सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश ( एक से सातवें समुल्लास के आधार पर) अध्याय 9 क वेदानुकूल न्यायप्रियता और भारत की सामाजिक व्यवस्था

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वेदानुकूल न्यायप्रियता और भारत की सामाजिक व्यवस्था

महर्षि मनु की व्यवस्था के अनुसार प्राचीन काल में ब्राह्मण लोगों का मुख्य कार्य होता था – पढ़ना, पढ़ाना, यज्ञ करना – कराना, दान देना, लेना – ये छः कर्म हैं। ‘प्रतिग्रहः प्रत्यवरः’ मनु० अर्थात् प्रतिग्रह लेना नीच कर्म है।
जिन लोगों ने ब्राह्मण के कार्यों में केवल दान लेने को ही प्राथमिकता दी ,उन्होंने मनु की इस व्यवस्था का उल्लंघन किया। दान अथवा दक्षिणा में बड़ी-बड़ी रकम लेने को प्राथमिकता देकर पंडित वर्ग ने निर्धन लोगों का अपमान किया है। इससे धर्म की हानि हुई है। क्योंकि निर्धन वर्ग के लोग मोटी दक्षिणा न होने के कारण यज्ञ नहीं करा पाते। जब से यज्ञ हवन कराने वाले पंडितों के दृष्टिकोण में धन प्राथमिकता पर आ गया तब से भारत की यज्ञ परंपरा भी व्यस्त होने लगी। लोगों के भीतर अपने धर्म और धार्मिक परंपराओं को जानने समझने की उत्कट इच्छा तो होती है परंतु पंडित जी के न मिलने के कारण वह यज्ञ नहीं करा पाते और ना ही कोई धार्मिक आयोजन अपने घर पर रख पाते हैं। तब धर्म के प्रति उनकी इस प्रकार की आस्था का दुरुपयोग गंडे ताबीज देने वाले पाखंडी दम्भी लोग उठाते हैं और उनकी अज्ञानता से खिलवाड़ करते हुए तरह तरह से उन्हें भ्रमित करते हैं।

सी0सी0 कैमरा और मानव का हृदय

वास्तव में ऐसे लोग विधि के शासन (कानून का राज नहीं) के उल्लंघन के पापी हैं। ब्राह्मण को समाज के मुख की भांति कार्य करना होता है। उसे अपने प्रत्येक कार्य या गतिविधि और मन की चेष्टा कुचेष्टा पर बहुत अधिक सावधानता के साथ दृष्टि गड़ाए रखनी होती है । आज सी0सी0 कैमरे लगाकर हम लोगों पर नजर रखते हैं, जबकि भारत की ऋषि परंपरा में ऐसी व्यवस्था की जाती थी कि प्रत्येक व्यक्ति अपने धर्म के पालन के प्रति अपने हृदय में अपना स्वयं का सी0सी0 कैमरा रखता था। मन में बुरे भाव भी न आने पाएं, इस बात की पूरी चौकसी बरती जाती थी।
जीवन को पवित्रता में ढालने के लिए महर्षि दयानंद जी इस प्रसंग में कहते हैं कि निन्दा स्तुति, सुख दुःख, शीतोष्ण, क्षुधा तृषा, हानि लाभ, मानापमान आदि हर्ष शोक, छोड़ के धर्म्म में दृढ़ निश्चय रहना। (आर्जव) कोमलता, निरभिमान, सरलता, सरलस्वभाव रखना, कुटिलतादि दोष छोड़ देना।
इस प्रकार आर्यों का जीवन बहुत तपा तपाया कुंदन होता था। आज जीवन की इस तपस्या से मानव बहुत दूर भाग गया है। उसी का परिणाम है कि सर्वत्र कोलाहल और अशांति का वातावरण है। अपने मन रूपी दर्पण को पवित्र बनाने की ओर मनुष्य ध्यान नहीं देता। जिससे उसके मन में अनेक प्रकार के बुरे विचार उठते रहते हैं । पनपते रहते हैं। पलते रहते हैं। यह और भी अधिक कष्टप्रद बात है कि मनुष्य अपने इन दुष्ट विचारों को अपने आप ही ही पालता पोसता रहता है। एक समय ऐसा आता है जब यह बुरे विचार इतने अधिक बढ़ जाते हैं कि मनुष्य स्वयं ही उनके बोझ तले दब जाता है।

