संविधान की 65वीं वर्षगांठ के अवसर पर चिंतनीय विषय

संविधान1947 में देश के विभाजन का प्रमुख कारण मुस्लिम साम्प्रदायिक थी। जिन्नाह ने स्पष्ट घोषणा कर दी थी कि-‘‘हिंदू मुसलमानों का एक राष्ट्र के रूप में सहअस्तित्व संभव नही है। वह दो अलग-अलग राष्ट्र हैं। किसी भी राजनैतिक अथवा प्रशासनिक उपाय द्वारा उनको एक राष्ट्र में संगठित नही किया जा सकता है। उनके प्रेरणा स्रोत अलग-अलग हैं। उनके महापुरूष अलग-अलग हैं। अधिकतर एक का महापुरूष दूसरे के महापुरूष का शत्रु है।’’

ऐसी परिस्थितियों में हमारे संविधान का आदर्श होना चाहिए था कि स्वतंत्र भारत में हिंदू या मुसलमान को अपनी मानसिकता में साम्प्रदायिकता के विषयुक्त  कीटाणु को प्रवेश ही नही करने देना है। जिससे हम एक बार आहत हो चुके ,उसी को दूसरी बार क्यों अपनाया जाए?

इसके उपरांत हमें चाहिए था कि राज्य अपना धर्म मानवों के सम्प्रदायों से अलग मानवतावाद को घोषित करता, और यह सुनिश्चित करता कि मानवतावाद  भारतीय सामासिक  संस्कृति के विकास में बाधक किसी सम्प्रदाय की मान्यताओं के प्रचार प्रसार पर राज्य अपने वैश्विक धर्म मानवतावाद के सर्वतोन्मुखी विकास के दृष्टिगत प्रतिबंध लगा सकेगा और ऐसी किसी साम्प्रदायिक मान्यता को पूर्णत: समाप्त कर दिया जाएगा,जो मानव-मानव के मध्य किसी प्रकार का विद्वेष या कटुता उत्पन्न करने में सहायक हो। ऐसे धार्मिक राज्य की स्थापना से ही भारत की संस्कृति के प्राचीन मूल्यों की रक्षा हो  पाना संभव था। इसके विपरीत हमने यह स्थिति उत्पन्न की कि च्च्रिलीजनज्ज् जैसे इंग्लिश शब्द को धर्म का पर्यायवाची या समानार्थक मान लिया, और संविधान की धारा 25 में व्यवस्था दी कि-लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य तथा इस भाग के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, सभी व्यक्तियों को अंत:करण की स्वतंत्रता का तथा धर्म के अबाध रूप से, मानने आचरण  करने और प्रचार करने का समान अधिकार होगा।

इस धारा में यदि व्यवस्था ऐसी होती कि राज्य के प्रत्येक नागरिक को राज्य के राजधर्म-मानवतावाद को अबाध रूप से मानना, आचरण करना एवं उसका प्रचार करना बाध्यकारी होगा। ऐसा न करने वाले लोगों के प्रति कठोर विधिक प्राविधान किये जाते। तब हम व्यक्ति की साम्प्रदायिक और विखण्डनवादी सोच से मुक्ति पा सकते थे।

