vande-matram

लेखक – डॉ राकेश कुमार आर्य

स्वराज्य , विश्व कल्याण और वंदेमातरम

वेद मनुष्य को शिक्षा देता है कि वह ‘ सामूहिक कल्याण’ पर ध्यान केंद्रित करे। जब वेद ने अपना ‘ संगठन सूक्त’ बनाकर हमको दिया तो उसमें संपूर्ण विश्व के मानव समाज से यह अपेक्षा की गई कि वह सब के कल्याण के लिए अर्थात सामूहिक कल्याण के लिए अपने आप को समर्पित करे। उसका चिंतन वैश्विक चिंतन हो। उसका मानस वैश्विक मानस हो। व्यष्टिवाद की संकीर्णता से बाहर निकलकर वह समष्टि के बारे में सोचे। इतनी ऊंचाई पर जाकर सोचे कि जहां ऊंचाई का भी अंत हो जाए और जहां से नीचे देखने की भी संभावना न हो। यदि ऊंचाई का अंत होना संभव नहीं तो समझ लीजिए कि आपके चिंतन की ऊंचाई का अंत होना भी संभव नहीं। आपकी उड़ान निरंतर ऊपर की ओर होती रहनी चाहिए और यह केवल आपकी अपनी व्यक्तिगत उड़ान न हो , यह समस्त समाज की उड़ान हो। आप सब को साथ लेकर उड़ने वाले हों। आप उस उड़ान के लिए अपने आप को प्रस्तुत कर दें। आनंद आ जाएगा।

आनंद का चस्का लग जाएगा

जीवन के उस मधुमास की कल्पना कीजिए जिसमें आप आनंद की इन अनुभूतियों में अपने आप को खोया हुआ अनुभव कर रहे होंगे। यदि आपकी कल्पना में भी वह आनंद आ गया तो आप को ‘ आनंद का चस्का ‘ लग जाएगा। फिर आप आनंद के रसिया हो जाओगे। उस आनंद की खोज निरंतर जारी रहनी चाहिए, जिसमें आप सबके हो जाते हो और सब आपके हो जाते हैं। जिसमें आप सबके लिए कार्य करते हो और सब आपके लिए कार्य करते हैं। जिसमें आप संपूर्ण भूमंडल को अपना परिवार समझते हैं और संपूर्ण भूमंडल आपको अपने परिवार का एक सदस्य मानता है।
यह बड़ा प्यारा सौदा है। इस हाथ दो और उस हाथ हजारों गुणा लाभ फटाफट प्राप्त करो। इस आनंद की प्राप्ति के लिए ” पहले आओ – पहले पाओ” नहीं चलता है, यहां तो “सारे आओ – सारे पाओ” चलता है। हमने सबके साथ मिलकर चलने के इस प्यारे सौदा को गंवाकर ” सबके साथ बिगाड़कर चलने ” का घाटे का सौदा उठा लिया। उस घाटे के सौदा में हम निरंतर दलदल में फंसते जा रहे हैं। जितना ही निकलने का प्रयास करते हैं, उतना ही नीचे धंसते रहे हैं। इसके उपरांत भी यह नहीं समझ पा रहे हैं कि चूक कहां हो गई थी ?
वेद का ‘ संगठन सूक्त’ पढ़ा तो सही, यज्ञ पर भी बार-बार दोहराया। परंतु हृदय में उतारकर अपने ऊपर क्रियान्वित नहीं किया। हम विपरीत दिशा में चलते रहे और सही दिशा में बढ़ने वाले लोग हमारे पास से निकलते चले गए। बहुत देर बाद जाकर पता चला कि जो सही रास्ते पर जा रहे थे वह तो बहुत पहले हमारे पास से निकलकर बहुत दूर जा चुके हैं – जीवन निकल गया तो जीने का ढंग आया।

