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हिन्दू शक्ति ने बढ़ाई दिल्ली की मुस्लिम राजनीति में रूचि

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जब किसी मुस्लिम राजवंश का पतन होता था तो स्वाभाविक रूप से अंतिम समय के सुल्तानों का अपने शासन पर नियंत्रण शिथिल हो जाता था। शासन की इस शिथिलता का लाभ हमारे तत्कालीन हिंदू वीर अवश्य उठाते थे। यह क्रम 1206 ई. से लेकर अब तक (तुगलक वंश के अंतिम दिनों तक) यथावत चला आ रहा था। यद्यपि हिंदू प्रतिरोध किसी भी वंश के किसी भी शासक के शासन-काल में बंद नही हुआ, पर शासकों की क्रूरता और अमानुषिक अत्याचारों के कारण कई बार शिथिल सा अवश्य हो जाता था। उस शिथिलता का लाभ मुस्लिम सुल्तान अपनी सल्तनत के विस्तार हेतु कर लिया करते थे। इस प्रकार ‘सांप छछूंदर का सा खेल’ इस समय देश में चल रहा था।

तुगलक वंश का अंतिम काल

तुगलक वंश का महत्वपूर्ण अंतिम शासक फीरोजशाह तुगलक ही था। उसका देहांत 20 सितंबर 1388 ई. को हो गया था। सुल्तान की मृत्यु के पश्चात तुगलक वंशी लोगों में उत्तराधिकार के लिए संघर्ष चला, इस संघर्ष में लगभग दस वर्ष व्यतीत हो गये।

कई लोग अल्पकाल के लिए सुल्तान बने और चलते बने। 24 सितंबर 1388 ई. को फीरोजशाह तुगलक का पुत्र मुहम्मद नासिरूद्दीन शाह के नाम से दिल्ली के राज्यसिंहासन पर बैठा। परंतु सत्ता  षडय़ंत्र दिल्ली-दरबार में इतनी प्रबलता से बन रहे थे कि इस सुल्तान के द्वारा उनका सामना किया जाना असंभव था। इसलिए मुस्लिम इतिहास लेखकों के अनुसार सुल्तान को शीघ्र ही राजधानी दिल्ली को छोडक़र भागने के लिए विवश होना पड़ा और वह सिरमूर पहाडिय़ों पर चला गया।

इस सुल्तान के पलायन के पश्चात फीरोजशाह का पौत्र तुगलकशाह बिन फतेह खां दिल्ली के सिंहासन पर आरूढ़ हुआ। कहा जाता है कि तुगलक शाह बिन फतेह खां फीरोजशाह तुगलक की मृत्यु के दिन (20 सितंबर 1388 ई.) ही सुल्तान घोषित कर दिया गया था। उसी के प्रबल विरोध के कारण चार दिन बाद सुल्तान बना नासिरूद्दीन मुहम्मद शाह राजधानी छोडक़र भागने के लिए विवश हुआ था।

मुहम्मद शाह ने हिंदू नरेश से ली शरण

मुहम्मद शाह दिल्ली से भागकर नगरकोट के शासक संगरचंद के यहां पहुंचा और उससे राजनीतिक शरण देने की प्रार्थना की। हिंदू नरेश संगरचंद ने शरणागत को शरण दे दी। इधर मुहम्मद शाह का पीछा करने के लिए नये सुल्तान तुगलक शाह बिन फतेह खां ने अपनी ओर फीरोज अली और बहादुर नाहिर को पलायन किये सुल्तान का पीछा करने हेतु सेना सहित भेज दिया। पर जब इन दोनों शाही सेनापतियों को यह जानकारी मिली कि नगरकोट के शासक संगरचंद ने सुल्तान मुहम्मद शाह को शरण दे दी है, तो वह संगरचंद की सेना का सामना करने से बचते हुए बिना युद्घ किये और बिना अपने शिकार को प्राप्त किये राजधानी दिल्ली लौट गये। इस प्रकार संगरचंद के पराक्रम और दिल्ली सुल्तान के भीतर छाये ‘हिंदू भय’ के कारण एक युद्घ होने से टल गया। परंतु इस स्थिति में फंसी शाही सेना के पीछे हटने और युद्घ से भागने की घटना ने नये सुल्तान की दुर्बलताओं को भी स्पष्ट कर दिया।

