सिद्धि के लिए सच्चे साधन

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लेखक-स्वामी श्रद्धानन्द जी
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य, वर्तते कामचारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति, न सुखं न परां गतिम्।। गीता 16/3
शब्दार्थ- (यः) जो मनुष्य, (शास्त्रविधिम्) शास्त्र की विधि एवं आदेश को (उत्सृज्य) छोड़कर (कामचारतः वर्तते) अपनी इच्छानुकूल आचरण करता है, (सः सिद्धिं न अवाप्नोति) वह न तो सिद्धि या सफलता को प्राप्त कर सकता है (न सुखम्) न सुख को, (न परां गतिम्) और न मुक्ति को प्राप्त कर सकता है।
उपदेश- जन्म दिन से ही बालक के निर्माण साधनों की आवश्यकता को न केवल आर्य ऋषियों ने ही अनुभव किया है, बल्कि संसार के सब विद्वानों ने संस्कारों की महानता के आगे सिर झुकाया है। जो मनुष्य संस्कार सम्पन्न नहीं हैं, वह मनुष्य जीवन के उच्च आदर्श की तरफ एक कदम भी नहीं बढ़ा सकता। दुःखों से छूट कर शान्त अवस्था को प्राप्त करना, मनुष्य जन्म का परम उद्देश्य है। किन्तु दुःखों से मनुष्य छूट कैसे सकता है? जब तक कि सुख प्राप्ति के साधनों का उसे ज्ञान न हो। इसलिए कृष्ण भगवान् ने सिद्धि, सुख और मुक्ति का क्रम से वर्णन किया है। किन्तु सिद्धि के लिए साधनों की आवश्यकता है। उन साधनों की वास्तविकता मनुष्य कहाँ से जाने?
इसी बीसवीं शताब्दी के विद्वान् नौजवान अपने दिमाग से निकले हुए विचारों के समर्थन को ही प्रकृति का समर्थन समझते हैं, किन्तु इन नवयुवकों पर ही क्या निर्भर है? हर समय प्रत्येक देश, प्रत्येक समुदाय के अनुभव-शून्य नवयुवक इसी तरह अपनी बुद्धि पर निर्भर करना ही सिद्धि का साधन समझा करते हैं और जब तक कि संसार के अन्दर सच्ची शिक्षा का अभाव है, तब तक बराबर इसी तरह समझा करेंगे। अशिक्षित आत्मा साधनों की वास्तविकता को समझ नहीं सकता, क्योंकि जब उसे सुख के स्वरूप का ही ज्ञान नहीं है, तो वह सुख के साधनों का सच्चा चित्र अपने लिए कब खींच सकता है? इसलिए मनु भगवान् ने धर्म शास्त्र का उपदेश देते हुए बतलाया है कि मुक्ति के साधनों को जानने का सबसे छोटा और श्रेष्ठ साधन मनुष्य का अपना आत्मा है।
जीवात्मा की हालत ठीक दर्पण की तरह है। जिस कदर एक शीशा अधिक साफ किया जावे उसी कदर सफाई के साथ वस्तुओं का प्रतिबिम्ब उसके अन्दर पड़ता है और उसी कदर सच्चाई के साथ उन चीजों की बाह्य स्थिति देखने वालों के लिए प्रकट कर सकता है, परन्तु यदि शीशे पर मैल व मिट्टी आदि से उसका रूप धुंधला पड़ जाये तो उसके अन्दर वस्तुओं का प्रतिबिम्ब बिल्कुल उल्टा पड़ेगा। इसी तरह जो जीवात्मा अशक्त है, बिगड़ते-बिगड़ते अविद्या का बिल्कुल शिकार हो जाता है। उसके लिए उसका अपना प्रकाश कुछ भी मार्गदर्शक का काम नहीं कर सकता। यदि उसकी शिक्षा ठीक हो तो वह केवल ठीक रास्ते का पता लगाने वाला बन जाता है। आगे चलने के लिए उसे फिर दूसरे पवित्र आत्माओं से शिक्षा लेने की आवश्यकता पड़ती है। किन्तु दूसरे पवित्र आत्मा भी एक निश्चित सीमा तक मार्ग प्रदर्शन कर सकते हैं। कभी-कभी ईर्ष्या या द्वेष में फँसकर सदाचारी पुरुषों का आचार भी धोखा देने वाला सिद्ध होता है, तब शास्त्र के मार्ग दिखाने की आवश्यकता होती है।
जब कि बड़े-बड़े आत्मा भी सर्वज्ञ नहीं, इसलिए उनकी लिखी हुई शिक्षायें (जो उनके बनाए शास्त्रों में लिखी हैं) भी पूरा-पूरा मार्ग प्रदर्शन का काम नहीं दे सकतीं। तब पूर्ण शास्त्र की ढूँढ होती है और वह परमेश्वर का निर्भ्रान्त और अनन्त ज्ञान = वेद है।
हे मनुष्य! उस अनन्त और निर्भ्रान्त ज्ञान को ढूँढ कर और उसे पाकर उसमें वर्णन की हुई बुद्धि के साँचे में अपने जीवन को ढ़ाल। फिर तेरे लिए मुक्ति का मार्ग बिल्कुल सुगम हो जाएगा। वह पूर्ण शास्त्र कहाँ है और उस वेद ईश्वरीय ज्ञान की कहाँ खोज करें ? यह प्रश्न किस मनुष्य के हृदय में कभी न कभी नहीं उठता? इसका उत्तर देने का भी किसी न किसी समय यत्न किया है। यह प्रश्न जैसे मनु भगवान के समय नवीन था, वैसा अब भी है। जब तक प्रश्न का ठीक उत्तर नहीं मिलता तब तक मनुष्य का हृदय डांवाडोल रहता है। जगत् पिता अपनी कृपा से हम सबके हृदयों को हिला देवे जिससे हम उसके सच्चे ज्ञान को ढूँढ करके अपने जीवन की सिद्धि के लिए सच्चे साधन जानकर सच्ची शान्ति की ओर पग उठायें।
-शांतिधर्मी मासिक पत्रिका अंक नवम्बर 2005
संपादक- सहदेव शास्त्री

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