मेला उजड़ने लगा तो ध्यान आया…

जीवन के संगीत को उस समय समझने का प्रयास करना आरंभ किया जब संगीत ( वैदिक संस्कृति में हमारे शरीर को एक वाद्ययंत्र कहा गया है ) के सारे तार ढीले पड़ चुके थे। जब सारा वाद्य यंत्र जवाब दे चुका था, तब उसे सही ढंग से बजाने का प्रयास करना आरंभ किया। जब जीवन मेला उजड़ने लगा, तब आपको मेले में आनंद आने लगा। तब आप यह कामना करने लगे कि मेला अभी और लगना चाहिए।
जब आपसे लोगों ने मुंह फेर लिया तब आपने यह सोचना आरंभ किया कि सब मुझे देखें और मुझे सुनें।
हमारा स्वराज्य हमें सामूहिक कल्याण की शिक्षा देता है। ऋग्वेद का ‘ संगठन सूक्त’ हमें इसी मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। यजुर्वेद ( २२/२२) में जहां पर हमारा राष्ट्रगान दिया गया है,वहां पर गुणवान नागरिकों की कामना की गई है। परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना की गई है कि हमारे राष्ट्र में ऐसे गुणीजन हों जिनके रहते किसी को भी किसी प्रकार के अभाव की अनुभूति न हो। सबके घरों में समृद्धि हो, प्रसन्नता हो, संपन्नता हो।

गुणवान बनें, धनवान बनें,
जनवान बनें सब जग वाले,
परमार्थ करें सब स्वार्थ तजें,
हर काज करें भोले- भाले ।
धड़कन को सुनें फड़कन को सुनें,
श्वासन को सुनें दुनिया वाले।
कुछ भी करें – बस, ध्यान रहे,
हम काम करें, भक्ति वाले।

वेद की गुणवान नागरिकों की कामना ‘ वसुधैव कुटुंबकम’ के आदर्श को प्राप्त करने की कामना है। सारे संसार को आर्य अर्थात गुणवान नागरिकों का परिवार बना देने की कामना है। यह तभी सम्भव होगा जब संपूर्ण भूमंडल पर आर्यों का राज्य होगा। जब ‘आर्य, आर्यावर्त, आर्य-भाषा’ का सर्वत्र बोलबाला होगा , जब तक समाज में अन्याय होगा, जब तक समाज में अभाव होगा, और अज्ञान होगा, तब तक आपका आर्य, आर्यावर्त, आर्य भाषा का अथवा ‘ हिंदी- हिन्दू – हिंदुस्तान’ का सपना साकार नहीं हो पाएगा।

स्वामी दयानंद जी महाराज का उद्देश्य

जब स्वामी दयानंद जी महाराज ने अंग्रेजों के शासन के विरुद्ध देश के लोगों को उठ खड़े होने की प्रेरणा देना आरंभ किया तो उनका उद्देश्य लोगों को समझ में आ गया कि स्वामी जी की मान्यता यही है कि यदि स्वदेश, स्वराज, स्वभाषा , स्वसंस्कृति का कल्याण चाहते हो तो ‘ आर्य- आर्यावर्त – आर्य भाषा’ के प्रति समर्पित हो जाओ और विदेशी गुलामी के जुए को उतार फेंको।
जब स्वामी जी इस प्रकार का आह्वान कर रहे थे , तब वह आह्वान ‘ वंदेमातरम’ का आह्वान था अर्थात वंदनीय मातृभूमि के प्रति समर्पित हो जाने का आह्वान था। सभी राष्ट्रवासियों को अपनी स्वाधीनता के प्रति समर्पित होकर काम करने की प्रेरणा देने की एक बहुत ही मीठी तान का आह्वान था। लोगों ने स्वामी जी को सुना और वे स्वामी जी के संकल्प के साथ अपने आप को बांधकर स्वाधीनता प्राप्ति के लक्ष्य की ओर चल दिए। इसी तान को वंदे मातरम ने नया स्वर दिया। सब की भावनाओं को सामूहिक अभिव्यक्ति प्रदान की।
स्वामी जी के इस आह्वान से केवल भारतीय राष्ट्र का कल्याण होने वाला नहीं था, इससे संपूर्ण विश्व का कल्याण होने वाला था। क्योंकि भारत का वंदेमातरम अथवा मातृभूमि के प्रति समर्पण का भाव केवल भारत भूमि के लिए नहीं अपितु संपूर्ण वसुधा के प्रति समर्पण का भाव है। भारतीय राष्ट्र के तपस्वियों का चिंतन संपूर्ण भूमंडल से अज्ञान, अन्याय और अभाव को मिटाने के लिए कार्य करता रहा है। इसलिए स्वामी जी के आह्वान में संपूर्ण मानवता को बंधन मुक्त करने का दिशाबोध छुपा हुआ था।

