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”गाय के विना गति नहीं, वेद के विना मति नहीं” !

गौ-निवास-गोष्ठ एवं आदर्श गौशाला ( 33 करोड़ देवी – देवताओं का देवालय ) जहाँ सिर्फ देश, भारतीय प्रजाति के गौवंश हो में किया गया सतकर्म करोड़ों-करोड़ों गुना आधिक फल देता है। ”गाय के विना गति नहीं, वेद के विना मति नहीं” !
जैसे —–
1 – पुंसवन संस्कार ! गर्भस्थ शिशु के मानसिक विकास की दृष्टि से यह संस्कार उपयोगी समझा जाता है। गर्भाधान के दूसरे या तीसरे महीने में इस संस्कार को करने का विधान है। हमारे मनीषियों ने सन्तानोत्कर्ष के उद्देश्य से किये जाने वाले इस संस्कार को अनिवार्य माना है। गर्भस्थ शिशु से सम्बन्धित इस संस्कार को शुभ नक्षत्र में सम्पन्न किया जाता है। पुंसवन संस्कार का प्रयोजन स्वस्थ एवं उत्तम संतति को जन्म देना है। विशेष तिथि एवं ग्रहों की गणना के आधार पर ही गर्भधान करना उचित माना गया है। यह ”पुंसवन संस्कार” अगर स्वच्छ, सुन्दर गौ -शाला में अनेको गौमाताओं और नंदी बैल, एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों  गुना पुण्य दायी होता है।

2 –  सीमन्तोन्नयन संस्कार !  सीमन्तोन्नयन को सीमन्तकरण अथवा सीमन्त संस्कार भी कहते हैं। सीमन्तोन्नयन का अभिप्राय है सौभाग्य संपन्न होना। गर्भपात रोकने के साथ-साथ गर्भस्थ शिशु एवं उसकी माता की रक्षा करना भी इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है। इस संस्कार के माध्यम से गर्भिणी स्त्री का मन प्रसन्न रखने के लिये सौभाग्यवती स्त्रियां गर्भवती की मांग भरती हैं। यह संस्कार गर्भ धारण के छठे अथवा आठवें महीने में होता है।
यह ”सीमन्तोन्नयन संस्कार” अगर स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी बैल भगवान , एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों  गुना पुण्य दायी होता है।

3 – नामकरण ! जन्म के ग्यारहवें दिन यह संस्कार होता है। हमारे धर्माचार्यो ने जन्म के दस दिन तक अशौच (सूतक) माना है। इसलिये यह संस्कार ग्यारहवें दिन करने का विधान है। महर्षि याज्ञवल्क्य का भी यही मत है, लेकिन अनेक कर्मकाण्डी विद्वान इस संस्कार को शुभ नक्षत्र अथवा शुभ दिन में करना उचित मानते हैं। नामकरण संस्कार का सनातन धर्म में अधिक महत्व है। हमारे मनीषियों ने नाम का प्रभाव इसलिये भी अधिक बताया है क्योंकि यह व्यक्तित्व के विकास में सहायक होता है। तभी तो यह कहा गया है राम से बड़ा राम का नाम हमारे धर्म विज्ञानियों ने बहुत शोध कर नामकरण संस्कार का आविष्कार किया। ज्योतिष विज्ञान तो नाम के आधार पर ही भविष्य की रूपरेखा तैयार करता है। अगर यह ”नामकरण संस्कार” स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी बैल भगवान , एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों  गुना पुण्य दायी होता है।

