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इतिहास के पन्नों से

11 सितंबर शिकागो संभाषण दिवस पर विशेष –          • शिकागो संभाषण भारत की सांस्कृतिक और आर्थिक प्रगति का रोडमैप है – 


                         स्वामी विवेकानंद जी ने भारत को व भारतत्व को कितना आत्मसात् कर लिया था, यह कविवर रविन्द्रनाथ टैगोर के इस कथन से समझा जा सकता है जिसमें उन्होंने कहा था कि – यदि आप भारत को समझना चाहते हैं तो एक व्यक्ति को पूरा पढ़ लीजिये, और वो व्यक्ति हैं स्वामी विवेकानंद। नोबेल से सम्मानित फ्रांसीसी लेखक रोमां रोलां ने स्वामी जी के विषय में कहा था – उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असंभव है, वे जहां भी गये, सर्वप्रथम ही रहे। 

                         निर्धनजन की सेवाभावना को उन्होंने प्रबल शब्दों में व्यक्त करते हुए कहा था – भले ही मुझे बार-बार जन्म लेना पड़े और जन्म-मरण की अनेक यातनाओं से गुज़रना पड़े, लेकिन मैं चाहूंगा कि मैं, उस एकमात्र ईश्वर की सेवा कर सकूं, जो भारत के ग्रामों में बसता है, जो असंख्य आत्माओं का विस्तार है। वह जो सभी जातियों, वर्गों और धर्मों के निर्धनों में बसता है, उनकी सेवा ही मेरा अभीष्ट है। प्रश्न यह है कि स्वामी विवेकानंद में राष्ट्र और इसके पीड़ित जनों की सेवा की भावना का उद्गम क्या था? क्यों उन्होंने निजी मुक्ति से भी बढ़कर राष्ट्रसेवा को ही अपना लक्ष्य बनाया। अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस से प्रेरित स्वामी विवेकानंद ने साधना प्रारंभ की और परमहंस के जीवनकाल में ही समाधि प्राप्त कर ली थी, किंतु, विवेकानंद का प्रारब्ध कुछ और ही था। इसलिए जब स्वामी विवेकानंद ने दीर्घकाल तक समाधि अवस्था में रहने की इच्छा प्रकट की तो उनके गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस ने उन्हें एक महान लक्ष्य की ओर प्रेरित करते हुए कहा – मैंने सोचा था कि तुम जीवन के एक प्रखर प्रकाश पुंज बनोगे और तुम हो कि एक साधारण मनुष्य की तरह व्यक्तिगत आनंद में ही डूब जाना चाहते हो, तुम्हें संसार में महान कार्य करने हैं, तुम्हें मानवता में आध्यात्मिक चेतना उत्पन्न करनी है और दीन-हीन मानवों के दु:खों का निवारण करना है।

                                         

                                1893 में शिकागो भाषण के द्वारा सम्पूर्ण विश्व को भारत के विश्वगुरु होने का दृढ़ सन्देश दे चुके स्वामी जी को पश्चिमी मीडिया जगत साइक्लोनिक हिन्दू के नाम से पुकारने लगा था। इन महान कार्यों के स्थापना के बाद स्वामी जी केवल पांच वर्ष ही जीवित रह पाए और मात्र चालीस वर्ष की अल्पायु उनका दु:खद निधन हो गया, किंतु, इस अल्पायु जीवन में उन्होंने सदियों के जीवन को क्रियान्वित कर दिया था। इस कार्ययज्ञ हेतु उन्होंने सात बार सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया और पाया कि जनता गहन अंधकार में भटकी हुई है। उन्होंने भारत में व्याप्त दो महान बुराइयों की ओर संकेत किया, पहली महिलाओं पर अत्याचार और दूसरी जातिवादी विषयों की चक्की में गरीबों का शोषण। उन्होंने देखा कि कोई नियति के चक्र से एक बार निम्न जाति में पैदा हो गया तो उसके उत्थान की कोई आशा नहीं दिखती थी। उस समय तो निम्न जाति के लोग उस सड़क से गुज़र भी नहीं सकते थे जिससे उच्च जाति के लोग आते-जाते थे। स्वामी जी ने जाति प्रथा कि देन इस भीषण दुर्दशा को देखकर आर्त स्वर में कहा था – आह! यह कैसा धर्म है, जो गरीबों के दु:ख दूर न कर सके। उन्होंने कहा कि पेड़ों और पौधों तक को जल देने वाले धर्म में जाति भेद का कोई स्थान नहीं हो सकता; ये विकृति धर्म की नहीं, हमारे स्वार्थों की देन है। स्वामीजी ने उच्च स्वर में कहा – जाति प्रथा की आड़ में शोषण चक्र चलाने वाले धर्म को बदनाम न करें।

