ममता बनर्जी की सरकार और भ्रष्ट मंत्री

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ललित गर्ग 

आज हम जीवन नहीं, राजनीतिक मजबूरियां जी रहे हैं। राजनीति की सार्थकता नहीं रही। अच्छे-बुरे, उपयोगी-अनुपयोगी का फर्क नहीं कर पा रहे हैं। मार्गदर्शक यानि नेता शब्द कितना पवित्र व अर्थपूर्ण था पर नेता अभिनेता बन गया। नेतृत्व व्यवसायी बन गया।

भ्रष्टाचार के खेल ने दुनिया के सारे लोकतंत्रों को खोखला कर दिया है। भारतीय लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, इसलिए इसकी साफ-सफाई ज्यादा जरूरी है। इन दिनों गैरभाजपा प्रांतों में भ्रष्टाचार के मामले बड़ी संख्या में उजागर हो रहे हैं। पहले दिल्ली में आम आदमी सरकार के स्वास्थ्य मंत्री सतेन्द्र जैन और अब पश्चिम बंगाल में उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी की गिरफ्तारी बता रही है कि ममता बनर्जी एवं अरविन्द केजरीवाल भ्रष्टाचार मुक्त शासन के कितने ही दावे क्यों न करें, लेकिन उनके वरिष्ठ मंत्री भी भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के घेरे में हैं। विभिन्न राजनीतिक दलों एवं विभिन्न प्रांतों की सरकारों में भ्रष्टाचार की बढ़ती स्थितियां गंभीर चिन्ता का विषय है, चिन्ताजनक स्थितियां भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर किसी सार्थक एवं राष्ट्रहित की बहस का न होकर राजनीति का होना भी है।

भ्रष्टाचार, राजनीतिक अपराधीकरण एवं जाति-सम्प्रदाय के हिंसक आग्रहों पर हमारी राजनीति में अभी कोई बहस नहीं है। राजनीति में लगे लोगों में जब इन मसलों की गहराई तक जाने का धैर्य और गंभीरता चुक जाए, तो इसके मंच के संवाद पहले निम्न दर्जे तक गिरते हैं और फिर कीचड़ को ही संवाद का विकल्प मान लिया जाता है। इन दिनों यही हो रहा है। भ्रष्टाचार के लिए मोदी सरकार जो कार्रवाइयाँ कर रही है, वह सराहनीय है लेकिन उन पर गैर-भाजपा नेता एवं दल विशेष पर ऐसी कार्रवाइयाँ करने का आरोप भी एक तरह का भ्रष्टाचार ही है। जिन दलों पर ऐसी कार्रवाइयाँ हो रही है उनका सवाल यह है कि ये सब कार्रवाइयाँ विरोधी दलों के नेताओं और सिर्फ उन धनाढ्य घरानों के खिलाफ क्यों हो रही हैं, जो कुछ गैर-भाजपा दलों के साथ नत्थी रहे हैं? यह एक तरह की पूर्वाग्रहग्रस्त कीचड़ उछाल राजनीति है।

यह सब उस दौर में हो रहा है जब देश के राजनीतिक दल धीरे-धीरे अपनी साख खोते जा रहे हैं। राजनीतिज्ञों की साख गिरेगी, तो राजनीति की साख बचाना भी आसान नहीं होगा। हमारे पास राजनीति ही समाज की बेहतरी का भरोसेमंद रास्ता है और इसकी साख गिराने वाले कारणों में अपराधीकरण और भ्रष्टचार के बाद तीसरा नंबर इस कीचड़ उछाल का भी है। ये तीनों ही राजनीति के औजार नहीं हैं, इसलिए राजनीति को तबाही की ओर ले जाते हैं। अपराधीकरण और भ्रष्टाचार का मसला काफी गहरा है और इससे खिलाफ लड़ाई के लिए काफी वक्त और ऊर्जा की जरूरत है, लेकिन कीचड़ उछाल से परहेज करके और सार्थक बहस चलाकर देश की राजनीति का सुधार आंदोलन शुरू किया जा सकता है। राजनैतिक कर्म में अपना जीवन लगाने वालों से इतनी उम्मीद तो की ही जानी चाहिए।
आज हम जीवन नहीं, राजनीतिक मजबूरियां जी रहे हैं। राजनीति की सार्थकता नहीं रही। अच्छे-बुरे, उपयोगी-अनुपयोगी का फर्क नहीं कर पा रहे हैं। मार्गदर्शक यानि नेता शब्द कितना पवित्र व अर्थपूर्ण था पर नेता अभिनेता बन गया। नेतृत्व व्यवसायी बन गया। आज नेता शब्द एक गाली है। जबकि नेता तो पिता का पर्याय था। उसे पिता का किरदार निभाना चाहिए था। पिता केवल वही नहीं होता जो जन्म का हेतु बनता है अपितु वह भी होता है, जो अनुशासन सिखाता है, ईमानदारी का पाठ पढ़ाता है, विकास की राह दिखाता है। आगे बढ़ने का मार्गदर्शक बनता है।
अब यह केवल तथाकथित नेताओं के बलबूते की बात नहीं रही कि वे गिरते मानवीय, नैतिक एवं चारित्रिक मूल्यों को थाम सकें, समस्याओं से ग्रस्त सामाजिक व राष्ट्रीय ढांचे को सुधार सकें, तोड़कर नया बना सकें। राजनेता एक आदर्श किरदार निभाएं, एक प्रशस्त मार्ग दें। सही वक्त में सही बात कहें। आज ईमानदारी को नहीं, येनकेन प्राप्त सफलता एवं सत्ता प्राप्ति को एकमात्र राजनीतिक एवं मानवीय गुण माना जाता है। इन स्थितियों ने नैतिक प्रयासों एवं लोकतांत्रिक मूल्यों के सामने प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दिया है। आज विचारों और दिखावटी आदर्श के गरिष्ठ बौद्धिक हलुवे की जरूरत नहीं बल्कि सहज सनातन मानवीय गुणों से राजनेताओं को परिचित करवाने की जरूरत है। एकाएक ऐसा होना सम्भव नहीं। इसके लिए विभिन्न राजनीतिक दलों में मूल्यों की चेतना को जगाने के साथ भ्रष्टाचार मुक्ति का वातावरण बनाना होगा। ऐसे सद्प्रयासों के खिलाफ बवेला मचाने वाले, इनकी जड़ों में मट्ठा डालने वाले हर कदम पर मिलेंगे। जागृत चेतना ही इनके प्रहार झेलने की ढाल बन सकती है। यह गम्भीर चिन्ता और चुनौती का विषय है। अगुवाई का दायित्व कठमुल्लाओं और व्यवसायी नेताओं को नहीं दिया जाना चाहिये, चाहे उनका रंग, रूप, नाम कुछ भी क्यों न हो। वे दीवारों पर विज्ञापन चस्पा सकते हैं, पुल नहीं बना सकते, राष्ट्र के चरित्र पर दाग लगा सकते हैं, उसकी साख नहीं बढ़ा सकते।

