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काटजू और शरद यादव

न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू और सांसद शरद यादव के बयानों को लेकर हमारी संसद में हंगामा मचाहुआ है। लोकसभा और राज्यसभा, दोनों सदनों ने ही काटजू के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित करदिया है। काटजू कहते है कि मैं अपनी बात पर डटा हुआ हूं। संसद चाहे तो मुझे पागलखाने में भिजवादे। काटजू ने ऐसा क्या कह दिया कि जिससे हमारे नेतागण इतने दुखी और उत्तेजित हो गए है?काटजू ने कुछ तर्क देते हुए कहा है कि महात्मा गांधी अंग्रेजों के दलाल थे और सुभाषचंद्र बोस जापानके! गांधी ने राजनीति में धर्म का प्रवेश करवाया। इसी कारण देश के टुकड़े हुए।

 काटजू के ये विचार न तो तथ्य सम्मत हैं और न ही तर्क सम्मत! कोई बी. ए. का छात्र ही उनके सारेतर्कों और तथ्यों के परखचे उड़ा सकता है। इतिहास और राजनीति का कोई विद्वान इस मामले मेंकाटजू से बहस करने में अपना अपमान ही मानेगा। काटजू तो सिर्फ जज हैं। कानून के अलावा भी वेथोड़े बहुत पढ़े-लिखे हैं। साहसी भी हैं। जो भी बोल देते हैं, उस पर डटे रहते हैं। लेकिन मुझे यह समझनही आता कि उनके विरूद्ध हमारी संसद के दोनों सदनों को निंदा प्रस्ताव पारित करने की जरूरतक्यों आन पड़ी है?

 ऐसा करके क्या हमारी संसद अपना ही अवमूल्यन नहीं कर रही है? क्या वह खुद को काटजू के स्तरपर ही नहीं उतार रही है? काटजू के तर्कों से जो सांसद सहमत नहीं है, वे उनके खिलाफ अपने तर्कोंका अंबार क्यों नहीं लगा देते? ऐसा करने के बजाय उन्होंने बहुत सस्ता रास्ता चुन लिया। निंदा करदी। निंदा करने में किसी का क्या लगता है? इस काम के लिए किसी योग्यता की जरूरत नहीं है।संसद ने अपने आप को आजकल इसी स्तर पर उतार लिया है। यह भारतीय लोकतंत्र के लिए चिंताका विषय है।

 इसी प्रकार शरद यादव पर भी कुछ दक्षिण भारतीय नेता जबर्दस्ती बरस रहे हैं। शरद ने क्या कहा है?उन्होंने संसद में सिर्फ यही तो कहा है कि हम भारतीय लोगों के मन में गोरे रंग के प्रति अंधा लगावहै। इसी रौ में बहते हुए उन्होंने दक्षिण भारत की स्त्रियों के सांवले रंग और सुंदर देह-यष्टि का वर्णनकर दिया तो इसमें उन्होंने गलत क्या कहा है? यह बात तो लगभग इन्हीं शब्दों में डॉ. राममनोहरलोहिया भी कह चुके हैं। हिंदी के कई मध्ययुगीन कवियों ने शरद यादव जैसी बात काफी खुले ढंग सेकही है। उनकी बात को तोड़-मरोड़कर उस पर अश्लीलता का आरोप लगाना अनुचित है। किसी शब्द-विशेष को लेकर किसी की जुबान जरूर फिसल सकती है लेकिन उसकी असली मंशा को समझा जानाचाहिए। शरद यादव को श्रेष्ठ सांसद का सम्मान सभी दलों ने मिलकर दिया है, यह भी याद रखनाहोगा।

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