जम्मू-कश्मीर : यह तो होना ही था, यह गठबंधन नहीं लठबंधन है

पवन कुमार अरविंद

जम्मू-कश्मीर की पीडीपी-भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने एक मार्च को शपथ लेने के तत्काल बाद जैसा देश विरोधी बयान दिया, उस पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। क्योंकि उनका आचरण पहले से ही संदिग्ध रहा है। वे राष्ट्रीय राजनीति के फलक पर तब अचानक उभरे थे जब केंद्र की तत्कालीन वीपी सिंह सरकार में गृहमंत्री बनाए गए थे। यह भी गौरतलब है कि वीपी सरकार को भाजपा के साथ ही वामपंथियों का भी समर्थन प्राप्त था। हालांकि मुफ्ती इसके पूर्व 1986 में राजीव गांधी की सरकार में पर्यटन मंत्री भी रहे, लेकिन उतना चर्चित नहीं हुए जितना कि गृहमंत्री बनने के बाद। उन्होंने उत्तर प्रदेश के मेरठ में हुए दंगों के विरोध में राजीव मंत्रिपरिषद से इस्तीफा देने के बाद कांग्रेस भी छोड़ दी थी।

8 दिसंबर 1989 को मुफ्ती को वीपी सरकार में गृहमंत्री बने सप्ताह भर भी नहीं हुए थे कि उनकी बेटी रुबैया सईद का आतंकियों ने अपहरण कर लिया था। हालांकि आतंकियों ने रूबैया को 13 दिसंबर 1989 को छोड़ दिया था। लेकिन इसके बदले में वीपी सरकार को जेल में बंद पांच खूंखार आतंकियों को रिहा करना पड़ा था। मुफ्ती ने अपनी बेटी को आतंकियों के चंगुल से मुक्त कराने के लिए वीपी सिंह पर कई प्रकार से दबाव भी बनाए थे।

तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में गृह राज्यमंत्री रहे वरिष्ठ भाजपा नेता स्वामी चिन्मयानंद ने वर्ष 2006 में एक अनौपचारिक बातचीत में मुझे बताया था कि मुफ्ती ने वीपी सिंह को मंत्रिपरिषद छोड़ने की धमकी भी दी थी। इस दबाव के कारण वीपी सिंह को झुकना पड़ा था और उन्होंने पांच खूंखार आतंकियों को जेल से रिहा करने का फैसला किया। हालांकि यह संयोग कहा जाए या दुर्योग, लेकिन यह तथ्य है कि वर्ष 1989 से जम्मू-कश्मीर में आतंकी गतिविधियों में अचानक बाढ़ सी आ गयी। तब से लेकर आज तक प्रदेश बारूद के ढेर पर बैठा है।

यह भी ध्यातव्य है कि देश में जब भी लोकसभा या राज्य विधानसभाओं के चुनावों का बिगुल बजता है, तो पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी गतिविधियां कुछ ज्यादा ही बढ़ जाती हैं। लेकिन मुफ्ती ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद कहा कि अलगाववादियों, आतंकी गुटों और पाकिस्तान के कारण ही जम्मू-कश्मीर का हालिया विधानसभा चुनाव शांतिपूर्ण व निष्पक्ष ढंग से हो सका है। हालांकि ऐसे बयानों से देश व प्रदेश की जनता का कोई सरोकार नहीं है। यह मुफ्ती का निजी बयान हो सकता है, लेकिन इस बयान ने उनके आचरण को और संदिग्ध बना दिया है। आगामी दिनों में पीडीपी-भाजपा में टकराव बढ़ेगा, इसके आसार भी अवश्यंभावी हैं। लेकिन सरकार पर कोई खतरा नजर नहीं आता।

कॉमन कुछ भी नहीं, फिर मिनिमम क्या?

दरअसल, जम्मू-कश्मीर की प्रकृति ही अलग है। यह तीन अंचलों- जम्मू, लद्दाख और कश्मीर में बंटा हुआ है। जम्मू व लद्दाख के लोगों की सोच कश्मीर घाटी के अधिकांश लोगों की सोच से भिन्न है। जम्मू व लद्दाख के अधिकांश लोग अनुच्छेद-370 को हटाने और सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून को न हटाए जाने के पक्षधर माने जाते हैं। जबकि कश्मीर घाटी के लोग इसके विरोधी। वहीं, इन मुद्दों पर भाजपा और पीडीपी की सोच एक दूसरे की विरोधी है। सवाल यह है कि दोनों दलों के प्रमुख मुद्दों में कुछ भी कॉमन (उभयनिष्ठ) नहीं है, मिनिमन (न्यूनतम) की तो बात ही अलग है। फिर भी कॉमन मिनिमम प्रोग्राम की चर्चा है। स्पष्ट है कि भाजपा और पीडीपी केवल सरकार के लिए इकट्‌ठा हुई हैं, जिसका आधार केवल आपसी सूझबूझ है। यह न तो गठबंधन है और न ही कोई समझौता, बल्कि यह तो ‘लठबंधन’ है। जो नंदगांव के कान्हा की तरह बरसाना की गोपिओं के लाठियों की प्रेमभरी मार झेलता रहेगा। इसलिए इस सरकार के पूरे छह साल चलने के आसार प्रबल हैं।

परंपरागत राजनीति को तोड़ने की कवायद

पीडीपी और भाजपा में भले ही वैचारिक समानता न हो, लेकिन भाजपा ने उसके साथ सरकार बनाकर उचित ही किया है। प्रदेश में मजबूत व टिकाऊ सरकार के लिए यही केवल एक फार्मूला भी था। वैसे भी, सदैव ‘कम्फर्ट जोन’ में बने रहना भी ठीक नहीं माना जाता है। नित नए-नए प्रयोग होने चाहिए और परंपरागत राजनीति को बदलने के लिए कभी-कभी रिश्क भी लेना चाहिए, जो भाजपा ने लिया है। पीडीपी के साथ सरकार बनाने का भाजपा का फैसला प्रदेश की राजनीति पर निश्चित रूप से दूरगामी असर डालेगा। इससे इनकार नहीं किया जा सकता। साथ ही मुफ्ती की असलियत का पता भी चल जाएगा। यह असलियत जानने का साहस भाजपा ने किया है। वैसे, कहा भी जाता है- ‘आपको कोई व्यक्ति केवल एक बार ही धोखा दे सकता है।’

(लेखक दैनिक भास्‍कर से जुड़े हैं)

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