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) राजनीतिक भ्रष्टाचार के सफाई अभियान में लगी है। उसने शिक्षक भर्ती घोटाले की जांच के सिलसिले में शुक्रवार को पश्चिम बंगाल में उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी और शिक्षा राज्य मंत्री परेश चंद्र अधिकारी के यहां छापे मारे थे। ईडी ने चटर्जी से घंटों पूछताछ की। उसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। यह मामला तब और तूल पकड़ गया जब ईडी ने चटर्जी की करीबी अर्पिता मुखर्जी के यहां से बीस करोड़ रुपए से ज्यादा रकम बरामद की। पुख्ता जानकारी के मुताबिक, चटर्जी के यहां छापे के दौरान मिले दस्तावेजों की जांच करती हुई ईडी टीम अर्पिता के घर पहुंची थी। ईडी का दावा है कि यह शिक्षक भर्ती घोटाले की ही रकम है। देखें तो इतनी बड़ी रकम मिलना इसलिए भी गंभीर मामला है कि महिला पार्थ चटर्जी की करीबी बताई जा रही है। ऐसे में ममता सरकार पर सवाल क्यों नहीं उठेंगे, जिसका मंत्री ही सवालों के घेरे में है? 
ऐसा भी नहीं कि भ्रष्टाचार का यह अकेला मामला हो। ममता सरकार के पिछले दो कार्यकालों में भ्रष्टाचार के कई बड़े मामले सामने आए हैं और सरकार के मंत्रियों को जेल भी भेजा गया है। हालांकि पार्थ चटर्जी के खिलाफ मामला अभी अदालत में चलेगा और जांच एजेंसियों को साबित करना होगा कि बीस करोड़ रुपए उसी घूस के हैं जो शिक्षक भर्ती घोटाले में लोगों से ली गई थी। हालांकि जांच एजेंसियां ऐसी भारी-भरकम नगदी बरामद करती रहती हैं। ऐसे बेहिसाब धन की बरामदगी भ्रष्टाचार मुक्त शासन का वादा और दावा करने वाली सरकारों पर बड़े सवाल खड़े करती हैं। यानी अगर सरकारों में ईमानदारी से काम हो रहा है तो आखिर इतनी बेहिसाब दौलत आ कहां से रही है? किसी मंत्री के करीबी या रिश्तेदार के पास से इतनी भारी नगदी मिलना संदेह पैदा क्यों नहीं करेगा? 
याद किया जा सकता है कि कुछ समय पहले झारखंड की एक वरिष्ठ आइएएस अधिकारी के सीए के यहां से सत्रह करोड़ से ज्यादा की नगदी बरामद हुई थी। पिछले साल उत्तर प्रदेश चुनाव के दौरान कानपुर के एक कारोबारी के यहां से भी लगभग दो सौ करोड़ रुपए नगद मिले थे। यह तो तब है जब मामले ईडी और सीबीआई या राज्यों की भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसियों की पकड़ में आ जाते हैं और उनका खुलासा हो जाता है। वरना कैसे करोड़ों-अरबों के राजनीतिक भ्रष्टाचार के लेन-देन खुलेआम होते होंगे, कौन जानता है! 
आखिर भ्रष्टाचार के वैश्विक सूचकांक में भारत की स्थिति दयनीय यों ही नहीं बनी हुई है! बात केवल आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस की ही नहीं है, भ्रष्टाचार जहां भी हो, उसकी खिलाफ बिना किसी पक्षपात के कार्रवाई की जानी चाहिए। भाजपा एक राष्ट्रवादी पार्टी है, नये भारत एवं सशक्त भारत को निर्मित करने के लिये तत्पर है तो उसकी पार्टी के भीतर भी यदि भ्रष्टाचार है तो उसकी सफाई ज्यादा जरूरी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अन्य दलों के साथ भाजपा के नेताओं के भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई का बिगुल बजायें तो यह आजादी के अमृत महोत्सव मनाने की सार्थक पहल होगी, जिसके माध्यम से वे भारत के विलक्षण और एतिहासिक प्रधानमंत्री माने जाएंगे। भाजपा के कई मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों को उनके पद से हटाया जाना काफी नहीं है। उनकी जाँच करवाना और दोषी पाए जाने पर उन्हें सजा दिलवा दी जाए तो भारतीय राजनीति में स्वच्छता का शुभारंभ हो सकता है। एक नये राजनीतिक परिवेश से भारत का लोकतंत्र समृद्ध हो सकेगा।

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