dielhi tuglaq fortराय सुमेर और उधरन ने की स्वतंत्रता की घोषणा

कूटनीति की मांग यही होती है कि जब शत्रु अपनी समस्याओं में उलझा हो, तभी उस पर आक्रमण कर अपने अधिकारों और स्वतंत्रता की रक्षा करनी चाहिए। सावधान मनसा होकर जो लोग संसार के समरांगण में युद्घ करते हैं, वो उचित अवसर के आते ही उसे शिकार की भांति लपक लेते हैं और उसका भरपूर लाभ उठाते हैं।

इटावा के मुकद्दम (यह शब्द वास्तव में मुकदम है, जिसका अर्थ है जिसके कदम के मुताबिक चलने वाले लोग हों अर्थात जिसके अनुचित, अनुयायी, अनुसरण करने वाले पर्याप्त लोग हों या जो ऐसे बहुत से लोगों को अपना नेतृत्व दे सकें) सुमेर और उधरन का हम पूर्व में उल्लेख कर चुके हैं। ये दोनों मुकद्दम राजधानी दिल्ली में ही वास कर रहे थे। अब जब उन्होंने देखा कि तुगलक वंशी लोगों में उत्तराधिकार का युद्घ सीमाओं को पार कर गया है, और इस युद्घ से तुगलकवंश अपने पतन के मार्ग पर बढ़ता जा रहा है, तो उन्होंने दिल्ली दरबार से निकलकर अपने गृह क्षेत्र इटावा में जाना उचित समझा और वहां जाकर अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी।

इन दोनों ने मासलपुर को अपनी राजनीतिक गतिविधियों का केन्द्र बनाया और स्वतंत्रता पूर्वक अपना काम करने लगे।

जब दिल्ली के सुल्तान को इटावा के समाचार मिले तो उसने इन समाचारों के आधार पर राय सुमेर और उधरन के स्वतंत्रता आंदोलन को कुचलने के लिए शाही सेना भेज दी। मलिकजादा महमूद बिन फीरोज खां इस सेना का नायक नियुक्त किया गया था। सेना ने इटावा की ओर कूच किया और मसलपुर पहुंच कर वहां भारी विनाश किया। राय सुमेर और उधरन की ओर से कोई प्रतिरोध न होने के कारण शाही सेना विजयी मुद्रा में दिल्ली लौटने लगी। परंतु तभी राय सुमेर और उधरन की हिंदू सेना ने शाही सेना पर पीछे से आक्रमण कर दिया। इस आक्रमण से शाही सेना संभल नही सकी और वह भागने लगी। भागती हुई सेना को राय सुमेर और उधरन की सेना ने निर्णायक रूप से पराजित किया। मुहम्मद बिहामद खानी से हमें जानकारी मिलती है कि इस युद्घ में बड़े बड़े अमीर और प्रतिष्ठित मलिक मारे गये, काफिरों के हाथों शहीद हो गये। मलिक जादा महमूद पराजित होकर मुंज कस्बे की चला गया।

जब पौरूष का चमत्कार सिर चढक़र बोलता है तो स्वाभाविक रूप से दूसरे लोग आपके समक्ष झुकने लगते हैं। निश्चित रूप से प्रेम भी अपने आप में एक अमूल्य वस्तु है, परंतु पौरूष और शौर्य जैसी वस्तुएं दूसरों को झुकाने के लिए और भी अधिक अमूल्य हैं।  पौरूष और शौर्य का प्रयोग जब निजी महत्वाकांक्षा और निजी हितों की पूर्ति के लिए किया जाने लगता है तब ये दोनों ही व्यक्ति का अहंकार बन जाते हैं और जब ये दोनों समष्टि के कल्याणार्थ प्रयोग किये जाते हैं तो उस समय राष्ट्र का गौरव बन जाते हैं। इस गौरव के मूल में प्रेम छिपा होता है-सामूहिक कल्याण का भाव छिपा होता है-इसलिए पौरूष और शौर्य के समक्ष संसार झुकता है, उन्हें सम्मान देता है और उनके दिव्य गुणों का पूजन और सम्मान करता है।

