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पी संग होली

छलक-छलक रंग छितरा के,

पी मोसे छली-छबि छिपा के,

जो नैनन निश्छलता भर कर,

बाँध मुझे भरमा रहे हो,

निज दरस का रस दिखला के,

प्रेम इंगित इठला रहे हो,

तो जान लो कर लाख मनचाही,

न चले है कपट इह कन्हाई,

सरक-सरक चल छोड़ मोरी कंठी,

न निरख नसि चल हट पाखंडी,

रिझत-रिझत तोरे नैना रपटे,

खिजत-खिजत मोरी चूड़ी़ चटके,

छल-रंग भरी अपनी पिचकारी,

मोड़ मोसे निज छटंक निराली,

हुन माफ़ी माँगत फिरो न बैरी,

होली दिवस बरजोरी कैरी?

हिय सिँगारो ले उर की प्रीति,

चल मान हार मान मैं ही जीती,

पर तुम बिन जो मैं पूरी अधूरी,

राग-रंग संग पाटो इह दूरी,

घुलत-घुलत गुड़ से तोरे बैना,

चुगत-चुगत मिसरिम मन-मैना,

इस होली मोरी चूनर रंग दे,

खिलत-खिलत हो रस भरे रैना।

 

स्वाती भलोटिया

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