भारत छोड़ो आंदोलन दिवस पर विशेष… विदेशी विचार छोडक़र ‘स्व’ का भाव जगाएं


किसी भी देश का विचार उसके स्वभाव से परिचित कराता है। अगर किसी देश के पास स्वयं के विचार का आधार नहीं है, तब निश्चित ही वह देश दूसरे के विचारों के अनुसार ही संचालित होगा। कहा जाता है कि कोई देश जब अपना अतीत भूल जाता है, तब वह धीरे-धीरे पतन की ओर कदम बढ़ाने की अग्रसर होता है। ऐसा उन्हीं देशों में होता है जहां निजत्व का गौरव नहीं होता। ऐसे देश प्राय: अपने स्वर्णिम और सुखद भविष्य की बुनियाद नहीं रख पाते। भारत देश के बारे में ऐसा कतई नहीं माना जा सकता। भारत के पास अतीत की ऐसी सुंदर परिकल्पना है जो केवल भारत का ही नहीं, अपितु पूरे विश्व का दिशादर्शन करने का सामथ्र्य रखती है, लेकिन समस्या इस बात की है कि वर्तमान में भारत के लोग अपनी सनातन संस्कृति से विमुख होते जा रहे हैं। भारत के कई लोग अपने विचारों को त्यागकर विदेशी विचारों को अपनाने की होड़ में लगे हैं। इसका आशय यही है कि हमें अपने प्रेरणादायी विचारों की समझ नहीं है। पुरातन काल से विदेशियों का यह षड्यंत्र चल रहा है कि भारतीय समाज अपने स्वर्णिम अतीत को भूल जाए। जिसमें विदेशी शक्तियां कुछ हद तक सफल भी हो रही हैं। हम यह भली भांति जानते हैं कि अमेरिका सहित अन्य पश्चिमी देशों का विचार और भारत का विचार एक सा नहीं हो सकता। पश्चिम में धनपतियों की कथाएं प्रेरणा का केन्द्र हैं, जबकि भारत में सांस्कृतिक जागरण के लिए राष्ट्र और धर्म के लिए सब कुछ त्याग करने वालों की कथाएं प्रचलन में हैं। और यही कथाएं समाज को सकारात्मक दिशा का बोध कराने में सक्षम होती हैं। भारत ने कभी भी अपने विचार को किसी भी देश पर थोपा नहीं है और न ही भारत की ऐसी मानसिकता ही है। यह सर्वकालिक सत्य है कि भारत के विचार को जब भी और जिसने भी सुना है, वह भारतीय विचारों को अपनाने की दिशा में आगे बढ़ा है।
यहां मुख्य सवाल यह है कि भारत का ‘स्व’ क्या है? इसका चितन करने के लिए हमें भारत को समझना होगा। इसके लिए हमारा स्वभाव क्या होना चाहिए? इस पर भारतीय दृष्टि से विचार करने की आवश्यकता है। जब हम इस दृष्टि से विचार करेंगे तो हमें वह सब दिखाई देगा, जो हमारा अपना है। जिसमें विदेशी विचार की कोई गुंजाइश नहीं होगी। लेकिन वर्तमान समय में हमको अपने विचार के बारे में चिंतन करने की आवश्यकता महसूस नहीं हो रही। इसके पीछे का मात्र यही कारण है कि हमें यह पता नहीं है कि हम क्या हैं? इसलिए समाज को जब पता नहीं होता तो वह न चाहकर भी नए विचारों को ग्रहण करने लगता है। इससे हम स्वयं के अस्तित्व को तो मिटाते ही हैं, साथ ही अपने देश के मूल स्वभाव को भी विस्मृत करने का अपराध भी करते हैं। हमें स्वदेशी में भी समाहित स्व का अर्थ पता नहीं होता। स्वदेशी विचार कोई वस्तु का नाम नहीं है, बल्कि यह एक संचेतना है, जिसे जगाने की बहुत आवश्यकता है।
वर्तमान में जिस प्रकार से हमारे त्यौहार विदेशी वस्तुओं पर निर्भर होते जा रहे हैं, उससे त्यौहारों का मूल स्वरूप भी बदल गया है। इसके बाद हम स्वयं ही यह सवाल करते हैं कि हमारे त्यौहार पहले जैसे नहीं रहे। भारतीय बाजारों में जिस प्रकार से चीनी वस्तुओं का आधिपत्य दिखाई दे रहा है, उससे यही लगता है कि देश में एक और भारत छोड़ो आंदोलन की महत्ती आवश्यकता है। यह बात सही है कि आज देश में अंगे्रज नहीं हैं, लेकिन भारत छोड़ो आंदोलन के समय जिस देश भाव का प्रकटीकरण किया गया, आज भी वैसे ही देश भाव के प्रकटीकरण की आवश्यकता दिखाई देने लगी है। रक्षाबंधन के त्यौहार को अपना त्यौहार मानकर वैसा ही मनाने का प्रयास करना चाहिए, जैसा पहले मनता आया है। इसके लिए अपने मन को स्वदेशी की भावना से पूरित करने की आवश्यकता है। रक्षाबंधन पर हम सभी चीनी वस्तुओं का त्याग करके चीन को सबक सिखा सकते हैं। यह समय की मांग भी है और देश को सुरक्षित करने का तरीका भी है। तो क्यों न हम आज ही इस बात का संकल्प लें कि हम जितना भी और जैसे भी हो सकेगा, देश की रक्षा के लिए कुछ न कुछ अवश्य ही करेंगे।
