्तिक मास में जो मेरी उपासना करे उसे कभी धन की कमी मत होने देना।
साधना के विकल्प:-
स्नान, दीपदान, तुलसी के पौधों को लगाना और सींचना, पृथ्वी पर शयन, ब्रह्मचर्य का पालन, भगवान विष्णु के नामों का संकीर्तन व पुराणों का श्रवण, इन सब नियमों का कार्तिक मास में निष्काम भाव से पालन करने वाले श्रेष्ठकर हैं। पीपल के रूप में साक्षात् भगवान विष्णु विराजमान होते हैं, इसलिए कार्तिक में उसका पूजा जाना चाहिए।
वर्ष 2022 में कार्तिक मास के तीज-त्योहार इस बार इस प्रकार रहे –
9 अक्टूबर 2022 — शरद पूर्णिमा।
10 अक्टूबर 2022 कल्पवास का श्री गणेश
13 अक्टूबर 2022 – करवा चौथ व्रत
15 अक्टूबर 2022 – स्कंद षष्ठी व्रत
17 अक्टूबर 2022 – तुला संक्रांति, अहोई अष्टमी
21 अक्टूबर 2022 – रंभा एकादशी व्रत
22 अक्टूबर 2022 – धनतेरस, धनवंतरि जयंती, प्रदोष व्रत
23 अक्टूबर 2022– अयोध्या दीपोत्सव
24 अक्टूबर 2022 – दीपावली, नरक चतुर्दशी
25 अक्टूबर 2022 – कार्तिक अमावस्या, सूर्य ग्रहण
26 अक्टूबर 2022 – भाई दूज, अन्नकूट, गोवर्धन पूजा, यम द्वितीया, चित्रगुप्त पूजा
30 अक्टूबर 2022 – छठ पूजा
2 अक्टूबर 2022–अक्षय नवमी,14 कोसी परिक्रमा
4 नवंबर 2022 – देवउठनी एकादशी पंच कोसी परिक्रमा
5 नवंबर 2022 – प्रदोष व्रत,तुलसी विवाह
8 नवंबर 2022 – कार्तिक पूर्णिमा, चंद्र ग्रहण,देव दीपावली
9 नवंबर 2022 – चंद्र ग्रहण के उपरांत स्नान दानादि।

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