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कश्मीर की नागरिकता से वंचित भारतीय..एक अमानवीय कृत्य.              

                      ..अनुच्छेद 370 हटाओ कश्मीर  बचाओ ..

इस सच्चाई से बचा नहीं जा सकता कि 68 वर्ष पश्चात भी विभाजन का दंश झेल रही निर्दोष भोली -भाली जनता की तीसरी पीढ़ी भी आज अपने ही देश के जम्मू-कश्मीर में तिरस्कृत व उपेक्षित जीवन जीने को विवश है। इनको भारतीय नागरिक होने के उपरान्त भी अंनुच्छेद 370 के कारण “विशेष राज्य”  जम्मू कश्मीर की नागरिकता से वंचित रखा जाता आ रहा है।

यहाँ विशेष ध्यान देने की बात यह है कि विभाजन के समय (1947)पश्चिमी पाकिस्तान से भयंकर सांप्रदायिक दंगो के कारण वहाँ से  विस्थापित हुए सभी लोग गैरमुस्लिम थे।यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जब राजा हरिसिंह ने बिना शर्त अन्य राज्यो की भाँति विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिये तो वहां पर ऐसे विस्थापितों को  नागरिकता न देने का कोई औचित्य नहीं बनता ?

परंतु जम्मू-कश्मीर के लिये संविधान सभा में धारा 33 ए  के प्रावधान जिसमे  1944 से पहले रहने वालो को ही वहां की प्रजा माना जाये  का सन्दर्भ देकर सन् 1947  में जो लोग आये  उनको राज्य की नागरिकता से वंचित किया गया। अनुच्छेद 370  में भी कुछ ऐसे ही प्रावधान किये गये। इस प्रकार  मानवाधिकार का खुला उल्लंघन हुआ ।मानवाधिकारवादियो को  इस सतत् पीड़ादायिनी चुनौती को समझ कर आगे आना चाहिए ।

आज देश को स्वतंत्र हुए 68 वर्ष हो गये है परंतु केंद्र व राज्य सरकारे एक ओर तो  केवल मुस्लिम उन्मुखी राजनीति के वशीभूत साम्प्रदायिक दंगो का दंश झेल रहे लगभग ढ़ाई लाख भूमि पुत्रो को मानवीय अधिकारो से वंचित किये हुए है ,वही दुसरी ओर उसी जम्मू कश्मीर में (2004 व 2010 ) समर्पण व पुनर्वास योजना के अन्तर्गत गुलाम कश्मीर (पाक) गए उन सभी आतंकवादियो को व वही पर  बने  उनके परिवारो को भी बुला  कर विशेष सुविधाये देकर बसा रही है।

आज देश के राजनेताओ व क़ानून के विशेषज्ञो को सोचना होगा कि जब कश्मीर के राजा ने बिना शर्त भारत मे विलय स्वीकार कर लिया तो अनुच्छेद 370 का क्या महत्त्व । एक गंभीर बात और समझनी होगी कि न तो विलय पत्र मे अनुच्छेद 370 का कोई उल्लेख है तथा न ही इस अनच्छेद मे विलय पत्र का कोई उल्लेख किया गया हे तो फिर ऐसी स्थिति मे इस अनुच्छेद 370 का कोई औचित्य नहीं होना चाहिए ।

वास्तव में संविधान विशेषज्ञो के अनुसार यह अनुच्छेद उस समय (युद्ध की स्थिति में) अस्थायी  प्रावधान के रूप में लागू किया गया था और इसको हटाने का अधिकार भी देश के राष्ट्रपति के पास सुरक्षित है।लेकिन मुस्लिम तुष्टीकरण की आत्मघाती राजनीति ने इसे साम्प्रदायिक बना दिया तथा  अरबो-खरर्बो की केंद्र से मिलने वाली सहायता राशि की  लूट भी इस अनुच्छेद को हटाने मे रोड़ा बनी हुई है। आज समस्त भारतवासियो जो इस पर खुली बहस करनी ही चाहिये आखिर देश की अस्मिता व  अखंडता का प्रश्न है ?

अनुच्छेद 370 के पक्ष में यह भी कहा जाता है कि इसी के कारण कश्मीर की संस्कृति सुरक्षित है, जो कि एक गलत धारणा है। इस सत्य को झुठलाया नहीं जा सकता कि देव भूमि कश्मीर कभी हमारे ऋषि मुनियो की पुण्यभूमि थी।वहां तपस्या करके ज्ञान प्राप्त करने वाले महानुभावो ने देश-विदेश में भारतीय संस्कृति का व्यापक प्रचार व प्रसार करके भारत को जगदगुरू का स्थान दिलवाया था। आज भी  अगर प्राचीन भारतीय संस्कृति की पुनर्स्थापना करके उसके विराट रूप को दर्शाया जाय तो भारत ही नहीं पूरा विश्व उसके असीम ज्ञान से आलोकित हो जाये।

विनोद कुमार सर्वोदय
नया गंज, गाजियाबाद।

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