राजा पक्षपाती नहीं होना चाहिए

जो लोग पक्षपाती मुगलों की न्यायप्रियता के गीत गाते हैं। उन्हें थोड़ा क्षत्रियों के बारे में हमारे मनु महाराज की व्यवस्था देखनी चाहिए। मनु महाराज की व्यवस्था है कि राजा को न्याय से प्रजा की रक्षा करनी चाहिए। उसे पक्षपाती नहीं होना चाहिए। इसके विपरीत श्रेष्ठ लोगों का सत्कार और दुष्टों का तिरस्कार करने वाला होना चाहिए। राजा के इस प्रकार के आचरण से समाज में शांति व्यवस्था बनी रहती है। सब सबके अधिकारों का सम्मान करने वाले होते हैं । जहां इस प्रकार के लोग रहते हैं , वहीं सभ्य समाज का निर्माण होना संभव है। जहां चालाकी से लोग एक दूसरे के अधिकारों का अतिक्रमण करते हैं वहां सभ्य समाज का निर्माण कभी संभव नहीं है।
वास्तविक सभ्य समाज में अधिकारों को लेकर मारामारी नहीं होती। इसलिए लूट, हत्या ,डकैती, बलात्कार, दूसरों की संपत्ति पर अवैध कब्जा करने की प्रवृत्ति का लोगों में भाव भी पैदा नहीं होता। ऐसी अवस्था को ही वास्तविक रामराज्य कहा जा सकता है। मुगलों या विदेशी शासकों के शासनकाल में भारत में हिंदुओं के अधिकारों का अतिक्रमण किया गया । इतना ही नहीं, उन्हें जीने के योग्य भी नहीं माना गया। उन पर जजिया लगाया गया। अनेक प्रकार के अत्याचार किए गए। जिन लोगों ने पक्षपाती मुगलों को भी न्यायप्रिय कहा है उनकी बुद्धि पर वास्तव में तरस आता है । क्योंकि मुगल स्वयं ही लुटेरे ,अत्याचारी ,बलात्कारी, पापाचारी थे। उन्होंने अपनी हिंदू प्रजा के साथ अन्याय किया। उनकी महिलाओं पर बलात्कार किए। यही स्थिति अंग्रेजों की रही। इसके उपरांत भी इतिहास के साथ छेड़छाड़ करते हुए इन लुटेरे, बर्बर,अत्याचारी शासकों को भारत के इतिहास के नायक के रूप में स्थापित किया जाता है तो यह प्रवृत्ति बहुत ही खतरनाक है। महर्षि दयानंद के इतिहास दर्शन के आधार पर कोई भी इतिहास लेखक इन राक्षस प्रवृत्ति के तथाकथित शासकों को लुटेरा, हत्यारा, डकैत और बलात्कारी ही कहेगा, शासक नहीं ।
स्वामी दयानंद जी महाराज को यदि इतिहास लेखन का भी अवसर प्राप्त होता तो वह निश्चय ही प्रत्येक विदेशी तथाकथित शासक को इस देश का शासक कभी स्वीकार नहीं करते। निश्चित रूप से स्वामी जी महाराज ऐसे राक्षस प्रवृत्ति के विदेशी शासकों को लुटेरा और हत्यारा ही कहते। अपनी न्यायप्रिय और तर्कपूर्ण बुद्धि के स्वामी महर्षि दयानंद जी महाराज सच कहने में चूकते नहीं थे। अतः उनसे यही अपेक्षा की जा सकती है कि वह प्रत्येक विदेशी शासक की अपनी प्रजा के प्रति अपनायी गई अत्याचार पूर्ण नीति का न केवल विरोध करते अपितु जिस प्रकार उन्होंने कुरान और बाइबिल की गलत धारणाओं, अवैज्ञानिक मान्यताओं और सिद्धांतों का तर्कपूर्ण विरोध किया है वैसे ही इन राक्षस शासकों की नीतियों का विरोध करते ।

