मन भक्ति में लीन, ज्ञान- कर्म और उपासना तैरे पँख है तीन”

भक्ति चढ़ै परवान तो ,
वाणी हो खामोश ।
आँखियों से आंसू बह,
मनुआ हो निर्दोष ॥1705 ॥

रसों का रस वह ईश है,
भज उसको दिन – रात ।
एक दिन ऐसे जायेगा,
ज्यों तारा प्रभात् ॥ 1706॥

नाम जन्म स्थान को,
जाने प्राणाधार ।
संसृति से मुक्ति का ,
बिरला करे विचार॥1707॥

जीवन में संजीवनी,
एक तेरा संकेत।
मिट्टी को सोना करे,
बशक कालर खेत॥1708॥

धर्म के संदर्भ में :

चित्त धर्म धारण करे,
कायापलट हो जाय ।
वृति कृति और मति ,
पावन होती जाय॥1709॥

आत्मस्वभाव में जी सदा,
यही धर्म का रूप।
दिव्य – गुणों का संगठन ,
धारक हो अनुरूप॥1710॥

धर्मव्रतधारी बहुत ,
धर्मशील कोई एक।
वाणी – विलास साधन नहीं ,
आत्मसात कर देख॥1711॥

धर्म मिलावै साध्य से ,
साधक हो तदरुप।
पान करावे ब्रह्म – रस ,
जहाँ तुरिया का कूप॥1712॥

धर्म की जो रक्षा करे ,
स्वयं भी रक्षित होय।
कृपा – कवच रक्षा करे ,
चाहे जग बैरी होय॥1713॥

धर्म से मुखड़ा मोड मत ,
देख रहा करतार ।
धर्म के जीते जीत है ,
धर्म के हारे हार॥1714॥

प्रकृति के तीन गुण : रज , तम , सत् मानवीय सोच को कितना प्रभावित करते हैं :-

रज में प्रदर्शन करे,
तम में लालच आय ।
ज्यों ही सत् प्रधान हो,
चित्त शान्त हो जाय ॥1715॥

भक्ति में चलता नहीं,
मानव का अहंकार ।
मैं – मेरा रहता नहीं,
अस्मि हो तदाकार॥1716॥

धर्म प्रभु का स्वरूप है,
इसे कभी मत छोड़।
जो इसका पालन करे ,
मिले स्वर्ग में ठौड़॥1717॥

धनवान और विद्वान तो,
जग में मिले अनेक ।
दुनियां में दर्लभ मिलें,
धर्मवान और नेक॥1718॥

जिसको धारण चित्त करे,
करे लोक – कल्याण।
सिद्धि हो परलोक की ,
उसे धर्म तू जान॥1719॥

धर्म तो सबका एक है ,
नेकी कर हर रोज।
तन से सेवा मन से भक्ति,
‘ मैं ‘ की करले खोज॥1720॥
क्रमशः

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