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पुस्तक समीक्षा : देवलोक में मानव

‘ देवलोक में मानव’ नामक पुस्तक डॉ राकेश कुमार शर्मा द्वारा लिखित परिवर्तित परिदृश्य के परिप्रेक्ष्य में एक व्यंग्य संकलन है। हम सभी जानते हैं कि मनुष्य इस संसार में सभी प्राणियों के बाद रची गई परमपिता परमेश्वर की एक अद्भुत रचना है। सृष्टि में सबसे अंत में मनुष्य को इसलिए भेजा गया क्योंकि वह पृथ्वी लोक पर आए सभी प्राणियों में उत्कृष्ट प्राणी था। स्वाभाविक है कि ऐसी परिस्थितियों में मनुष्य से यह अपेक्षा की जाती है कि वह सभी प्राणियों का संरक्षक बनकर रहेगा और किसी को भी इसी प्रकार की हानि नहीं पहुंचाएगा। इसके उपरांत भी मनुष्य का आचरण वैसा नहीं रहा जैसी उससे अपेक्षा की जाती थी।
। वेद उपनिषद आदि शास्त्रों के अंतर्गत मनुष्य के लिए अनेक ऐसे नैतिक नियम स्थापित किए गए, जिनसे वह अपनी जीवन जगत की यात्रा को सहज, सरल और सुगम बना सके। इन सारे नैतिक नियमों का समुच्चय धर्म है। यद्यपि मनुष्य ने अपनी नैतिकता की सारी सीमाओं को तोड़कर धर्म का एक बार नहीं अनेक बार उल्लंघन किया है। उसकी इसी प्रवृत्ति के कारण आज संपूर्ण मानवता दुखी और त्रस्त है।
अपने आपको समाज की एक इकाई मानकर अपना अंतरावलोकन करने के स्थान पर प्रत्येक व्यक्ति अपने आपको कुछ इस प्रकार प्रदर्शित करता है कि जैसे संसार में वह तो पूरी तरह दूध का धुला है पर अन्य लोग उसे जीने नहीं दे रहे हैं। जबकि सच्चाई यह है कि हमारे अपने कर्म ही हैं जो लौट लौटकर किसी न किसी प्रकार के कष्ट या दुःख के रूप में हमारी ओर आ रहे हैं। कहने का अभिप्राय है कि संसार में यदि आज हम दुखी हैं तो उनके मूल में हमारे अपने कर्म हैं। प्रत्येक व्यक्ति को इस सच को समझना ही चाहिए।
‘देवलोक में मानव’ डॉ राकेश कुमार शर्मा की पहली व्यंग्य रचना है। लेखक ने इस पुस्तक में कुल 27 व्यंग्य रचनाएं रची हैं। लेखक की इस पुस्तक के विषय में फारुक आफरीदी कहते हैं कि कद काठी में अपेक्षाकृत रचनाएं लघु हैं ,लेकिन इनमें जिन विषयों को उठाया गया है उसके कहन में वे सफल रहे हैं। कुछ रचनाएं समसामयिक घटनाओं पर भी आधारित हैं जिन्हें बड़ा फलक देने का प्रयास किया है। रचनाओं में कई स्थानों पर लोग प्रचलित बहारों का सटीक प्रयोग किया गया है।’
इस संकलन के बारे में लेखक डॉ राकेश कुमार शर्मा हमें स्वयं बताते हैं कि यह उनके प्रकाशित अप्रकाशित लेखों का संग्रह मात्र ही नहीं है अपितु प्रस्तुत व्यंग्य संकलन में अनेक गंभीर विषयों को प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया गया है। पुस्तक का पहला अध्याय ‘देवलोक में मानव’ है। जिसमें वह लिखते हैं कि देव ऋषि ने देवताओं को मानव की प्रगति की रिपोर्ट पेश करते हुए अपने संस्मरण सुनाकर अंत में टिप्पणी प्रस्तुत करते हुए ब्रह्मा जी से कहा हे प्रभु जंबूदीपे भरतखंडे में अब ना कोई बड़ा है ना छोटा है। वहां बड़े को छोटे और छोटे को बड़ा होने में समय नहीं लगता। कोई भी भद्र पुरुष ऊंचे से ऊंचे पद पर आ सकता है तथा जरूरत पड़ने पर किसी को भी नीचे गिरा सकता है। रुपए कैसे के बल पर आपकी दी हुई बुद्धि से ज्यादा है।’
सचमुच लेखक ने यहां पर बहुत बड़ी बात को बहुत छोटे शब्दों में कह दिया है। इस समय पृथ्वी लोक की स्थिति सचमुच ऐसी ही है। इसी प्रकार प्रत्येक लेख में या प्रत्येक अध्याय में लेखक ने छोटी-छोटी बातों के आधार पर सहज और सरल भाषा में बड़ी बातों को कहने का प्रयास किया है।
लेखक ने बड़ी विद्वत्तापूर्ण परंतु सरल भाषा में अनेक सामाजिक विसंगतियों पर भी करारा व्यंग्य किया है। जिनसे उनके भीतर के छुपे हुए उस समाज सुधारक के दर्शन होते हैं जो समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर व्यवस्था बनाए रखने का समर्थक है।
पुस्तक में कुल 28 छोटे-छोटे अध्याय हैं। पुस्तक की कुल पृष्ठ संख्या 114 है और इसका मूल्य ₹250 है। पुस्तक प्राप्ति के लिए साहित्यागार, धामाणी मार्केट की गली, चौड़ा रास्ता, जयपुर 302008 फोन 0141- 2310785 ,4022382 पर संपर्क किया जा सकता है। यह पुस्तक अमेजन पर भी उपलब्ध है।
डॉ राकेश कुमार आर्य

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