4 – निष्क्रमण संस्कार ! दैवी जगत् से शिशु की प्रगाढ़ता बढ़े तथा ब्रह्माजी की सृष्टि से वह अच्छी तरह परिचित होकर दीर्घकाल तक धर्म और मर्यादा की रक्षा करते हुए इस लोक का भोग करे यही इस संस्कार का मुख्य उद्देश निष्क्रमण का अभिप्राय है।
बाहर निकलकर इस संस्कार में शिशु को सूर्य तथा चन्द्रमा की ज्योति दिखाने का विधान है। भगवान भास्कर के तेज तथा चन्द्रमा की शीतलता से शिशु को अवगत कराना ही इसका उद्देश्य है। इसके पीछे मनीषियों की शिशु को तेजस्वी तथा विनम्र बनाने की परिकल्पना होगी। उस दिन देवी-देवताओं के दर्शन, 33 कोटि देवी देवताओं को धारण करने वाली गौमाताओं का दर्शन तथा उनसे शिशु के दीर्घ एवं यशस्वी जीवन के लिये आशीर्वाद ग्रहण कराया जाता है। जन्म के चौथे महीने इस संस्कार को करने का विधान है। तीन माह तक शिशु का शरीर बाहरी वातावरण यथा तेज धूप, तेज हवा आदि के अनुकूल नहीं होता है इसलिये प्राय: तीन मास तक उसे बहुत सावधानी से घर में रखना चाहिए। इसके बाद धीरे-धीरे उसे बाहरी वातावरण के संपर्क में आने देना चाहिए। इस संस्कार का तात्पर्य यही है कि शिशु समाज के सम्पर्क में आकर सामाजिक परिस्थितियों से अवगत हो। विद्द्वानो के मतानुसार इस संस्कार के बाद माँ के दूध के आलावा गौमाता का दूध भी दिया जाना सुरु किया जाता है।
इस ”निष्क्रमण संस्कार” की सुरुवात अगर स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों गुना पुण्य फलदायी माना गया है।

5 – अन्नप्राशन संस्कार ! इस संस्कार का उद्देश्य शिशु के शारीरिक व मानसिक विकास पर ध्यान केन्द्रित करना है। अन्नप्राशन का स्पष्ट अर्थ है कि शिशु जो अब तक पेय पदार्थो विशेषकर अपनी माता एवं गौमाता के दूध पर आधारित था अब अन्न जिसे शास्त्रों में प्राण कहा गया है उसको ग्रहण कर शारीरिक व मानसिक रूप से अपने को बलवान व प्रबुद्ध बनाए। तन और मन को सुदृढ़ बनाने में अन्न का सर्वाधिक योगदान है। शुद्ध, सात्विक एवं पौष्टिक आहार से ही तन स्वस्थ रहता है और स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन का निवास होता है। आहार शुद्ध होने पर ही अन्त:करण शुद्ध होता है तथा मन, बुद्धि, आत्मा सबका पोषण होता है। इसलिये इस संस्कार का हमारे जीवन में विशेष महत्व है। हमारे धर्माचार्यो ने अन्नप्राशन के लिये जन्म से छठे महीने को उपयुक्त माना है। छठे मास में शुभ नक्षत्र एवं शुभ दिन देखकर यह संस्कार करना चाहिए। गौ दुग्ध से बनी खीर और मिठाईयां शिशु के अन्नग्रहण में अत्यधिक शुभ माना गया है। अमृत: क्षीरभोजनम् हमारे शास्त्रों में खीर को अमृत के समान उत्तम माना गया है। इस ”अन्नप्राशन संस्कार” की सुरुवात अगर स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों गुना पुण्य फलदायी माना गया है।

6 – चूड़ाकर्म संस्कार ! चूड़ाकर्म को मुंडन संस्कार भी कहा जाता है। हमारे आचार्यो ने बालक के पहले, तीसरे या पांचवें वर्ष में इस संस्कार को करने का विधान बताया है। इस संस्कार के पीछे शुाचिता और बौद्धिक विकास की परिकल्पना हमारे मनीषियों के मन में होगी। मुंडन संस्कार का अभिप्राय है कि जन्म के समय उत्पन्न अपवित्र बालों को हटाकर बालक को प्रखर बनाना है। नौ-माह तक गर्भ में रहने के कारण कई दूषित किटाणु उसके बालों में रहते हैं। मुंडन संस्कार से इन दोषों का सफाया होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस संस्कार को शुभ मुहूर्त में करने का विधान है। वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ यह संस्कार अगर किसी पवित्र वातावरण वाले गौष्ठ या गौनिवास में सम्पन्न हो तो बहुत उत्तम माना गया है।
इस ” चूड़ाकर्म संस्कार” की सुरुवात अगर स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों गुना पुण्य फलदायी माना गया है।

