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  दिल्ली फतह की इतनी बेताबी क्यों है?

पुण्‍य प्रसून वाजपेयी

बजट के महीने में देश के वित्त मंत्री को अगर दिल्ली चुनाव के लिये दिल्ली बीजेपी हेडक्वार्टर में बैठना पड़े। केन्द्र के दर्जन भर कैबिनेट मंत्रियों को दिल्ली की सड़कों पर चुनावी प्रचार की खाक छाननी पड़े। सरकार की नीतियां चकाचौंध भारत के सपनों को उड़ान देने लगे। और चुनावी प्रचार की जमीन, पानी सड़क बिजली से आगे बढ़ नहीं पा रही हो तो संकेत साफ हैं, उपभोक्ताओं का भारत दुनिया को ललचा रहा है और न्यूनतम की जरुरत का संघर्ष सत्ता को चुनाव में बहका रहा है। दोनों खेल एक साथ कैसे चल सकते हैं या दो भारत को एक साथ जीने की कला जिस महारथी में होगी, वही मौजूदा वक्त में सबसे ताकतवर राजनेता होगा। सरकार उसी की होगी। क्योंकि यह वाकई कल्पना से परे है कि दिल्ली चुनाव के हर मुद्दे बिजली, पानी, सड़क, घर, स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर कैबिनेट मंत्री हर प्रेस कान्फ्रेंस करने के लिये उपलब्ध है और महीने भर बाद जिस बजट का इंतजार देश कर रहा है, उस बजट से उस भारत को कुछ भी लेना देना नहीं होता है जो चुनाव में जीत हार तय करता है। और जो मंत्री दिल्ली के रायसीना हिल्स पर नार्थ या साउथ ब्लाक में बैठकर दुनिया को जिस भारत से रुबरु कराता है वही मंत्री जब चुनाव के लिये सड़क पर प्रचार के लिये उतरता है तो उसकी भाषा उस दुनिया से बिलकुल अलग होती है, जिस दुनिया के बीच भारत चहक रहा है। तो संकेत साफ है कि चुनावी जीत सरकार का पहला धर्म है . चुनाव की जीत हार देश के लिये मर मिटने की सियासत है। यानी सत्ता की ताकत सत्ता में बने रहने के उपाय खोजने से आगे जायेगी नहीं। यानी भारत में राजनीतिक सत्ता के आगे सारा ज्ञान बेमानी है

और चुनाव जीतना ही ज्ञान के सागर में डुबकी लगाना है। इस हाल दुनिया भारत की मुरीद हो और सत्ता हर जगह चुनावी जीत हासिल कर रही हो तो फिर एक भी हार कितनी खतरनाक साबित हो सकती है, यह डेढ़ बरस पहले दिल्ली में शीला दीक्षित सरीखे सीएम की हार के बाद काग्रेस का समूचे देश में लड़खड़ाने से भी समझा जा सकता है और मौजूदा वक्त में दिल्ली जीतने के लिये सरकार ही सड़क पर है इससे भी जाना जा सकता है। इन सारे अंतर्विरोध के बावजूद अगर दुनिया भारत की सत्ता पर लट्टू है तो दो संकेत साफ हैं। पहला, भारत की

मौजूदा सत्ता जनादेश के आसरे कोई भी निर्णय लेकर उसे लागू कराने में सक्षम है जो 1991 के बाद से कभी संभव नहीं हुआ था। और दूसरा भारत का बाजार अमेरिका सरीखे देश की आर्थिक मुश्किलों को भी दूर कर सकता है।

 भारत के भीतर बसने वाले इस दो भारत का ही कमाल है कि भारत दुनिया का एकमात्र देश है जहां आने वाले वक्त में रेलवे में 5 से 10 लाख करोड़ का निवेश होना है। सड़क निर्माण में 2 लाख करोड़ से ज्यादा का निवेश होना है। बंदरगाहों को विकसित करने में भी 3-4 लाख करोड़ लगेंगे। इसी तरह सैकडों एयरपोर्ट बनाने में भी 3 से 4 लाख करोड़ का निवेश किया जाना है। वहीं भारतीय सेना की जरुरत जो अगले दस बरस की है, वह भी करीब 130 बिलियन डॉलर की है। यानी पहली बार भारत सरकार की आस विदेशी निवेश को लेकर लगी है तो

