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कविता

गीता मेरे गीतों में ( गीता के मूल ७० श्लोकों का काव्यानुवाद) 26

ज्ञान की श्रेष्ठता

जीवन सफल हो यज्ञ से हृदय की है पुकार ।
प्राण यज्ञ से समर्थ हो , मैं कहता बारम्बार ।।

अपान समर्थ हो यज्ञ से – यही हृदय की चाह ।
अपान यज्ञ के अनुकूल हो चले ना उल्टी राह ।।

उदान और हों समान भी यज्ञ – भाव से पूर्ण।
नेत्र यज्ञ से हों सफल, रहें वेद – अनुकूल ।।

श्रोत्र , वाणी , मन सदा , बरतें यज्ञ का भाव ।
आत्मा ब्रह्मा , ज्योति भी रखें यज्ञ का चाव ।।

आनंद भरा हो यज्ञ से हो आनंद का व्यापार।
पीठ परोक्ष परिपूर्ण हों , करें यज्ञमय व्यवहार ।।

जब ऐसा जीवन बने तो ज्ञान होय साकार।
शिक्षा वैदिक – धर्म की , करती बेड़ा पार ।।

अंग – अंग जब बोलता , स्वाहा – स्वाहा के बोल।
सात्विकता सृजित भये , जीवन हो अनमोल।।

प्रकृति भी गाने लगे, स्वाहा – स्वाहा के गीत।
गूंजता सर्वत्र हो , बस स्वाहा का संगीत ।।

वही ज्ञान उत्तम सदा , करे जो पर कल्याण।
जब साधना साधन बने , हो अपना भी कल्याण ।।

जो भी कर्म मानव करे , ज्ञान में होता अंत।
पाने के लिए ज्ञान को , ढूंढो सच्चे संत ।।

ज्ञानी गुरु यदि मिल गया , समझो बड़ा संयोग।
नमन करो उसको सदा , किया बड़ा सहयोग ।।

प्रसन्न गुरु से पूछ लो – गहरे ज्ञान की बात ।
पार्थ ! वही है जानता , तेरे मन की बात।।

प्रसन्न गुरु से ही मिले , वेदों का सही सार।
वेदों का सही सार ही, करे भव से बेड़ा पार।।

गुरु उसी को मानिए , जो शिक्षा दे नवनीत।
उसे गुरु मत मानिए जो करता हो भयभीत।।

नया ज्ञान – विज्ञान ही सब उन्नति का मूल ।
जो इसको समझे नहीं , फूल भी बनते शूल।।

गुरु के निकट तुम जाइए लेकर समिधा हाथ।
कल्याण – कारक ज्ञान दे , पवित्र करे संवाद ।।

यह गीत मेरी पुस्तक “गीता मेरे गीतों में” से लिया गया है। जो कि डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित की गई है । पुस्तक का मूल्य ₹250 है। पुस्तक प्राप्ति के लिए मुक्त प्रकाशन से संपर्क किया जा सकता है। संपर्क सूत्र है – 98 1000 8004

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