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भारतीय संस्कृति

संतान को संस्कार देने के प्रति सजग रहें माता पिता

माता-पिता बच्चों के लालन-पालन में अनेक प्रकार के कष्ट उठाते हैं। यदि बच्चा अस्वस्थ या बीमार पड़ जाता है , तो माता – पिता ईश्वर की प्रार्थना करते हुए रातों को जागते हैं और अस्पताल में डाक्टरों या हकीमों का चक्कर लगा – लगा कर थक जाते हैं , तब कहीं जाकर बच्चे को स्वस्थ या तन्दुरुस्त देखते हैं । माता – पिता बच्चे को यह भी सिखाते हैं कि बेटे – बेटी स्कूल या कालिजों में वाद – विवाद या झगड़ों से बचना , यदि कोई तुझे परेशान करे , तो शिक्षक , या आचार्य को बताना या फिर उसे क्षमा करना , और अपने को छोटा मानकर अहंकार की भावना अपने मे मत पनपने देना । उनकी इस प्रकार की हिदायतें बच्चों के भविष्य के दृष्टिगत होती हैं। वे नहीं चाहते कि उनके बच्चे व्यर्थ के झगड़ों में फंसकर समय नष्ट करें।
इस प्रकार माता – पिता बच्चे को क्षमा , दया की भावना भी सिखाते हैं । यदि बच्चा माता पिता के करीब किसी स्कूल या विद्यालय में पढ़ रहा होता है , तो जो कार्य माता – पिता करते हैं , जैसे कि खेती – बाड़ी ( कृषि ) , दुकानदारी या अन्य घरेलू कार्य आदि उसमें भी माता – पिता अपने बच्चे को अपने व्यवसाय या कार्य या दुकानदारी के हुनर सिखाते रहते हैं । जिससे कि आवश्यकता पड़ने पर वह आत्म निर्भर बनें । बड़ा होने पर जब बच्चा पढ़ – लिख कर तैयार हो जाता तो वह माता – पिता अपने बच्चे को योग्यता के अनुसार , व्यवसाय कराना , उसकी देख-रेख करके हौंसला अफजाई ( प्रोत्साहित ) करते हैं । प्रेम प्यार से समाज में रहने के नियम एवं विपत्तियों या प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने के लिए सब्र व शांति का पाठ पढ़ाने से भी माता-पिता नहीं चूकते हैं।
बच्चे के बड़ा होने या व्यस्क होने के बाद भी माता – पिता उसे ‘ बच्चा ‘ ही समझते हैं । लेकिन समझदार माता – पिता बच्चे के व्यस्क या अपने पैरों पर खडा होने के बाद ‘भाई ‘ का दर्जा देकर समझाते हैं।
जो माता – पिता धार्मिक या भक्ति भावना में विश्वास रखते हैं वह अपने बच्चों को अपने साथ धार्मिक स्थलों प्रवचन , सत्संग स्थलों पर ले जाकर उन्हें सामाजिक बुराइयों से बचाकर आत्मिक शिक्षा एवं भक्ति भावना एवं परमपिता – परमात्मा की भक्ति एवं संत- संगत से जोड़कर खुश देखना चाहते हैं । माता – पिता चाहते हैं कि मेरा पुत्र या पुत्री अच्छी संगति में रहें। वे अपनी संतान को गंदी सोहबत या बुरे लोगों की संगति में नहीं देखना चाहते हैं।
मां बाप की इच्छा होती है कि उनके बच्चे साधु संगति करते रहे, क्योंकि :-

‘ एक घड़ी आधी घड़ी , आधी हूँ से आध।
कबीर संगत साध की , कटै कोटि अपराध॥

कबीर संगत साध की , हरै और की ब्याधि।
संगत बुरी असाध की , आठों पहर उपाधि।
(वाणी संत कबीर साहिब)

संत पलटू जी ने भी इस संदर्भ में कहा है कि :-

संगत ऐसी कीजिए , जहां उपजे ज्ञान।
पलटू तहां न बैठिये , घर को होवे हानि॥

अच्छे पुरुषों की संगति से जीवन में भारी परिवर्तन होते हैं। इस संबंध में संत चरणदास जी का कहना है कि :-

शील बडो ही योग है , जो करि जाने कोय।
शीलविहीनो चरनदास कबहू मुक्ति न होय॥
पूजा संयम नेम जो , यज्ञ करे चित लाय ॥
चरणदास कहें शील बिन , सभी अकारथ जाय॥

माता – पिता पुत्रियों या पुत्रों की शादी करने के बाद भी उन्हें ससुराल में अपनी सास माता ( Mother in law ) ससुर पिता ( Father in Law ) एवं उनके परिवार के लोगों से ठीक से प्रेम प्यार का माहौल बनाने की सीख देते हैं।
ईश्वर की दया से मुझे पुत्रीयों एवं पुत्रों का पिता बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है । मालिक या ईश्वर ने हमें जितनी बुद्धि या ज्ञान ,आत्मिक ज्ञान व आर्थिक साधन दिए हैं ,उससे हम माता – पिता का फर्ज अदा करने में मालिक का शुक्रिया अदा करना चाहते हैं। हम लोग (माता- पिता) हैं। ईश्वर तेरी दी बुद्धि, विवेक से हम थोड़ा ही जानते हैं लेकिन इसमें हमें आनन्द व शांति की अनुभूति होती है, क्योंकि तेरी दी गई सन्तान हमसे काफी समझदार व भक्ति भावना से ओत-प्रोत है।
हमारे लिए यह और भी अधिक प्रसन्नता की बात है कि हमारी संतान अहंकारी नहीं है। इसके लिए परम पिता परमेश्वर का जितना धन्यवाद ज्ञापित किया जाए, उतना ही कम है। हमें अपनी पिछली पीढी के दिए गए संस्कारों को अगली पीढ़ी को देते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि परिवार, कुल, वंश की परंपरा सुंदर रूप से आगे बढ़ती रहे। हमारा यह भी प्रयास होना चाहिए कि धर्म और संस्कृति के प्रति हमारी संतानों में विशेष लगाव होना चाहिए। राष्ट्र भक्ति, ईश्वर भक्ति और वेद भक्ति ही जीवन का कल्याण कर सकती है। अतः अपनी संतान को उनके प्रति समर्पित करना भी हमारा उद्देश्य होना चाहिए। राष्ट्रभक्ति, ईश्वर भक्ति और वेद भक्ति ही वह त्रिवेणी है जिसमें स्नान करके सब धन्य हो जाते हैं।

ऋषिराज नागर (एडवोकेट)

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