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भारतीय संस्कृति

सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश ( एक से सातवें समुल्लास के आधार पर) अध्याय 3 भारत का आध्यात्मिक शिक्षा संस्कार

भारत का आध्यात्मिक शिक्षा संस्कार

“सन्तानों को उत्तम विद्या, शिक्षा, गुण, कर्म्म और स्वभावरूप आभूषणों का धारण कराना माता, पिता, आचार्य्य और सम्बन्धियों का मुख्य कर्म है।”
महर्षि दयानंद अपने इस पवित्र वचन के साथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के तृतीय समुल्लास का शुभारंभ करते हैं । हम सभी भली प्रकार यह जानते हैं कि भारत ज्ञान – विज्ञान के क्षेत्र में प्राचीन काल से ही संपूर्ण संसार का नेतृत्व करता आया है। इसका कारण केवल एक है कि शिक्षा प्राप्त कर विद्या संपन्न होना भारत ने अपने लोगों के लिए प्राथमिक और अनिवार्य कर्तव्य माना है। जो लोग इस प्राथमिक और अनिवार्य कर्तव्य को पूर्ण कर लेते हैं, वही संसार में रहकर धर्म जैसी पवित्र आस्था का सम्यक पालन कर सकते हैं। कोई आतंकवादी धर्म का पालन नहीं कर सकता, यद्यपि किसी ऋषि से ऐसी अपेक्षा स्वाभाविक रुप से की जा सकती है।
महर्षि दयानंद हमें बताते हैं कि सोने, चांदी, माणिक, मोती, मूँगा आदि रत्नों से युक्त आभूषणों के धारण करने से मनुष्य का आत्मा सुभूषित कभी नहीं हो सकता। क्योंकि आभूषणों के धारण करने से केवल देहाभिमान, विषयासक्ति और चोर आदि का भय तथा मृत्यु का भी सम्भव है। ….

विद्याविलासमनसो धृतशीलशिक्षाः सत्यव्रता रहितमानमलापहाराः।

संसारदुःखदलनेन सुभूषिता ये धन्या नरा विहितकर्मपरोपकाराः।।

जिन पुरुषों का मन विद्या के विलास में तत्पर रहता, सुन्दर शील स्वभाव युक्त, सत्यभाषणादि नियम पालनयुक्त और अभिमान अपवित्रता से रहित, अन्य की मलीनता के नाशक, सत्योपदेश, विद्यादान से संसारी जनों के दुःखों के दूर करने से सुभूषित, वेदविहित कर्मों से पराये उपकार करने में रहते हैं, वे नर और नारी धन्य हैं।
महर्षि के इन वचनों से भारत के प्राचीन समाज की जानकारी हमें होती है कि उस समय लोग किस प्रकार एक दूसरे के प्रति संवेदनशील हुआ करते थे ? एक दूसरे का हाथ पकड़कर चलने में वह स्वकल्याण समझते थे। अपने इसी पवित्र भाव और उद्देश्य की प्राप्ति के लिए भारत के ऋषियों ने प्राचीन काल में समाज जैसी पवित्र संस्था का निर्माण किया। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि जिस समाज रूपी संस्था का निर्माण करने में हमारे ऋषियों को अत्यधिक परिश्रम करना पड़ा उसे आजादी के बाद के भारत ने अपने पापों की एक जंजीर मानकर तोड़ने में अधिक रूचि दिखाई है। उसी का परिणाम है कि लोग स्वार्थी होते चले जा रहे हैं।
आज समाज में एक दूसरे का हाथ पकड़ कर चलने की प्रवृत्ति समाप्त होती जा रही है। प्राचीन भारत में द्विज अपने पुत्र व पुत्रियों का समय आने पर यज्ञोपवीत संस्कार कराकर उन्हें आचार्य कुल अथवा अपनी पाठशाला में भेज दिया करते थे। इसके पीछे उद्देश्य केवल एक होता था कि वहां से वे लड़के और लड़कियां अत्यधिक सुयोग्य बनकर आएं और समाज व राष्ट्र की व्यवस्था को बनाए रखने में अपना सहयोग प्रदान करें। लड़के और लड़कियां प्रारंभ से ही अपनी जीवनी शक्ति अर्थात रज वीर्य की यत्न से रक्षा कर सकें , इसके लिए उन्हें नैतिक शिक्षा दी जाती थी और एक दूसरे के विद्यालयों से दूर अलग – अलग रखा जाता था, अर्थात लड़कियों को लड़कियों के गुरुकुल में और लड़कों को लड़कों वाले गुरुकुल या पाठशाला में रखा जाता था। यह व्यवस्था भी की जाती थी कि लड़कियों के विद्यालय या पाठशाला में शिक्षिकाएं महिला हों और लड़कों के गुरुकुल या विद्यालय में आचार्य पुरुष हों।
महर्षि दयानंद कहते हैं कि जब तक वे ब्रह्मचारी वा बह्मचारिणी रहें तब तक स्त्री वा पुरुष का दर्शन, स्पर्शन, एकान्तसेवन, भाषण, विषयकथा, परस्परक्रीडा, विषय का ध्यान और संग इन आठ प्रकार के मैथुनों से अलग रहें और अध्यापक लोग उनको इन बातों से बचावें। जिस से उत्तम विद्या, शिक्षा, शील, स्वभाव, शरीर और आत्मा के बलयुक्त होके आनन्द को नित्य बढ़ा सकें।
इस प्रकार की आदर्श व्यवस्था एक आदर्श समाज का निर्माण करती थी। हमको यह भली प्रकार ज्ञात होना चाहिए कि आदर्श सामाजिक व्यवस्था इतिहास को स्वर्णिम पृष्ठ प्रदान करती है अर्थात रक्तपात, मारकाट एक दूसरे के अधिकारों का हनन, छीना झपटी आदि के अमानवीय दृश्य हमें ऐसे समाज में दिखाई नहीं देते ,जिससे इतिहास के पृष्ठ गंदे होते हैं। वास्तव में महर्षि दयानंद जी द्वारा वर्णित की गई प्राचीन भारत की ऐसी आदर्श उत्कृष्ट सामाजिक व्यवस्था हमें हमारे अतीत के उज्जवल पृष्ठों के समुज्ज्वल इतिहास का दिग्दर्शन कराती है।