वेद का भूमि सूक्त

जिस राष्ट्र के धर्म ग्रंथ अर्थात वेद में ‘ भूमि सूक्त’ (अथर्ववेद में ) मिलता हो , जिसमें मातृभूमि की वंदना की गई हो , जिसे मातृभूमि के लिए ही समर्पित कर दिया गया हो, उस राष्ट्र के निवासियों की मातृभूमि जमीन का एक टुकड़ा नहीं हो सकती, जमीन का एक कोना नहीं हो सकता। ‘ भूमि सूक्त’ इतना संकीर्ण नहीं हो सकता कि वह किसी एक क्षेत्र विशेष की मिट्टी के बारे में बात करे, क्षेत्र विशेष की भूमि के बारे में बात करे। वह तो संपूर्ण भूमि की बात करता है , भूमंडल की बात करता है। संपूर्ण वसुधा की बात करता है। उसका चिंतन विस्तृत है। इस वसुधा से निकलकर के भी वह अन्य लोक लोकान्तरों की उड़ान भरने की प्रेरणा हमको देता है तो उसके चिंतन को सीमित दायरे में रखकर समेटना और यह मानना कि ‘ भूमि सूक्त’ केवल भारत भूमि के लिए है, स्वयं परमपिता परमेश्वर के ज्ञान वेद के साथ अन्याय करना होगा।
हमारा स्वराज सामूहिक कल्याण के लिए था। मानव मात्र के कल्याण के लिए था और संपूर्ण प्राणी मात्र के लिए था।आज भी उसकी सफलता तभी मानी जाएगी जब वह सामूहिक कल्याण के लिए काम करता हुआ दिखाई देगा और भविष्य में भी वह तभी सफल होगा ,जब वह अपने इसी लक्ष्य के लिए कार्य कर रहा होगा। सनातन का स्वराज्य अपनी पूर्ण आभा से निकलता हुआ दिखाई देता है। उसमें कहीं कोई दोष नहीं दिखाई देता। उसमें पूर्णता है। दिव्यता है। भव्यता है। सर्व कल्याण का मनोहारी भाव है। वह पूर्णिमा का चंद्रमा है, अमावस्या का चंद्रमा नहीं।

वंदे मातरम और संस्कृति बोध

स्वाधीनता आंदोलन के दौरान सभी देशवासी अपनी भारत माता को स्वाधीन करने के संकल्प के साथ मैदान में उतरे हुए थे । चारों ओर ” फिरंगी को भगाओ ” का भाव छुपा हुआ था। सभी की एक ही मनोकामना थी कि मेरी पवित्र भारत भूमि स्वाधीन हो । वेदों की पवित्र भूमि भारत ने सारे संसार को जागरूक करने का कभी अभियान चलाया था। अपने इसी अभियान के अंतर्गत भारत कभी विश्व का सिरमौर रहा था। विश्व गुरु रहा था। लोगों के भीतर इसी पवित्र भाव को जगाने के लिए स्वामी दयानंद जी महाराज ने ” वेदों की ओर लौटो” का मंत्र दिया । उसका अर्थ था कि वेदों की व्यवस्था की और लोटो। जिस व्यवस्था के अंतर्गत हमारे जीवन में उन्नति के सारे सूत्र स्पष्ट होते हों – उस समय को फिर से लौटाकर लाने का अभियान चलाओ। स्वामी दयानंद जी महाराज की इस बात को पकड़ कर लोगों ने आगे बढ़ना आरंभ किया । यही राष्ट्र जागरण था। राष्ट्र के जागरण का अभिप्राय अपने मूल्यों को अंगीकार कर लेना होता है। अपने धर्म के मूल सूत्रों को स्वीकार करना होता है, जिनसे हमारी आत्मिक, शारीरिक और सामाजिक उन्नति होती हो।