राजा को बलवान होना चाहिए

जो लोग विदेशी आक्रमणकारी मुगलों के भीतर न्यायप्रियता को देखते हैं, उन्हें क्षत्रियों के बारे में सत्यार्थ प्रकाश में की गई इस व्यवस्था पर ध्यान देना चाहिए। “न्याय से प्रजा की रक्षा अर्थात् पक्षपात छोड़ के श्रेष्ठों का सत्कार और दुष्टों का तिरस्कार करना सब प्रकार से सब का पालन (दान) विद्या, धर्म की प्रवृत्ति और सुपात्रें की सेवा में धनादि पदार्थों का व्यय करना (इज्या) अग्निहोत्रदि यज्ञ करना वा कराना (अध्ययन) वेदादि शास्त्रें का पढ़ना तथा पढ़ाना और विषयों में न फंस कर जितेन्द्रिय रह के सदा शरीर और आत्मा से बलवान् रहना। (शौर्य्य) सैकड़ों सहस्रों से भी युद्ध करने में अकेले को भय न होना।
(तेजः) सदा तेजस्वी अर्थात् दीनतारहित प्रगल्भ दृढ़ रहना। (धृति) धैर्यवान् होना (दाक्ष्य) राजा और प्रजासम्बन्धी व्यवहार और सब शास्त्रों में अति चतुर होना।
(युद्धे) युद्ध में भी दृढ़ निःशंक रहके उससे कभी न हटना न भागना अर्थात् इस प्रकार से लड़ना कि जिससे निश्चित विजय होवे, आप बचे, जो भागने से वा शत्रुओं को धोखा देने से जीत होती हो तो ऐसा ही करना। (दान) दानशीलता रखना। (ईश्वरभाव) पक्षपातरहित होके सबके साथ यथायोग्य वर्त्तना, विचार के देवे, प्रतिज्ञा पूरा करना, उस को कभी भंग होने न देना। ये ग्यारह क्षत्रिय वर्ण के गुण हैं।”
महर्षि दयानंद जी महाराज के इस प्रकार के वर्णन से यह स्पष्ट होता है कि भारत के लोगों ने क्षत्रियों के इसी गुण के कारण कभी भी विदेशियों के शासन को अपने ऊपर स्वीकार नहीं किया। उन्होंने अपने से नीच व मलेच्छ लोगों के विरुद्ध विद्रोह किए। अनेक बलिदान देकर अपनी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए समर सजाए। चोटी और जनेऊ की रक्षा के लिए वह जो कुछ भी कर सकते थे, उसे करने का गंभीर और सार्थक प्रयास किया। अपनी इस व्यवस्था के माध्यम से ऋषि दयानंद ने अपने समकालीन क्षत्रियों को भी यह परामर्श दिया कि वह अपने विदेशी शासकों अर्थात अंग्रेजों के विरुद्ध इसी प्रकार का आचरण करते हुए अपनी क्षत्रिय परंपरा का वीरतापूर्वक निर्वहन करें।
ऋषि दयानंद जी के इस आवाहन का तत्कालीन क्षत्रिय समाज पर गंभीर प्रभाव पड़ा । यही कारण था कि 1857 की क्रांति में भी ऋषि के आवाहन पर अनेक युवाओं ने बढ़ चढ़कर भाग लिया और इसके पश्चात अगले 90 वर्षों तक अनेक आर्य क्रांतिकारी स्वाधीनता के आंदोलन में अपना सर्वस्व समर्पित करने के भाव से कूद पड़े। क्रांति की धारा रुकी नहीं। इसके विपरीत दिन प्रतिदिन और भी अधिक बलवती होती चली गई। इससे पता चलता है कि इतिहास संकेतों को भी समझता है, और जब इतिहास संकेतों को समझ लेता है तो वह बहुत रोमांचकारी हो उठता है। भारतीय स्वाधीनता समर का क्रांतिकारी आंदोलन इसलिए ही रोमांचकारी बन पाया कि उसने महर्षि दयानंद जी के संकेत को समझ लिया था।
स्वामी जी महाराज ने ‘आर्याभिविनय’ नामक स्वलिखित पुस्तक में लिखा है कि – ‘हे महाधनेश्वर ! हमारे शत्रुओं के बल पराक्रम को सर्वथा नष्ट करें ,आपकी करुणा से हमारा राज्य और धन सदा वृद्धि प्राप्त हो।’

स्वामी जी का वायसराय को प्रति उत्तर

स्वामी दयानंद जी महाराज 16 दिसंबर 1872 से मार्च 18 से 73 तक कोलकाता में राजा ज्योतिंद्र मोहन टैगोर पर प्रमोद कानन में प्रवास पर रुके हुए थे। वही वायसराय नॉर्थ ब्रुक उनसे एक दिन मिलने के लिए आए थे। तब वायसराय ने स्वामी जी महाराज से अपनी बातचीत के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए कह दिया था कि हमारे राज्य में सुख और न्याय है, जहां आप बिना रोक-टोक अपना प्रचार करते हैं। अतः आप हमारे राज्य की यहां पर चिरस्थिरता के लिए ईश्वर से प्रार्थना कर दिया करें। इस पर स्वामी दयानंद जी महाराज ने वायसराय को बड़ा करारा उत्तर दिया था । जिससे पता चलता है कि वह “हिंदी – हिंदू – हिंदुस्तान” से किस सीमा तक प्रेम करते थे ? स्वामी दयानंद जी महाराज ने बड़े गर्वीले शब्दों में कहा था कि “राजन ! मैं तो प्रतिदिन प्रात: उठकर अपने परमपिता परमेश्वर से यही प्रार्थना करता हूं कि शीघ्रातिशीघ्र यह राज्य भारत से उठ जाए। मैं तो शीघ्र ही वह दिन देखना चाहता हूं जबकि भारत का शासन सूत्र हम भारतीयों के हाथ में हो।”
स्वामी दयानंद जी महाराज के मुखारविंद से ऐसे शब्द सुनकर वायसराय आश्चर्यचकित रह गया था। इतना ही नहीं, उसने इंडिया ऑफिस को भेजे गए अपने प्रपत्रों में यह भी लिख दिया था कि इस विद्रोही फकीर पर कड़ी नजर रखी जाए। इन तथ्यों को स्पष्ट करते हुए 9 अप्रैल 1961 को ‘वीर अर्जुन’ में इस संबंध में दीवाना अलखधारी जी द्वारा लेख प्रकाशित किया गया था।

राकेश कुमार आर्य

मेरी यह पुस्तक डायमंड बुक्स नई दिल्ली के द्वारा प्रकाशित हुई है । जिसका अभी हाल ही में 5 अक्टूबर 2000 22 को विमोचन कार्य संपन्न हुआ था। इस पुस्तक में सत्यार्थ प्रकाश के पहले 7 अध्यायों का इतिहास के दृष्टिकोण से विश्लेषण किया गया है। पुस्तक में कुल 245 स्पष्ट हैं। पुस्तक का मूल्य ₹300 है।
प्रकाशक का दूरभाष नंबर : 011 – 407122000।

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