कन्यानां सम्प्रदानं च कुमाराणां च रक्षणम्।। मनु॰।।

“मनुस्मृति में मनु महाराज ने कहा है कि यह राजनियम और जातिनियम होना चाहिये कि पांचवें अथवा आठवें वर्ष से आगे अपने लड़कों और लड़कियों को घर में न रख सकें। पाठशाला में अवश्य भेज देवें। जो न भेजे वह दण्डनीय हो।”
कहने का अभिप्राय है कि भारत के प्राचीन समाज में अनिवार्य शिक्षा केवल एक ढकोसला या नारेबाजी के लिए गढ़ा गया शब्द नहीं था, अपितु इसके लिए वैधानिक व्यवस्था भी थी कि जो व्यक्ति समाज और राष्ट्र से संबंधित इस व्यवस्था को या विधि विधान को नहीं अपनाता था उसे दंडनीय माना जाता था । इसका कारण केवल एक था कि बच्चे राष्ट्र की अमूल्य निधि होते हैं, उन्हें बनाने ,संवारने के लिए माता-पिता व आचार्य लोग होते हैं। यदि वह अपने कर्तव्य के निर्वाह में किसी प्रकार का प्रमाद कर रहे हैं तो माना जाता था कि वे समाज और राष्ट्र के साथ अन्याय कर रहे हैं। माता पिता के इस प्रकार के प्रमाद का प्रभाव देश के इतिहास और राजनीति को भी प्रभावित करता है। यदि माता-पिता अपने कर्तव्य निर्वाह में किसी प्रकार का प्रमाद बरतते हैं तो उससे देश की राजनीति का भी पतन होता है, क्योंकि वही बच्चे आगे चलकर देश के कर्णधार बनते हैं। इसी प्रकार देश की समकालीन राजनीति ही कालांतर में इतिहास बन जाया करती है।
अतः अपने बच्चों को शिक्षा न देने दिलाने वाले माता-पिता को प्राचीन आर्यावर्त में उपेक्षा से देखा जाता था और उन्हें दंडित भी किया जाता था । इस बात से यह भी पता चलता है कि प्राचीन आर्यों के समाज में किसी भी बच्चे को शूद्र जानबूझकर बनाना दंडनीय अपराध था। जैसा कि हम आज कल देखते हैं कि माता-पिता आप स्वयं ही अपने बच्चों को विद्यालय भेजने में प्रमाद करते हैं। शिक्षा पर सबका समान अधिकार था। उससे किसी को जानबूझकर वंचित नहीं किया जा सकता था। यह माना जाता था कि संसार में जो भी बच्चा आया है वह पूर्ण पुरुष होकर संसार से विदा ले तो अच्छा है। इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उस समय के शिक्षाविद, ऋषि महात्मा लोग बच्चों को निशुल्क शिक्षा दिया करते थे। उन शिक्षाविद ऋषि महात्माओं आचार्य आदि के रहन-सहन, खाने-पीने आदि की सारी जिम्मेदारियां राज्य अपने आप निर्वाह करता था। सच्चे अर्थों में नि:शुल्क और मानव जीवन को उन्नत करने वाली शिक्षा सबके लिए उपलब्ध कराना उस समय की पूरी सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था की जिम्मेदारी थी।
उस समय गायत्री जैसे पवित्र वेद मंत्रों को माता-पिता, आचार्य अपने बच्चों या शिष्यों को बचपन में ही कंठस्थ करा देते थे। इतना ही नहीं, उनका अर्थ भी उन्हें बताया जाता था। जिससे उनका बौद्धिक विकास होता था। आत्मिक उन्नति होती थी और बच्चा बचपन से ही आध्यात्मिकता के रंग में रंगने लगता था।
महर्षि दयानंद भी लिखते हैं कि पिता माता वा अध्यापक अपने लड़का लड़कियों को अर्थसहित गायत्री मन्त्र का उपदेश कर दें। वह मन्त्र-