दुनिया की आस भारत में पैसा लगाने को लेकर जगी है। क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी ने खुले संकेत दिये है कि भारत विकास के रास्ते को पकड़ने के लिये आर्थिक सीमायें तोड़ने को तैयार है और दुनिया भर के देश चाहे तो भारत में पूंजी लगा सकते हैं। असल में यह रास्ता मोदी सरकार की जरुरत है और यह जरुरत विकसित देशो को भारत में लाने को मजबूर करेगा। क्योंकि विकसित देशों की मजबूरी है कि वह अपने देश में इन्फ्रास्ट्रक्चर का काम पूरा कर चुके हैं और तमाम विदेशी कंपनियों के सामने मंदी का संकट बरकरार है। यहा तक की चीन के सामने भी संकट है कि अगर अमेरिका की आर्थिक हालात नहीं सुधरे तो फिर उसके यहा उत्पादित माल का होगा क्या। ऐसे में “मेक इन इंडिया ” का रास्ता विदेशी निवेश के लिये खुलता है तो अमेरिका, जापान, फ्रांस या चीन सरीखे देश कमाई भी कर सकते है। अब जरा कल्पना कीजिये दुनिया के तमाम ताकतवर या कहें जो विकसित देश भारत में निवेश करना चाहते हैं, उनके आसरे दिल्ली की झुग्गी बस्तियों का कोई रास्ता निकलेगा नहीं। बिजली, पानी, सडक की लड़ाई थमेगी नहीं। बल्कि इसके बाद देश में खेती और ग्रामीण भारत के सामने अस्तित्व का संकट जरुर मंडराने लगेगा। क्योंकि मौजूदा सरकार जिस रास्ते पर निकल रही है उसमें वह गरीब भारत या फिर किसान, मजदूर या ग्रामीण भारत की जरुरतों को पूरा करने की दिशा में कैसे काम करेगी यह किसी बालीवुड की फिल्म की तरह लगता है। क्योंकि फिल्मों में ही नायक तीन घंटे में पोयटिक जस्टिस कर देता है। वैसे यह तर्क दिया जा सकता है कि दुनिया की पूंजी जब भारत में आयेगी तो उसके मुनाफे से ग्रामीण भारत का जीवन भी सुधारा जा सकता है। यानी मोदी सरकार का अगला कदम गरीब भारत को मुख्यधारा से जोड़ने का होगा। और असल परीक्षा तभी होगी । लेकिन यह परीक्षा तो हर प्रधानमंत्री ने अपनी सत्ता के लिये दी ही है। और उसे कटघरे में खड़ा भी किया गया है।

नेहरु ने लालकिले से पहले भाषण में नागरिक का फर्ज सूबा, प्रांत, प्रदेश, भाषा, संप्रदाय, जाति से ऊपर मुल्क रखने की सलाह दी। और जनता को चेताया कि डर से बडा ऐब/ गुनाह कुछ भी नहीं है। वहीं 15 अगस्त 1947 को कोलकाता के बेलीघाट में अंधेरे घर में बैठे महात्मा गांधी ने गवर्नर जनरल सी राजगोपालाचारी को यह कहकर लौटा दिया कि अंधेरे को रोशनी की जगमग से दूर कर आजादी के जश्न का वक्त अभी नहीं आया है। सत्तर के दशक में जिन खनिज संसाधनों को इंदिरा गांधी ने राष्ट्रीय संपत्ति माना उसे सोनिया गांधी के दौर में मनमोहन सिंह ने मुनाफे के धंधे के लिये सबसे उपयोगी माना। बाजार सिर्फ जमीन के नीचे ही नहीं बना बल्कि उपर रहने वाले ग्रामीण आदिवासियों, खेतिहर किसानों और मजदूरों को भी लील गया। लेकिन ताकतवर राजनीतिक सत्ता ने इसे दुनिया के बाजार के सामने भारत को मजबूत और विकसित करने का ऐसा राग छेड़ा कि देश के तीस फीसद उपभोक्ताओं को खुले तौर पर लगने लगा कि बाकि ७० फिसदी आबादी के जिन्दा रहने का मतलब क्या है। सरोकार तो दूर, संवाद तक खत्म हुआ। मोदी सरकार कुछ कदम और आगे बढी । लेकिन पहली बार उसने इस हकीकत को समझा कि चुनावी जीत से बड़ा कोई आक्सीजन होता नहीं है और चुनावी जीत ही हर कमजोरी को छुपाते हुये सत्ता का विकल्प कभी खड़ा होने नहीं देती है। यानी बीते ६७ बरस की सबसे बड़ी उपलब्धि देश में राजनीतिक ताकत का ना सिर्फ बढ़ाना है बल्कि राजनीतिक सत्ता को ही हर क्षेत्र का पर्याय मानना भी है। असर यही है कि 1947 में भारत की जितनी जनसंख्या थी उसका तीन गुना हिन्दुस्तान 2015 में दो जून की रोटी के लिये राजनीतिक सत्ता की तरफ टकटकी लगाकर देखता है। असर इसी का है कि दिल्ली में जो भी सरकार बने या जिस भी राजनीतिक दल को जनता वोट दे । हर किसी को केन्द्र की सत्ता के पलटने के हर अंदाज तो याद है। फिर २०१४ के चुनाव में जिस जनादेश का गुणगान दुनिया भर में हो रहा है उसी जनादेश से बनी सरकार की सांस चुनाव के न्यूनतम नारों को पूरा करने में क्यों फूल रही है। और दिल्ली में न्यूनतम जरुरते पूरी हो जायेगी यह कहने के लिये और कोई नहीं उसी मोदी के कैबिनेट मंत्री और खुद प्रधानमंत्री मोदी चुनावी मैदान में क्यों उतर रहे हैं। जिन्हें सत्ता सौपी ही इसलिये गई कि वह विकास की नयी धारा देश में बहा कर अच्छे दिन ला दें।

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