प्रकृति का अनोखा वायु शोधक जीव नाग* “

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संस्कृत की सृप् धातु से सांप शब्द सिद्ध होता है। जिसका अर्थ है भूमि के साथ साथ जाना या रेगने वाला जीव। संस्कृत भाषा व संस्कृत शब्दकोश बहुत विलक्षण वैज्ञानिक व्यापक है। सांपों की सैकड़ों प्रजातियों की बात करें तो प्रत्येक सांप, नाग नहीं हो सकता लेकिन प्रत्येक नाग सांप जरूर होता है। नाग को सांपों का राजा कहा जाता है ,नागराज की ही सैकड़ों उप्रजातियां है। नागराज की विलक्षणता जीवशास्त्रीय पर्यावरण महत्ता की दृष्टि से पूर्व नाग शब्द पर ही विचार करते हैं । नाग शब्द का प्रथम अर्थ है ‘नगे भवः नागः’ जो नग अर्थात पर्वत में रहता है… दूसरा अर्थ है न+अगः अर्थात जो स्थिर नहीं होता। नाग कभी एक स्थान पर नहीं रहता हमेशा स्थान बदलता रहता है इसलिए इसका नाम नाग होता है। नाग की जो प्रथम विशेषता है वह यह है यह बहुत गहरी सांस लेता है…. बहुत बल के साथ सांस को धकेलता है कोलाहल के अभाव में आप सैकडो फीट दूर से नाग की फुनकार को सुन सकते हैं। 1 मिनट में मात्र 5 से 6 श्वास लेता है नाग सांसो के मामलों में बहुत कंजूस होता है बहुत कम श्वास खर्च करता है। अन्य सरीसृप की अपेक्षा यह दीर्घ जीवन जीता है 35 वर्ष एक नाग की अधिकतम उम्र होती है जो सांपों की बिरादरी में बहुत अधिक है। श्वास लेने का नायाब तरीका ही इसे दीर्घायु बनाता है । सांपों के शरीर में उसके फेफड़े बहुत मजबूत होते है शरीर के सापेक्ष बहुत विशाल लंबे होते हैं हैरत की बात यह है सांपों के शरीर में दो फेफड़े होते हैं लेकिन एक ही फेफड़ा कार्य करता है नाग भी इसका अपवाद नहीं है और साथ ही साथ मनुष्यों की तरह सांपों के फेफड़ों के साथ डायाफ्राम जैसी साहक मांसपेशी नहीं होती फिर भी सांप गहरा श्वास लेते हैं। अन्य सांपों की अपेक्षा एक नाग 2 घंटे तक अपना श्वास रोक सकता है। नाग प्रणायाम का उत्तम अभ्यासी होता है। शायद इसी कारण इसे नागराज की उपाधि मिली है। नाग कभी भी मृत् चूहे छछूंदर मेंढक आदि को नहीं खाता हमेशा यह ताजा शिकार करता है और भोजन ना भी मिले तो महीनों तक भूखा रह सकता है वायु सेवन के सहारे वायु में भी यह पर्यावरण की जहरीली वायु का भक्षण करता है प्रकृति पर्यावरण को स्वच्छ रहता है। वर्षा ऋतु में यह विशेष उग्रता को धारण कर लेता है साथ ही शीतल वर्षा के जल से तपते भूतल पर जब जल पड़ता है तो पृथ्वी से हानिकारक वाष्प निकलती है आयुर्वेद के ग्रंथों में इस जहरीली वाष्प का विस्तृत वर्णन मिलता है। चरक सुश्रुत महर्षि वाग्भट ने तो अपने अपने ग्रंथों में वर्षा ऋतु में नंगे पैर चलना तथा मकान के प्रथम तल पर सोने का निषेध किया है इसी जहरीली वाष्प से बचने के लिए। वर्षा ऋतु में पृथ्वी तल से उत्सर्जित होने वाली आंखों से ना दिखाई देने वाली हानिकारक वाष्प शरीर के तीनों दोषों को कुपित कर देती है वात दोष को उग्र कर देती है। यही कारण है सभी के आरोग्य प्रतिरक्षा तंत्र की मजबूती के लिए सावन में विशेष यज्ञों करने का विधान भी इसी जहरीली वाष्प से बचने के लिये किया गया है साथ-साथ नाग भी इसी कार्य में मनुष्यों का सहयोग करते हैं। नाग जहरीली वाष्प का सेवन करता है मनुष्य व अन्य जीवों की सहायता जहरीली वायु से बचाने में करता है नाग का एक नाम ‘पवनाश्नन’ इसी कारण है । यही कारण है वैदिक संस्कृति में सांपों को भी नमस्कार करने का संदेश मिलता है। यजुर्वेद के 13 वे अध्याय का 6 वा मंत्र इसमें प्रमाण है जो इस प्रकार है”नमोस्तु सर्पेभ्यो मे के च पृथ्विव्यामनु” अर्थात भूमि पर विचरन करने वाले भौमिक सांपों को भी मैं नमस्कार नमस्ते करता हूं ।

कालांतर में सावन के महीने में नाग सहित सापों को ना मारने के लिए भी यही संरक्षण सम्मान का भाव जुड़ा हुआ है…. वैयक्तिक स्तर पर नाग भय की विषय वस्तु है लेकिन व्यष्टिगत स्तर पर नाग बहुत ही हितकारी पर्यावरण को जहरीली गैसों से मुक्त करने वाला साफ स्वच्छ रखने वाला इकोसिस्टम का शानदार जीव है। आज 16 जुलाई को विश्व सर्प दिवस है प्रतिवर्ष जो पूरी दुनिया में मनाया जाता है लेकिन हमारी वैदिक संस्कृति सांपों के लिए 1 दिन नहीं पूरे महीने को उनके संरक्षण के लिए समर्पित कर देती है सावन महीना संवत्सर के बारे महीनों में ऐसा ही एक महीना है। नाग व सभी सांप खुद विषपान कर प्रकृति को स्वच्छ रखते हैं। इस विष का प्रयोग अपनी आत्मरक्षा में भी करते हैं।

*आस्तीन के सांपों को छोड़कर प्रकृति के सभी सांपों को सर्प दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएं*!

आर्य सागर खारी ✍✍✍

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