7 – विद्यारम्भ संस्कार ! विद्यारम्भ का अभिप्राय बालक को शिक्षा के प्रारम्भिक स्तर से परिचित कराना है। प्राचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी तो बालक को वेदाध्ययन के लिये भेजने से पहले घर में अक्षर बोध कराया जाता था। माँ-बाप तथा गुरुजन पहले उसे मौखिक रूप से श्लोक, पौराणिक कथायें आदि का अभ्यास करा दिया करते थे ताकि गुरुकुल में कठिनाई न हो। हमारा शास्त्र विद्यानुरागी है। शास्त्र की उक्ति है सा विद्या या विमुक्तये अर्थात् विद्या वही है जो मुक्ति दिला सके। विद्या अथवा ज्ञान ही मनुष्य की आत्मिक उन्नति का साधन है। शुभ मुहूर्त में ही विद्यारम्भ संस्कार करना चाहिये। इस ”विद्यारम्भ संस्कार” की सुरुवात अगर स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में विद्वान आचार्य अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य में कराएँ तो बालक अनेकों गुना विद्द्वान विद्यार्थी होता है।

8 –  कर्णवेध संस्कार ! हमारे मनीषियों ने सभी संस्कारों को वैज्ञानिक कसौटी पर कसने के बाद ही प्रारम्भ किया है। कर्णवेध संस्कार का आधार बिल्कुल वैज्ञानिक है। बालक की शारीरिक व्याधि से रक्षा ही इस संस्कार का मूल उद्देश्य है। प्रकृति प्रदत्त इस शरीर के सारे अंग महत्वपूर्ण हैं। कान हमारे श्रवण द्वार हैं। कर्ण वेधन से व्याधियां दूर होती हैं तथा श्रवण शक्ति भी बढ़ती है। इसके साथ ही कानों में आभूषण हमारे सौन्दर्य बोध का परिचायक भी है।
यज्ञोपवीत के पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शुक्ल पक्ष के शुभ मुहूर्त में इस संस्कार का सम्पादन श्रेयस्कर है।
इस ”कर्णवेध संस्कार” की सुरुवात अगर स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों गुना पुण्य फलदायी माना गया है।

9 –  यज्ञोपवीत संस्कार ! यज्ञोपवीत अथवा उपनयन बौद्धिक विकास के लिये सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। धार्मिक और आधात्मिक उन्नति का इस संस्कार में पूर्णरूपेण समावेश है। हमारे मनीषियों ने इस संस्कार के माध्यम से वेदमाता गायत्री को आत्मसात करने का प्रावधान दिया है। आधुनिक युग में ब्रह्मलीन पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी आदि अनेको विद्द्वानो ने भी गायत्री मंत्र पर विशेष शोध किया है। गायत्री सर्वाधिक शक्तिशाली मंत्र है। यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं अर्थात् यज्ञोपवीत जिसे जनेऊ भी कहा जाता है अत्यन्त पवित्र है। प्रजापति ने स्वाभाविक रूप से इसका निर्माण किया है। यह आयु को बढ़ानेवाला, बल और तेज प्रदान करनेवाला है। इस संस्कार के बारे में हमारे धर्मशास्त्रों में विशेष उल्लेख है। यज्ञोपवीत धारण का वैज्ञानिक महत्व भी है। प्राचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी उस समय प्राय: आठ वर्ष की उम्र में यज्ञोपवीत संस्कार सम्पन्न हो जाता था। इसके बाद बालक विशेष अध्ययन के लिये गुरुकुल जाता था। यज्ञोपवीत से ही बालक को ब्रह्मचर्य की दीक्षा दी जाती थी जिसका पालन गृहस्थाश्रम में आने से पूर्व तक किया जाता था। इस संस्कार का उद्देश्य संयमित जीवन के साथ आत्मिक विकास में रत रहने के लिये बालक को प्रेरित करना है। इस पवित्र ”यज्ञोपवीत संस्कार” की सुरुवात अगर स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में विद्वान आचार्य अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों गुना पुण्य फलदायी होता  है।