भारत को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराने के लिए जिन महापुरुषों ने जैसे स्वतंत्र भारत की कल्पना की थी, वर्तमान में वह कल्पना धूमिल होती दिखाई दे रही है। महात्मा गांधी ने सीधे तौर पर स्वदेशी वस्तुओं के प्रति देश भाव के प्रकटीकरण करने की बात कही थी, पर क्या यह भाव हमारे विचारों में दिखाई देता है। कदाचित नहीं। सभी महापुरुषों का एक ही ध्येय था कि कैसे भी हो देश में स्वदेशी भावना का विस्तार होना चाहिए, फिर चाहे हमारे दैनिक जीवन में उपयोग आने वाली वस्तुओं का मामला हो या फिर त्यौहारों का। सभी में स्वदेशी का भाव प्रकट होना चाहिए। विदेशी विचारों को देश से बाहर करने की आवश्यकता है। वास्तव में देखा जाए तो वर्तमान में हम मतिभ्रम का शिकार हो गए हैं। विदेशी विचारों की अच्छाई के बारे में कोई झूठा भी प्रचार कर दे तो हम उस पर आंख बंद करके विश्वास कर लेते हैं, लेकिन हमें अपने विचारों पर विश्वास नहीं। यह बात सत्य है कि भारत एक ऐसा देश है जहां विश्व को भी शिक्षा दी जा सकती है, लेकिन इस सबके लिए हमें अपने अंदर विश्वास का भाव जगाना होगा, तभी हम देश का भला कर सकते हैं।
अब जरा सोचिए कि जब एक विदेशी कंपनी ने भारत को गुलाम बना दिया था, तब आज तो देश में हजारों विदेशी कंपनियां व्यापार कर रही हैं। देश किस दिशा की ओर जा रहा है। हम जानते हैं कि अंग्रेजों की परतंत्रता की जकडऩ से मुक्त होने के लिए हमारे देश के महापुरूषों ने 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन का शंखनाद किया। इस आंदोलन के मूल में अंग्रेजों को भारत छोडऩे के लिए मजबूर करना था, इसके साथ ही अंग्रेजियत को भी भारत से भगाने की संकल्पना भी इसमें समाहित थी। लेकिन आज यही अंग्रेजियत का विचार ही हमारे पतन का कारण बन रहा है। हर भारतीय चाहता है कि आजादी के 75 साल बाद ही सही, लेकिन हिन्दुस्तान को दो सौ वर्षों तक गुलाम रखने वाले अंग्रेजों की अंग्रेजियत का अब भारत से नामो निशान मिट जाना चाहिए। दुनिया हमारे देश को भारत या हिन्दुस्तान के नाम से जाने न कि अंग्रेजों द्वारा दिए गए नाम से।
आज हम जिस इतिहास का अध्ययन कर रहे हैं, वह वास्तव में भारत का इतिहास है ही नहीं, वह तो गुलामी का इतिहास है। वर्तमान में हमको जो इतिहास पढ़ाया जा रहा है, वह अंगे्रजों या मुगलों के शासन काल का है। इस काल के इतिहास में में भारत कमजोर ही दिखाई देगा। लेकिन अगर इससे पूर्व का इतिहास पढऩे को मिले तो सारी सच्चाई सामने आ जाएगी। भारत को जो इंडिया नाम दिया गया, वह अंग्रेजों की कूटनीतिक देन थी। उन्होंने भारत के नाम को ही नहीं पूरी भारतीयता को ही नष्ट करने का प्रयास किया, जिसके चिन्ह आज भी हमें दिखाई दे जाते हैं। वास्तव में देखा जाए तो भारत में आज भी विश्व गुरू के सामथ्र्य वाली धमक और झलक है। अगर भारत अपने पुराने मार्ग पर चलना प्रारंभ करदे तो वह दिन दूर नहीं होगा, जब भारत पुन: विश्व को मार्गदर्शन देने की मुद्रा में आ जाएगा।
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-सुरेश हिन्दुस्थानी, वरिष्ठ पत्रकार
द्वारा- श्री राजीव उपाध्याय, अधिवक्ता
सूबे की गोठ, कैलाश सिनेमा के पीछे
नई सडक़ लश्कर ग्वालियर (मध्यप्रदेश)
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