हिन्दुओं को मिलने लगी प्राण ऊर्जा

जब हिंदुओं ने मसलपुर से सुल्तान की सेना को परास्त कर भागने के लिए विवश किया तब अन्य हिंदू क्षेत्रों को  प्राण ऊर्जा ही मिलने लगी। स्वतंत्रता के लिए पहले से ही व्याकुल इन हिंदू क्षेत्रों में स्वतंत्रता की ज्वाला जंगल में आग की भांति फैल गयी।

हिन्दुओं की इस सफलता से आसपास के क्षेत्रों पर उनका प्रभाव छा गया और चंदवार, भोगांव, भूतेद, बारचा, महोनी तथा रतवा आदि भाग जो फीरोज के समय मुस्लिम आधिपत्य में चला गया था, पुन: हिंदुओं के अधिकार में आ गया। यद्यपि मलिकजादा महमूद की पराजय के उपरांत शीघ्र ही जुनैद खां तथा कुछ प्रतिष्ठित अमीर सुलेमान खां तथा पलखां आदि दिल्ली से अपने भाई महमूद खां के साथ मुंज पहुंच गये, तथापि संभवत: इस क्षेत्र में हिंदुओं के बढ़ते प्रभुत्व के कारण अब महमूद उस क्षेत्र में रहने का साहस न कर सका।

(संदर्भ : मुस्लिम लेखक जकी काा विवरण)

इटावा ने स्वतंत्र होकर देर तक दिल्ली सल्तनत का प्रतिरोध किया। इस प्रकार इटावा ने कुछ देर पराधीन रहकर पुन: स्वाधीन होकर अपना राष्ट्रीय दायित्व पूर्ण किया। इटावा का अनुसरण इसके पश्चात अन्य हिन्दू क्षेत्रों ने किया।

मुस्लिम राजनीति में हिन्दुओं की रूचि

मुस्लिम राजनीति यद्यपि पूर्णत: रक्तिम रहती थी, जो कि हिंदुओं के अनुकूल नही होती थी। मुस्लिम लोग तलवारों को मर्यादाहीन रखने को ही वीरता मानते थे, जबकि हिंदू अपनी तलवार को मर्यादा में रखकर उसका प्रयोग शत्रु नाश के लिए करना अपना धर्म मानता था। परंतु इस सबके उपरांत हिंदू के मौलिक स्वभाव में कुछ अंतर आ रहा था, जो कि बहुत ही महत्वपूर्ण था, क्योंकि उसके आगे चलकर कुछ ऐसे परिणाम आने वाले थे, जो देश की राजनीति को नई दिशा देने के लिए प्रयास करते दीखे।

हिंदुओं ने अब मुस्लिम दरबारों में रहना आरंभ कर दिया। राय सुमेर और उधरन इसके उदाहरण थे। वहां रहकर इन लोगों ने लेाहे को लोहे से काटने की रणनीति पर काम करना चाहा। हिंदुओं ने ऐसे व्यक्ति को या दरबारी को अपना समर्थन देकर प्रोत्साहित करना आरंभ किया, जो उनके लिए भविष्य में औरों से श्रेष्ठ सिद्घ हो सकता था। फीरोजशाह तुगलक की मृत्यु के उपरांत दिल्ली के राज्य सिंहासन के लिए चल रहे उत्तराधिकार के युद्घ में हिंदुओं ने अपनी पसंद का सुल्तान बनाकर अपने लिए अनुकूलताओं का निर्माण करना चाहा। हिंदुओं का ऐसा प्रयास भी एक प्रकार का स्वतंत्रता आंदोलन ही था। क्योंकि ऐसी योजना भी उन्हें विदेशी क्रूर शासन से मुक्त करा सकती थी।