10  – वेदारम्भ संस्कार ! ज्ञानार्जन से सम्बन्धित है यह संस्कार। वेद का अर्थ होता है ज्ञान और वेदारम्भ के माध्यम से बालक अब ज्ञान को अपने अन्दर समाविष्ट करना शुरू करे यही अभिप्राय है इस संस्कार का। शास्त्रों में ज्ञान से बढ़कर दूसरा कोई प्रकाश नहीं समझा गया है। स्पष्ट है कि प्राचीन काल में यह संस्कार मनुष्य के जीवन में विशेष महत्व रखता था। यज्ञोपवीत के बाद बालकों को वेदों का अध्ययन एवं विशिष्ट ज्ञान से परिचित होने के लिये योग्य आचार्यो के पास गुरुकुलों में भेजा जाता था। वेदारम्भ से पहले आचार्य अपने शिष्यों को ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने एवं संयमित जीवन जीने की प्रतिज्ञा कराते थे तथा उसकी परीक्षा लेने के बाद ही वेदाध्ययन कराते थे। असंयमित जीवन जीने वाले वेदाध्ययन के अधिकारी नहीं माने जाते थे। हमारे चारों वेद ज्ञान के अक्षुण्ण भंडार हैं।
इस अति महत्वपूर्ण ”वेदारम्भ संस्कार”  की सुरुवात विद्द्वान आचार्य महोदय के श्रीमुख से स्वच्छ, सुन्दर वातावरण वाली गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों गुना पुण्य फलदायी माना गया है। क्योकि सनातन धर्म के अनुसार ”गौमाता” के सानिंध्य में किया गया वेद पाठ 33 करोड़ देवी-देवताओं के सानिंध्य में किया गया पाठ माना जाता है।

11 – केशान्त संस्कार ! गुरुकुल में वेदाध्ययन पूर्ण कर लेने पर आचार्य के समक्ष यह संस्कार सम्पन्न किया जाता था। वस्तुत: यह संस्कार गुरुकुल से विदाई लेने तथा गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का उपक्रम है। वेद-पुराणों एवं विभिन्न विषयों में पारंगत होने के बाद ब्रह्मचारी के समावर्तन संस्कार के पूर्व बालों की सफाई की जाती थी तथा उसे स्नान कराकर स्नातक की उपाधि दी जाती थी। केशान्त संस्कार शुभ मुहूर्त में किया जाता था।
पहले गुरुकुलों में ही बड़ी-बड़ी गौशालाएं हुआ करती थी पर अब वह समय नहीं रहा इस लिए इस  ”केशान्त संस्कार” को अगर विद्द्वान आचार्य स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य में करायें तो करोड़ों गुना पुण्य फलदायी होजाता है।

12 – समावर्तन संस्कार !  गुरुकुल से विदाई लेने से पूर्व शिष्य का समावर्तन संस्कार होता था। इस संस्कार से पूर्व ब्रह्मचारी का केशान्त संस्कार होता था और फिर उसे स्नान कराया जाता था। यह स्नान समावर्तन संस्कार के तहत होता था। इसमें गौ-मूत्र, गंगा-जल,गुलाब-जल, सुगन्धित पदार्थो एवं औषधादि युक्त जल से भरे हुए वेदी के उत्तर भाग में आठ घड़ों के जल से स्नान करने का विधान है। यह स्नान विशेष मन्त्रोच्चारण के साथ होता था। इसके बाद ब्रह्मचारी मेखला व दण्ड को छोड़ देता था जिसे यज्ञोपवीत के समय धारण कराया जाता था। इस संस्कार के बाद उसे विद्या स्नातक की उपाधि आचार्य देते थे। इस उपाधि से वह सगर्व गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का अधिकारी समझा जाता था। सुन्दर वस्त्र व आभूषण धारण करता था तथा आचार्यो एवं गुरुजनों से आशीर्वाद ग्रहण कर अपने घर के लिये विदा होता था।
पहले तो गुरुकुलों में ही बड़ी-बड़ी गौशालाएं हुआ करती थी पर अब वह समय नहीं रहा इस लिए इस  ”केशान्त संस्कार” को अगर विद्द्वान आचार्य स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य में करायें तो करोड़ों गुना पुण्य फलदायी होजाता है।