                                स्वामी विवेकानंद ने आर्तनाद करते हुए कहा था कि – अज्ञान, विषमता और आकांक्षा ही वे तीन बुराइयां हैं, जो मानवता के दु:खों की कारक हैं और इनमें से हर एक बुराई, दूसरे की घनिष्ठ मित्र है।

आज कल बहुधा नहीं बल्कि सदैव ही यह कहा जाने लगा है कि शासन और प्रशासन को धर्म, संस्कृति और परम्पराओं के सन्दर्भों में धर्म निरपेक्ष होकर विचार और निर्णय करने चाहिएं। यहाँ पर यह प्रश्न, यक्ष प्रश्न बन कर उभरता है कि धर्मनिरपेक्षता आख़िर है किस चिड़िया का नाम? आज हमारे देश का तथाकथित बुद्धिजीवी और प्रगतिशील कहलाने वाला वर्ग धर्म निरपेक्षता के जो मायने निकाल रहा है, क्या वह सही हैं? क्या धर्मनिरपेक्षता शब्द के जो अर्थ चलन में उतार दिए गए हैं, वे रत्ती मात्र भी प्रासंगिक और उचित हैं? इस वैचारिक सन्दर्भ में विश्व में जो अर्थशास्त्र का बुरी मुद्रा – अच्छी मुद्रा सिद्धांत लागू है, वह संभवतः दुर्योग से हमारे यहाँ सांस्कृतिक जीवन में भी लागू हो रहा है! वर्तमान में हमें इस पीड़ादायक तथ्य को स्वीकार करना होगा कि भारत की वैचारिक दुनिया में जिस प्रकार बुरे विचारों ने अच्छे विचारों को प्रचलन से बाहर कर दिया है या करते जा रहे हैं। तब स्वामी जी के विचारों का प्रकाश ही हमें इस षड्यंत्रपूर्वक बना दिए गए कुचक्र से बाहर निकाल सकता है। स्वामी जी ने जब शिकागो में अपने विचारों को व्यक्त करते हुए कहा था कि राष्ट्रवाद का मूल, धर्म व संस्कृति के विचारों में ही बसता है, तब सम्पूर्ण पाश्चात्य विश्व ने उनके इस विचार से सहमति व्यक्त की थी और भारत के इस युग पुरुष के इस विचार को अपने-अपने देशों में जाकर प्रचारित और प्रसारित करते हुए भारतीय संस्कृति के प्रति सम्मान प्रकट किया था। पिछले ही वर्षों मे जब बाइबिल की 400 वीं वर्षगाँठ के अवसर पर ब्रिटिश प्रधानमन्त्री डेविड कैमरन ने कहा था कि ब्रिटेन एक ईसाई राष्ट्र है और इसे कहने में किसी को कोई भय या संकोच नहीं होना चाहिएब्रिटिश प्रधानमन्त्री ने कहा था कि ब्रिटेन एक ईसाई राष्ट्र है और इसे कहने में किसी को कोई भय या संकोच नहीं होना चाहिए; तब निश्चित ही उनकी इस घोषणा की पृष्ठभूमि में विवेकानंद जी का यह विचार ही था।

कितने आश्चर्य का विषय है कि आज जब समूचा विश्व धर्मनिरपेक्षता के शब्दार्थों को विवेकानंद जी के विचारों में खोज पा रहा है, हम उनके ऐतिहासिक शिकागो भाषण को और उनके समूचे जीवन वृत्त को स्मरण ही नहीं कर पा रहे हैं! इस भाषण में उन्होंने गौरवपूर्वक कहा था कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है और हिन्दू जीवन शैली के साथ जीवन यापन करना ही इस आर्यावर्त का एक मात्र विकास मार्ग रहा है और भविष्य में विकास करने की ओर एक आत्मनिष्ठ समाज के रूप में अस्तित्व बनाए रखने में यही एकमात्र मन्त्र ही सिद्ध और सफ़ल रहेगा।

स्वामी जी ने अपने ऐतिहासिक व्याख्यान में कहा था कि भारत के विश्व गुरु के स्थान पर स्थापित होने का एकमात्र कारण यहां के वेद, उपनिषद्, ग्रन्थ और लिखित-अलिखित करोड़ों आख्यान और गाथाएँ ही रहीं हैं। जिस भारत को विश्व सोने की चिड़िया के रूप में पहचानता है, उसकी समृद्धि और ऐश्वर्य का आधार हिन्दू आध्यामिकता में निहित है। 

लेखक विदेश मंत्रालय, भारत सरकार में राजभाषा सलाहकार हैं  

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