फीरोजशाह की मृत्यु के पश्चात लगभग पांच माह का समय ही व्यतीत हुआ होगा कि सुल्तान तुगलकशाह की हत्या कर दी गयी। यह घटना 19 फरवरी 1389 ई. की है। जो दूसरों का रक्त बहाता है, समय एक दिन उसका रक्त बहाता है। सृष्टि के नियम अकाट्य हैं। वे परिमाण में छोटे हो सकते हैं, आड़े तिरछे-लंबे, कैसे भी हो सकते हैं, परंतु परिणाम में उनका मार्ग सदा सीधा ही पाया जाता है। इसलिए रक्त बहाने वाले को अपना रक्त बहता देखने के लिए भी तैयार रहना चाहिए। ‘दीन और ईमान’ की बातें करने वाले दूसरे मतावलम्बियों के प्रति सदा ‘बेदीन और बेईमान’ रहें और उनका रक्त बहाते रहे-समय का कालचक्र घूमता रहा-घूमता रहा और जब यह कालचक्र परिणामों का भुगतान करने लगा तो ‘बेदीन और बेईमान’ लोग स्वयं ही कट कटकर मरने लगे। हमें लगता है कि ये ‘बेदीन और बेईमान’ नाम का जीव आजकल का धर्मनिरपेक्ष नाम का प्राणी होता है। इस जीव की प्रकृति और कार्य क्षेत्र राजनीति होती है।

जब तुलक शाह मार दिया गया तो उसके स्थान पर फीरोजशाह तुगलक का एक अन्य पौत्र अबू बक्र शाह बिन जफर खां को दिल्ली के सिंहासन पर बैठाया गया। इस अवसर का लाभ उठाने के लिए मुहम्मद शाह (जो कि  नगरकोट में अपना राजनीतिक वनवास काट रहा था) दिल्ली की ओर चल दिया। वह समाना तक पहुंचा और वहां उसने स्वयं को सुल्तान घोषित कर दिया।

यहिया का कहना है कि ‘‘समाना में नये सुल्तान से आकर कई मुकद्दम मिले’’। उन सबने मुहम्मद शाह को अपना सुल्तान माना और मुस्लिम दरबारों में जारी सत्ता संघर्ष में कुछ लोगों को उनकी दानवता के लिए कठोर दण्ड देने का उचित अवसर समझा। हिंदू मुकद्दमों के साथ आ जाने से शाहजादा मुहम्मद बहुत उत्साहित हुआ, क्योंकि अब उसकी शक्ति में पर्याप्त वृद्घि हो गयी थी।

हमें ध्यान रखना चाहिए कि स्वतंत्रता प्राप्ति के कई उपाय हमारे हिंदूवीरों के पास उपलब्ध हो सकते थे, इनमें से एक सीधे-सीधे प्रतिरोध का रास्ता था, दूसरा कहीं प्रतिशोध का रास्ता था, तीसरे कहीं समय के अनुसार पीछे हट जाने का भी रास्ता था, और चौथे अपने अनुकूल सुल्तान को बैठाकर अपनी खोयी हुई शक्ति का संग्रह कर हिंदुत्व की रथार्थ स्वराज्य की ओर बढऩा भी एक उपाय या रास्ता था। हिंदू मुकद्दमों ने इस समय स्वराज्य की स्थापनार्थ चौथे उपाय को अपना लिया था। मुहम्मद शाह हिंदू मुकद्दमों की सेना और अपनी स्वयं की सम्मिलित सेना के साथ राजसिंहासन प्राप्ति की अभिलाषा को लेकर आगे बढ़ा।

