शूद्रों को गले लगाने वाले महर्षि दयानंद का कोई सानी नहीं : देव मुनि

ग्रेनो ( विशेष संवाददाता ) गुरुकुल मुर्शदपुर में चल रहे 21 दिवसीय वेद प्राणी यज्ञ में बोलते हुए देव मुनि जी ने कहा कि खान-पान या स्पृश्यास्पृश्यता की दृष्टि से देखें तो ऋषि दयानन्द का प्रगतिशील व्यक्तित्व हमें पदे-पदे नजर आता है। सन् 1867 में गढ़मुक्तेश्वर में वे मांझी की आधी रोटी खाते हैं। सन् 1868 में में फर्रुखाबाद में श्री सुखवासीलाल साध द्वारा लाये कढ़ी-भात का भोजन स्वीकार करते हैं।
लोगों का मार्गदर्शन करते हुए देव मुनि जी ने कहा कि सन् 1872 में अनूप शहर में उपस्थित जन समुदाय के बीच नाई का भोजन ग्रहण करते हैं। सन् 1874 में अलीगढ़ जनपद के जाट श्री गुरुराम प्रसाद के वेदभाष्यनुवाद को संशोधित करने के लिए वे अपना अमूल्य समय देने के लिए तत्पर रहते हैं। सन् 1874 में ही बिना जूते पहने कच्चा भोजन लानेवाले भक्त ठाकुर प्रसाद से वह यह स्पष्ट रूप में कह देते हैं कि मैं छुआछूत को नहीं मानता आप भी इस बखेड़े में मत पड़िए। इसी वर्ष गुजरात के कातार गांव में किसानों द्वारा आग में भूनकर दी गई ज्वार (पोंक-हुर्डा) को वे सहर्ष ग्रहण करते हैं।
उन्होंने कहा कि पुणे में सर्वश्री गोविंद मांग, गोपाल चमार, रघु महार आदि का लिखित प्रार्थना पत्र पाकर शूद्रातिशूद्रों के विद्यालय में 16 जुलाई 1875 को वेदोपदेश देते हैं। सन् 1878 में मुस्लिम डाकिये द्वारा एक अस्पृश्य (कसाई मजहबी सिख) श्रोता को दुत्कारे जाने पर भी उसे रुड़की में आत्मीयता पूर्वक नियमित रूप से अपने वेद-प्रवचन में आने का निमंत्रण देते हैं। सन् 1879 में जन्म के मुसलमान मुहम्मद उमर को अलखधारी नाम प्रदान कर अपनत्व प्रदान करते हैं। अपने ही नही सबके मोक्ष की चिंता करनेवाले थे ऋषि दयानन्द। किसी जाति-सम्प्रदाय वर्ग विशेष के लिए नहीं अपितु सारे संसार के उपकार के लिए उन्होंने आर्यसमाज की स्थापना की थी।

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