ओ३म् भूर्भुवः स्व: । तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि ।

धियो यो नः प्रचोदयात् ।।

इस मंत्र का अर्थ करते हुए महर्षि दयानन्द कहते हैं कि हे मनुष्यो! जो सब समर्थों में समर्थ सच्चिदानन्दानन्तस्वरूप, नित्य शुद्ध, नित्य बुद्ध, नित्य मुक्तस्वभाव वाला, कृपासागर, ठीक-ठीक न्याय का करनेहारा, जन्म-मरणादि क्लेशरहित, आकाररहित, सबके घट-घट का जानने वाला, सबका धर्ता, पिता, उत्पादक, अन्नादि से विश्व का पोषण करनेहारा, सकल ऐश्वर्ययुक्त जगत् का निर्माता, शुद्धस्वरूप और जो प्राप्ति की कामना करने योग्य है, उस परमात्मा का जो शुद्ध चेतनस्वरूप है उसी को हम धारण करें। इस प्रयोजन के लिये कि वह परमेश्वर हमारे आत्मा और बुद्धियों का अन्तर्यामीस्वरूप हम को दुष्टाचार अधर्म्मयुक्त मार्ग से हटा के श्रेष्ठाचार सत्य मार्ग में चलावें, उस को छोड़कर दूसरे किसी वस्तु का ध्यान हम लोग नहीं करें। क्योंकि न कोई उसके तुल्य और न अधिक है वही हमारा पिता राजा न्यायाधीश और सब सुखों का देनेहारा है। इस प्रकार गायत्री मन्त्र का उपदेश करके सन्ध्योपासन की जो स्नान, आचमन, प्राणायाम आदि क्रिया हैं सिखलावें।”
उन्नत राष्ट्र जीवन के लिए उन्नत समाज जीवन व्यवस्था का निर्माण करना आवश्यक होता है। जिस देश का वर्तमान उन्नत समाज जीवन व्यवस्था के प्रति समर्पित होता है वही उन्नत राष्ट्र जीवन की संकल्पना को साकार करने में सक्षम और सफल हो पाता है। हमारे लिए परम सौभाग्य का विषय है कि हमारे ऋषि पूर्वज इसी प्रकार की उन्नत राष्ट्र जीवन व्यवस्था के प्रति समर्पित थे। गायत्री मंत्र की व्याख्या को समझने से पता चलता है कि यह हमारी उन्नत सामाजिक जीवन व्यवस्था के साथ-साथ उन्नत राष्ट्र जीवन व्यवस्था का भी संवाहक मंत्र है। यदि वेदों के पास अन्य मंत्र नहीं भी होते और वेद केवल गायत्री मंत्र को कहकर ही शांत हो जाता तो भी संसार की जितनी भर भी धर्म पुस्तकें हैं, इन सबसे ऊपर वेद ही होता। हमारे ऐसा कहने का कारण केवल एक है कि मानव की राजनीतिक और सामाजिक जीवन व्यवस्था को उन्नत कर राष्ट्र जीवन को इतिहास की शोभा बनाने की संकल्पना यदि किसी मंत्र सर के पास है तो वह गायत्री मंत्र के पास ही है। वेद ईश्वरीय वाणी है और वेद को भी गायत्री की साधना के माध्यम से ही जीवन में साकार किया जा सकता है।
यही कारण है कि स्वामी दयानन्द जी महाराज ने संध्या के जिन मंत्रों का चयन हमारे लिए किया है, उसमें गायत्री को दो बार स्थान दिया गया है।