हमने व्यक्ति का धर्म और राज्य का धर्म अलग-अलग कर दिये, और घोषणा कर दी कि हम विभिन्नता में एकता उत्पन्न करेंगे। यह व्यावहारिक  चिंतन नही था, इसमें बुराई को जीवित रखकर उससे भिडऩे की इच्छा शक्ति का अभाव तो था ही, साथ ही बुराई को अपनाये रखने का आत्मघाती प्रयास भी था। उन्नति केे लिए च्एक विचारज् और ‘एक लक्ष्य’ का होना नितांत आवश्यक होता है, इसलिए राज्य और व्यक्ति का एक विचार और एक लक्ष्य स्थापित किया जाना आवश्यक था। हमें विभिन्नताओं को लेकर प्रमाद और असावधानी का प्रदर्शन नही करना चाहिए था,  हमें उन्हें मिटाकर  अपने एक लक्ष्य के साथ सहजता से उसी प्रकार एकाकार  करने की ओर गंभीर और ठोस पहल करनी चाहिए थी जैसे शक्कर दूध में मिल जाती है और दूध को  मिठास प्रदान करके उसके रोम-रोम में अपना अस्तित्व विलीन कर देती है। साम्प्रदायिक  मान्यताएं राष्ट्र निर्माण में बाधक होती हैं,इसलिए उनको अपने घर की चारदीवारी में व्यक्ति मानें जैसे चाहे पूजा करें, पर उनका प्रभाव हमारे राष्ट्रीय चरित्र पर नही पडऩा चाहिए। वैसे हमारे संविधान की मूल भावना को इसी प्रकार का बताने का प्रयास किया जाता है, परंतु दुखद बात है कि संविधान लागू होने के 65 वर्ष व्यतीत हो जाने के उपरांत भी हम अपना राष्ट्रीय चरित्र वैसा विकसित नही कर पाये जैसा हमारे संविधान द्वारा लक्षित किया गया, बताया जाता है। जब इस स्थिति के कारणों पर विचार किया जाता है, तो ज्ञात होता है कि दोष कहीं हमारा है तो कहीं हमारे संविधान का भी है। इसने ना तो 1947 से शिक्षा ली और ना ही साम्प्रदायिक मान्यताओं को व्यक्ति का निजी विषय माना, अपितु उन्हें राष्ट्रीय मान्यताओं और राष्ट्रीय चरित्र से भी ऊपर मान लिया, तभी तो संविधान के अनुच्छेद 29, 30 में ऐसी व्यवस्था कर दी गयी जो हमारी ऐसी  ही मान्यता को बल प्रदान करती है। यथा अनुच्छेद  29 कहता है कि अल्पसंख्यकों को अपनी भाषा, लिपि, या  संस्कृति को बनाये रखने का अधिकार होगा। इसी व्यवस्था को नकारात्मकता की ओर खींचने का प्रयास किया गया और आज हम देख रहे हैं कि भाषा, लिपि या संस्कृति की विभिन्नताऐं हमारे राष्टरित्र और राष्ट्रीय मुख्यधारा से प्रतिद्वंद्विता कर रही है, और  हमें क्षतिग्रस्त कर रही है।

इसी प्रकार अनुच्छेद 30 में व्यवस्था की गयी है कि धर्म या भाषा  पर आधारित सभी अल्पसंख्यक वर्ग को अपनी रूचि की शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन का अधिकार होगा।

इस अनुच्छेद के आधार पर अल्पसंख्यक अपनी शैक्षणिक संस्थाएं स्थापित कर सकते हैं, तो राज्य क्या करेगा? क्या राज्य भी अपनी उन शैक्षणिक संस्थाओं को स्थापित करेगा जो मानवतावाद को प्रोत्साहित कर सम्प्रदायवाद को मिटाने वाली हों, या राज्य केवल किन्हीं लोगों के शैक्षणिक संस्था स्थापित करने के संवैधानिक अधिकार की रक्षा करने के  नाम पर अपनी असहायावस्था को दिखाता रहेगा? संविधान इस पर अस्पष्ट है, या उसे  अस्पष्ट कर दिया गया है। भटकते भटकते हम दूर चले गये हैं कि विभिन्नता हमारी एकता की अर्थी सजा चुकी है और हमें ज्ञात ही नही है कि यह अर्थी किसकी सज चुकी है?

संविधान में वर्णित मौलिक कत्र्तव्य (अनुच्छेद 51) का यह विषय कि भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भातृत्व की भावना का निर्माण कर सभी धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग से ऊपर उठकर करना प्रत्येक नागरिक का कत्र्तव्य होगा,हमारे लिए केवल दिखावटी, सजावटी और बनावटी अनुच्छेद बनकर रह गया है।

कितना उचित होता कि इस अनुच्छेद को राज्य का मौलिक अधिकार बनाया जाता और जो लोग इस अनुच्छेद की भावना का अपमान या उल्लंघन करते उन्हें दंडित करने की व्यवस्था की जाती। संविधान के लागू होने की 65वीं वर्षगांठ  के अवसर पर हमें चिंतन करना होगा कि अंतत: दोष कहां रहा,संविधान असफल रहा या  संविधान को लागू करने वाले असफल रहे?

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