अबू बक्रशाह की सेना को किया परास्त

29 अप्रैल 1389 ई. को मुहम्मद की सेना का संघर्ष सुल्तान अबू बक्रशाह की सेना से दिल्ली में हुआ। इस संघर्ष में मुहम्मद की सेना को पराजय का सामना करना पड़ा। परंतु उसने साहस से काम लिया और जलेसर में रहकर शक्ति में वृद्घि करने लगा। कदाचित यह निर्णय उसने अपने हिंदू समर्थकों के परामर्श से ही लिया होगा। क्योंकि दोआब में किसी मुसलमान का अपनी शक्ति में वृद्घि के लिए रूक जाना यूं ही संभव नही था। विशेषत: तब जबकि दोआब अपनी स्वतंत्रता प्रेमी भावना और मुस्लिम प्रतिरोध के लिए कुख्यात रहा हो। दोआब की हिंदू शक्ति मुहम्मद को उन परिस्थितियों में स्वराज्य प्राप्ति के लिए अपना ‘मोहरा’ बनाकर राजनीति में रूचि ले रही थी।

बसु महोदय कहते हैं कि मुहम्मद के लिए जलेसर एक उपयुक्त स्थान था, क्योंकि कुछ दिन पूर्व इस क्षेत्र में हिंदुओं ने दिल्ली सुल्तान के विरूद्घ विद्रोह कर उसकी सत्ता समाप्त करके इन क्षेत्रों में अपनी प्रभुता स्थापित की थी। यहिया लिखता है कि हिंदुस्तान के अमीरों में मुसलमानों के साथ राय सुमेर तथा अन्य राय एवं राणा लोग अपनी-अपनी सेनाओं के साथ आ मिले। इस प्रकार पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जमींदारों और मुकद्दमों ने मुहम्मद को अपना समर्थन देकर उसकी स्थिति सुदृढ़ करने का प्रयास किया।

…और कर लिया दिल्ली पर अधिकार

अबू बक्र शाह समझता था कि जितनी देर तक मुहम्मदशाह जलेसर में हिन्दू शक्ति का साथ और हाथ पकडक़र बैठा रहेगा, उतनी देर तक दिल्ली को  उसके संभावित आक्रमण से सुरक्षित नही माना जाना चाहिए। इसलिए उसने एक विशाल सेना के साथ जलेसर पर आक्रमण कर दिया। उधर मुहम्मद शाह भी अपने गुप्तचरों के माध्यम से दिल्ली की हर गतिविधि पर ध्यान लगाये बैठा था। उसे जैसे ही यह ज्ञात हुआ कि अबू बक्र शाह युद्घ के लिए दिल्ली से चल चुका है, वह दूसरे  मार्ग से दिल्ली में प्रवेश कर गया। मुहम्मद शाह ने अपने हिंदू साथियों के सहयोग से राजधानी पर अधिकार कर लिया। हिंदू शक्ति से पहले ही भयभीत अबू बक्र शाह और उसका सैन्य दल दिल्ली की ओर आने  के स्थान पर विपरीत दिशा में भाग गया। इस प्रकार दिल्ली पर मुहम्मदशाह का नियंत्रण स्थापित कराने में हिंदू शक्ति ने विशेष भूमिका निभाई।

यहिया लिखता है-‘‘राजसिंहासन के लिए मुसलमानों के संघर्ष के परिणाम स्वरूप हिंदुस्तान के काफिर हिंदू शक्तिशाली बन बैठै। उन्होंने जजिया तथा खराज देना बंद कर दिया, और मुसलमानों के गांवों को लूट लिया।’’

इस प्रकार जिन ब्राह्मणों ने जजिया के विरूद्घ अभी कुछ समय पहले फीरोजशाह तुगलक के शासन काल में धरना-प्रदर्शन एवं अनशन किया था, उनका वह देशभक्ति पूर्ण कार्य रंग लाया और पूरे हिन्दू समाज को ही जजिया एवं खराज से मुक्ति मिल गयी।