संध्या में आए निम्नलिखित मंत्रों पर हमें विचार करना चाहिए :-
हे ईश्वर दयानिधे भवत्कृपयानेन
जपोपासनादिकर्मणा धर्मार्थकाममोक्षाणां
सद्य: सिद्विर्भवेन्न:।
अर्थात-”हे ईश्वर दयानिधे! आपकी कृपा से जो-जो उत्तम-उत्तम काम हम लोग करते हैं, वे सब आपके अर्पण हैं। जिससे हम लोग आपको प्राप्त होके धर्म-जो सत्य न्याय का आचरण करना है, अर्थ-जो धर्म से पदार्थों की प्राप्ति करना है, काम=जो धर्म और अर्थ से इष्ट भोगों का सेवन करना है और मोक्ष-जो सब दु:खों से छूटकर सदा आनंद में रहना है, इन चार पदार्थों की सिद्घि हमको शीघ्र प्राप्त हो।”
इस प्रकार ये धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष भी हमारे जीवन-व्यवहार और दिनचर्या के प्रमुख अंग बन गये और राष्ट्रीय संस्कार के रूप में विख्यात रहे। हमारे पूर्वजों का सारा जीवन व्यवहार इन्हीं से ओत-प्रोत था और वे सदा धर्मार्थ, काम और मोक्ष की परिक्रमा करते हुए जीवन जीते रहे। शेष विश्व इनके रहस्य को आज तक भी समझ नहीं पाया है। जबकि भारत के ऋषियों ने अपने सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन का इन्हें आचार ही बनाकर रख दिया था। जिस कारण भारतवर्ष में बहुत प्राचीनकाल में एक उन्नत समाज की स्थापना करने में हम पूर्णत: सफल रहे थे।

ओ३म् नम: शम्भवाय च मयोभवाय च
नम: शंकराय च मयस्कराय च
नम: शिवाय च शिवतराय च।।

वैदिक सन्ध्या का यह अंतिम मंत्र है। इसमें साधक कहता है-”प्रभो! आप सुख स्वरूप हैं। सर्वोत्तम सुखों को देने वाले हैं। आपको नमस्कार हो। आप कल्याणकारी हैं-मोक्ष स्वरूप हैं, आप ही हमारी सर्व प्रकार की कामनाओं के पूर्ण करने वाले और हमें सुख और शांति देने वाले हैं। आप अपने भक्तों को धर्मकार्यों में लगाने वाले हैं-आपको नमस्कार हो। आप अत्यंत मंगल स्वरूप हैं। आप ही हमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति कराने वाले हैं। आपको हमारा अत्यंत नम्रता पूर्वक परम श्रद्घा और भक्ति से बार-बार नमस्कार हो।”
संध्या के इन मंत्रों पर हमने अपनी पुस्तक ‘विश्व गुरु के रूप में भारत’- में विशेष रूप से प्रकाश डाला है। यहां पर इतना उल्लेख करना ही पर्याप्त है कि महर्षि दयानंद गायत्री मंत्र के पश्चात संध्या को भी जीवन का एक अनिवार्य अंग मानते हैं ।इनको ही भारत के प्राचीन समाज में शिक्षा संस्कार कहा जाता था। आज की शिक्षा इस प्रकार के संस्कारों से सर्वथा हीन हो चुकी है। जिससे वह मानव निर्माण की अपनी मूलभूत परियोजना को साकार नहीं कर पा रही है, समाज में सर्वत्र अशांति व्याप्त है। भारत के वर्तमान समाज को भारत के वैदिक ऋषियों के आध्यात्मिक इतिहास के इस शिक्षा संस्कार को ग्रहण करना ही होगा।

डॉ राकेश कुमार आर्य

मेरी यह पुस्तक डायमंड बुक्स नई दिल्ली के द्वारा प्रकाशित हुई है । जिसका अभी हाल ही में 5 अक्टूबर 2000 22 को विमोचन कार्य संपन्न हुआ था। इस पुस्तक में सत्यार्थ प्रकाश के पहले 7 अध्यायों का इतिहास के दृष्टिकोण से विश्लेषण किया गया है। पुस्तक में कुल 245 स्पष्ट हैं। पुस्तक का मूल्य ₹300 है।
प्रकाशक का दूरभाष नंबर : 011 – 407122000।

 

 

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