13 –  विवाह संस्कार ! प्राचीन काल से ही स्त्री और पुरुष दोनों के लिये यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। यज्ञोपवीत से समावर्तन संस्कार तक ब्रह्मचर्य व्रत के पालन का हमारे शास्त्रों में विधान है। वेदाध्ययन के बाद जब युवक में सामाजिक परम्परा निर्वाह करने की क्षमता व परिपक्वता आ जाती थी तो उसे गृर्हस्थ्य धर्म में प्रवेश कराया जाता था। लगभग पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का व्रत का पालन करने के बाद युवक परिणय सूत्र में बंधता था।
हमारे शास्त्रों में आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख है- ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्रजापत्य, आसुर, गन्धर्व, राक्षस एवं पैशाच। वैदिक काल में ये सभी प्रथाएं प्रचलित थीं। हमारे देवभूमि उत्तराखण्ड के अलावा भी आज देश भर में कई प्रान्तों में रात्रि तमाम गोष्ठ यानि गौनिवास में शादी-विवाह करते है। ताकि 33 कोटि प्रत्यक्ष देवी-देवताओं का (गौमाता ) आशीर्वाद इस विवाह को मिल सके। जो सुसंस्कारी परिवार है उन्होंने ये परम्परा आज भी नहीं छोड़ी है। आज उन्हीं के प्रयासों का परिणाम है कि हमारा समाज सभ्य और सुसंस्कृत है। पहले प्रतेक घर में एक गोष्ट या गौ निवास होता था पर अब समय बदल गया है इसलिए इस ”विवाह संस्कार” को अगर विद्द्वान आचार्य स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े – बछियों के पवित्र सानिंध्य में ”सात फेरे” करायें तो विवाह गठबंधन सात जन्म तक सुरक्षित रहता है यह मान्यता है हमारे सनातन शास्त्रों की जो सदा सत्य ही होती है।

14 – अन्त्येष्टि संस्कार ! यहाँ तक की अंतिम संस्कार में भी बैतरणी पार करने हेतु गौ-दान और ”गौमाता” के पूछ पकड़ा कर मृतक शरीर को गौ-लोक धाम की, वैकुण्ठ लोक की प्राप्ति करायी जाती है। जिससे जीव की आत्मा फिर 84 के फेरे में यानि ”पुनरपि जननं, पुनरपि मरणं, पुनरपि जननी जठरे शयनं”
भज गोविन्दं, भज गोविन्दं, गोविन्दं भज मूढ़मते !!  आदि जगद्गुरु शंकराचार्य जी ने लिखा —
बार-बार जन्म लेने का दुःख, बार-बार मरने का दुःख और बार-बार माँ के पेट में रहने का दुःख क्यों भोग रहा है ? अरे मूढ़मति !! (इन दुखों को समाप्त करने के लिए) 33 करोड़ देवी-देवताओं का शुद्द निवास स्थान गौशाला में बैठ कर श्रीकृष्ण का स्मरण कर, श्रीकृष्ण का स्मरण कर, श्रीकृष्ण का स्मरण कर, या अपने-अपने इष्ट को भजों। —
इस तरह सनातन धर्म के प्रतेक संस्कार में गौमाता एवं गौवंश का अतिमहत्वपूर्ण स्थान था, है, रहेगा। यहाँ तक की किसी कारण वस किसी के पितर नीच योनी में चले गयें है,या प्रेत योनी में गये अपने ही पितर पुरे परिवार को परेशान करते है तो सनातन शास्त्रों के अनुसार एक नंदी बैल को छोड़ा जाता है। गौदान किया जाता है। पर आज के समय में नंदी बैल को खुला छोड़ने का मतलब कसाई- गौहत्यारों को दावत देना और पाप को मोल लेना है। इसलिए आज का मानव भी अपने पितरों की तारण-तरन के निमित गाय, बछिया, बछड़े  या नंदी बैल का दान किसी सुरक्षित,पवित्र, स्वच्छ, सुन्दर गौशाला में करें तो वही पुण्य प्राप्त कर सकता है जो वेद पुराणों में वर्णित है । इसीलिए कहाँ गया है ”गाय के विना गति नहीं, वेद के विना मति नहीं” —–
”नयाल सनातनी”

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