स्वामी विवेकानंद जी ने सत्य ही तो कहा है-‘‘यद्यपि मैं हिंदू जाति का नगण्य व्यक्ति हूं, तथापि अपनी जाति और पूर्वजों के गौरव में मैं अपना गौरव समझता हूं। अपने को हिंदू बताते हुए और हिंदू कहते हुए अपना परिचय देकर मुझे एक प्रकार का गर्व सा होता है।’’

(संदर्भ :हिंदू धर्म पृष्ठ 97-98)

कहा जा सकता है कि दिल्ली पर मुहम्मद शाह का अधिकार कराके हिंदू शक्ति ने कौन सा बड़ा कार्य कर दिया था? लड़खड़ाते तुगलक वंश की शक्ति वैसे ही दुर्बल हो गयी थी, इसलिए हिंदू शक्ति ने यदि कोई सहायता की तो इसमें कोई विशेष उल्लेखनीय बात नही हो गयी थी।

ऐसा सोचने वाले बंधु तनिक विचार करें कि जब मुसलमान आक्रामक भारत पर आक्रमण कर यहां अपना अधिकार स्थापित करने हेतु आक्रमण पर आक्रमण करते जा रहे थे-तो उनके एक-एक प्रयास को भी इतिहास में स्थान दिया गया। और अंत में उन्हें विजेता घोषित कर दिया गया, परंतु जिस हिंदू-आर्य जाति ने इस कथित विजेता को विजेता बनने ही नही दिया उसके प्रयासों को तुच्छ मानकर उपेक्षित किया जाता है। जो विजेता थे वास्तव में वह तो इतिहास को मिटा रहे थे और जो पराजित दिखाये जाते रहे हैं-वे इतिहास बना रहे थे। क्योंकि उनका संघर्ष इतिहास मिटाने वालों से था।  इतिहास निर्माण का नाम है-विध्वंस का नही। इसलिए इतिहास का  निर्माण करने वालों का एक-एक प्रयास इतिहास में अंकित होना चाहिए।

एक उदाहरण से बात स्पष्ट हो सकती है। तुगलक वंश के काल के विषय में हमने अभी ऊपर लिखा है कि हिन्दू के मौलिक स्वभाव में अब अंतर आ रहा था और उसने मुस्लिम दरबारों में रहकर या बाहर से भी मुस्लिम शक्ति को दुर्बल करने में रूचि लेना आरंभ कर दिया था। तनिक इसी रूचि पर विचार कीजिए।

मुस्लिम इतिहासकार इसे राजद्रोह  कहेंगे और उस समय के हिंदू की स्थिति में आप स्वयं को खड़ा करके देखेंगे,  तो यह राजद्रोह न होकर देशभक्ति थी। राजद्रोह वह लोग कर रहे थे जो बलात् यहां के शासक बन बैठे थे और यहां की प्रजा पर अमानवीय अत्याचार ढहा रहे थे। हिंदू उन्हें जैसे भी हो भगाना चाहता था और वे जैसे भी हो यहां स्थापित होना चाहते थे। इसी द्वंद्व में राणा संग्राम सिंह ने आगे चलकर हिंदू जनभावना का ध्यान रखते हुए यदि बाबर को बुलाकर लोदीवंश की शक्ति को दुर्बल कर हिंदू राज्य स्थापित करने का संकल्प लिया हो, उसमें दोष क्या था?

प्रयास तो प्रयास है, उसका उद्देश्य यदि शुद्घ है तो चाहे वह असफल भी हो गया हो उसका विशेष उल्लेख होना चाहिए। इसलिए हिदू शक्ति ने मुहम्मद शाह को दिल्ली का सुल्तान बनाकर चाहे अंतिम स्वतंत्रता प्राप्त नही की, परंतु स्वतंत्रता के झोके तो अनुभव किया।

…और आप तंग कोठरी में रहकर संयोग वियोग से मिलने वाले सुखद झोंकों के अनुभव को उपेक्षित नही कर सकते।

क्रमश:

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