ना चरखे से-ना गुलाब से, हमने आजादी ली बलिदान से -इंजीनियर श्याम सुन्दर पोद्दार,महामन्त्री,वीर सावरकर फ़ाउंडेशन

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जिस ब्रिटिश हुकूमत को उखाड़ने के लिए विदेशों में भी लोगों ने अनेक बलिदान दिए। अमेरिका जैसे देश में खूनी क्रांति करके ब्रिटिश हुक्मरानों से सत्ता प्राप्त की। अमेरिका को यदि अपनी आजादी के लिए बड़े बलिदान देने पड़े या इसी प्रकार दूसरे देशों को भी अपनी आजादी हासिल करने के लिए बड़ी संख्या में बलिदान देने पड़े तो यह कैसे संभव है कि भारत बिना बलिदानों के ही आजाद हो गया होगा ?
हमारे देश में यह पढ़ाया जाता है हमें चरखे से आज़ादी मिली। हक़ीक़त तो यह है कि भारतवर्ष के दस लाख गाँव आज़ादी के पहले होते थे। गाँधी ने स्वाधीनता सेनानियों के हाथ बन्दूक पर न जाये इसलिये उनके हाथ में चरखा थमा दिया। गाँधी निम्न स्तर के संगठक थे। उनके चलाये चरखे की असफलता से यही प्रमाणित होता है। गाँधी ने १९२१ में चरखा आंदोलन गांव गांव का आंदोलन बनाने के लिये चलाया था।
पहले के कुछ वर्षों में उनका यह चरखा सिर्फ़ ५००० हज़ार गाँव तक पहुँच पाया। २० वर्ष में १९४१ तक १०००० गाँव तक पहुँच पाया अर्थात् २० वर्ष में देश के दस लाख गाँवों मे दस हज़ार गाँव में यानी १ प्रतिशत गाँव तक पहुचाने में ही गाँधी कामयाब हुए। चरखा चालू ही नही हो पाया तो वह ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ कैसे फेंकता। यह गाँधीवादियों का झूठा प्रचार है। ब्रिटेन की संसद में India Independence Act पेश हुवा इसी ऐक्ट व बहस के चलते हमें आज़ादी मिली। प्रधान मन्त्री एटली ने गाँधी के चरखे से आज़ादी दी होती तो कहते,”अहिंसा का सिद्धांत हमें समझ आने के कारण हमारा हृदयपरिवर्तन हो गया अथवा साम्राज्यवाद अन्याय है इस लिये स्वेच्छा से हमने हिंदुस्तान छोड़ा” पर प्रधानमन्त्री एटली ने भारत को आज़ादी देने का कारण कुछऔर ही कहा। ब्रिटिश पार्लियामेंट में साम्राज्य के सत्ता छोड़ने का समय आने के कारण दुःखी हुवे चर्चिल के एक प्रश्न का निरुपाय होने से उत्तर देते समय प्रधान मन्त्री एटली ने जिन तीन-चार वाक्यों में ब्रिटेन की आवश्यकता का सूत्ररूप वर्णन किया है,वे वाक्य इस प्रकार है —“Britain is transferring power due to the fact that (1) The Indian mercenary army is no longer loyal to Britain and (2) Britain cannot afford to have a large British Army to hold down India. “ अर्थात १९०६ से ४७ तक सशस्त्र क्रांतिकारी पक्ष ने हिन्दी सेना में जो ब्रिटिश बिद्रोह फैलाया और परराष्ट्रीय राजनीति पर सोच-बिचार करके दोनो महायुद्धों में ब्रिटेन के शत्रु के साथ संधि करते हुवे उनसे सशस्त्र बल सम्पादन करके सशस्त्र क्रांतिकारियों ने रणभूमि में जो संघर्ष किया,उसी से ही ब्रिटिश सत्ता इस वैधानिक संकट में फँस गई,इसका साक्षात ब्रिटिश प्रधानमन्त्री के मुख से ही यह प्रमाण निकल रहा है।

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