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हंगामे का मुंहतोड़ जवाब

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने काफी पते की बात कह डाली है। उन्होंने सत्तारुढ़ और विपक्षी दलों, सबको आईना दिखा दिया है। एक तरफ विपक्षियों के हंगामे की उन्होंने आलोचना की है तो दूसरी तरफ उन्होंने सरकार के अध्यादेश-प्रेम को भी आड़े हाथों लिया है। राष्ट्रपति की यह स्पष्टवादिता बताती है कि प्रणब दा का अपना खुद का काफी विकास हो गया है। इंदिराजी और सोनियाजी की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के मेनजरों की हैसियत से ज्यादा किसी कांग्रेसी नेता की हैसियत क्या रही है लेकिन प्रणब दा ने यह सिद्ध किया है कि राष्ट्रपति बनने के बाद वे सचमुच राष्ट्रपति की उच्चतर भूमिका निभा रहे हैं।

जहां तक संसदीय कार्रवाई को ठप्प करने का सवाल है, पिछले छह-सात महिने में कांग्रेस वही कर रही है, जो दस साल से भाजपा करती आ रही है। राष्ट्रपति की चेतावनी के बावजूद कांग्रेस की भूमिका कुछ अलग होगी, इसमें मुझे संदेह है। आखिर इसका कारण क्या है? सभी दलों का यह निषेधात्मक रवैया क्यों है? इसका जो कारण मुझे समझ में आया, वह यह है कि हमारे सभी राजनीतिक दल शुद्ध सत्ताकामी बन गए हैं। वे बिना सत्ता के रह ही नहीं सकते। वे जब विपक्ष में चले जाते हैं तो उन्हें लगता है कि वे लुट गए। उनके पास कुछ बचा नहीं रहता, क्योंकि सत्ता होने पर सबसे पहले वे नोट धुनते हैं, फिर लोगों पर रौब झाड़ते हैं। अपने आप को जनता का नौकर कहकर वोट मांगते हैं और सत्ता पाते ही मालिक बन बैठते हैं। सत्ता खिसक जाने के बाद उन्हें समझ नहीं पड़ता कि वे क्या करें। वे बदहवास हो जाते हैं। खिसियाए रहते हैं। इसीलिए जरुरी हो या न हो, वे हंगामा करते हैं। संसद को अखाड़ा बना देते हैं। पार्टी प्रवक्ता टीवी चैनलों पर दंगल करते हैं। इन सब कलाबाजियों से कानून-निर्माण का गंभीर काम भी टलता जाता है, जैसा कि आजकल टल रहा है।

सत्तारुढ़ दल के पास इसका तोड़ अध्यादेश है। उसकी मजबूरी है लेकिन उसे संसद से डेढ़ माह की अवधि में पास तो कराना होगा। तब क्या होगा? लोकसभा और राज्यसभा का संयुक्त अधिवेशन बुलाना होगा। राष्ट्रपति ने इसकी आलोचना की है लेकिन वे बताएं कि आखिर इसका इलाज क्या है? मैं तो समझता हूं कि संसद के संयुक्त सत्र में दर्जन भर अध्यादेश एक ही दिन में पास कर देने चाहिए ताकि जो भी विपक्षी दल हो, आज या कल, उसे सबक मिल जाए। यह हंगामों का, चाहे वे कांग्रेस का हो या भाजपा का, मुंहतोड़ जवाब होगा।

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