पूर्णिमा के चंद्रमा की कल्पना करते हुए हमारे स्वाधीनता आंदोलन के दौरान ‘ वंदेमातरम’ ने हम सबका मार्गदर्शन किया था। यह एक शब्द था जो हमें संस्कृति बोध से भर देता था। इसके भीतर इतिहास बोध भी था, राष्ट्रबोध भी था, स्वबोध भी था, आत्मबोध भी था। इसमें क्रांति की ललकार थी। प्रचलित व्यवस्था को जलाकर भस्म कर देने की क्षमता थी। इसमें दासता के बंधन को तोड़ने का साहस था। शौर्य था। पराक्रम था। देश के लोग जिसके लिए तड़प रहे थे, उस तड़पन को इस वंदे मातरम ने शान्त करने का आभास दिया। विश्वास दिया। लोग लंगड़ी लूली अपंग मानसिकता से बाहर निकले और उनके भीतर उत्साह का संचार हुआ। जिसके कारण उन्होंने स्वराष्ट्र की स्वाधीनता की आराधना को गति प्रदान की। इसलिए लोगों ने बंकिम चंद्र चटर्जी को हाथों हाथ लिया और उन्हें राष्ट्रदूत मानकर उनका अभिनंदन किया। उनके इस एक शब्द को लेकर लोग नाचने लगे। झूमने लगे । मानो शिव का तांडव होने लगा था। राष्ट्र अंगड़ाई लेने लगा था। राष्ट्र में एक मचलन थी, जो पराधीनता की बेड़ियों को तोड़ने के लिए मचल उठी थी।

इस एक शब्द ने हमें अपने सामूहिक कल्याण के प्राचीनतम और सनातन मूल्य से अवगत करा दिया। लोगों को लगा कि हम सचमुच वेदों की ओर लौट गए हैं। जिसमें सब सब के कल्याण के लिए उठ खड़े होते थे। स्वाधीनता आंदोलन पर यदि विचार करें तो हम सब सब के सामूहिक कल्याण के लिए उठ खड़े हुए थे। हमारा इस प्रकार सामूहिक कल्याण के लिए उठ खड़ा होना ही राष्ट्र जागरण का वंदनीय स्वरूप था।
इस एक मूल्यवान शब्द भाव ने हमें अपने ‘ अथर्ववेद के भूमि सूक्त’ के साथ जाकर जोड़ दिया। जिसे गाकर हम अपनी मातृभूमि की वंदना के लिए उठ खड़े हुए । मातृभूमि की वंदना का अभिप्राय था कि उस पर पड़े पराधीनता के सारे बंधनों को तोड़ देना। उसे बंधन मुक्त कर देना। वंदे मातरम ने हम सब की सामूहिक अंतर्वेदना को अभिव्यक्ति दी। जब लोग सामूहिक रूप से जुलूस बनाकर वंदे मातरम बोलते चलते थे, जय घोष के नारे लगाते थे, तब यह सहज ही समझ में आ जाता था कि हम सब एक ही पीड़ा से ग्रस्त हैं और एक ही उद्देश्य लेकर चल रहे हैं कि मेरी मातृभूमि स्वाधीन हो। इस प्रकार वंदे मातरम हमारी सामूहिक चेतना का प्रतीक बन गया था । हमारी राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बन गया था। हम सब एक हैं और एक ही उद्देश्य के प्रति समर्पित हैं – इसको प्रतिबिंबित करने वाला जय घोष बन गया था।

गुणवान नागरिकों की कामना

राष्ट्र गुणवान नागरिकों से महान बनता है। जिस राष्ट्र के नागरिक गुणवान हों, आर्य हों ,श्रेष्ठ हों, वही राष्ट्र महान होता है। नागरिकों की चेतना में एक दूसरे के प्रति उदारता का भाव हो, सहयोग और समर्पण का भाव हो, त्याग और तपस्या का भाव हो – तब कोई राष्ट्र महान बनता है।
इस एक शब्द ने ही हमें यजुर्वेद के गुणवान नागरिकों की कामना के भाव के साथ जोड़कर खड़ा कर दिया। जैसे ही हमारा संपर्क अपने प्राचीन गौरव के इन सोपानों के साथ हुआ, तुरंत हमारे भीतर मानो बिजली का करंट दौड़ गया। जिन लोगों ने ‘वंदेमातरम’ को पहले दिन से अपने लिए अनुपयुक्त माना या अपनी भावनाओं को चोट पहुंचाने वाला माना, वे राष्ट्र की मुख्यधारा के साथ या तो समन्वय बनाना नहीं चाहते थे या जानबूझकर भारत के जागे हुए राष्ट्रवाद को फिर गहरी नींद सुलाने की अंग्रेजों की चालों के साथ अपने आप को जोड़कर देखना चाहते थे।

– डॉ राकेश कुमार आर्य
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)

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