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चारधाम यात्रा; सुरक्षित है- कौन लेगा- इसकी जिम्मेदारी?

चार धाम यात्रा को सुगम बनाने के हवा-हवाई दावे

चन्‍द्रशेखर जोशी की विशेष रिपोर्ट

उत्तराखंड में चारधाम यात्रा; सुरक्षित है- कौन लेगा- इसकी जिम्मेदारी? जिम्‍मेदार लोग क्‍या यह गारंटी दे सकते हैं कि कोई भी दुर्घटना न होने के उनके इंतजामात पूर्णतया कर लिये गये हैं # दुर्घटना की सूचना मिलने पर आनन-फानन में राहत उपाय किये जायेगें # सडकों को चाकचौबंद कर  दुर्घटना मुक्‍त क्षेत्र बना दिये गये हैं- ऐसा नही हो पाया है #  क्‍या नकारा तंत्र और भ्रष्टो अधिकारी, जो बजट की विशाल धनराशि कोRouteमार्च में डकार जाते हैं #जर्जर हाईवे और लटकी हुई योजनाओं से चार धाम यात्रा और ज्यादा मुश्किल भरी#राष्ट्रपति के आने की आड में यात्रा धामों में लापरवाही की अनुमति नही दी जा सकती# बदरीनाथ हाईवे पर डेंजर जोन #स्लाइड़िग जोन सिरोबगड़ #सड़कों की हालात अब भी खराब# हाइवे का हिस्सा लगातार दरक रहा है# पूरी घाटी में बहे पुल व छोटी पुलियाओं की कोई व्यवस्था अभी तक नहीं#कंपनियां नदी और नालों में मलबा डाल रही हैं# इससे एक और आपदा का खतरा# चारधाम यात्रा का पहला धाम यमुनोत्री हर वक्त खतरे के साये में #मंदिर परिसर की ओर बढ़ता यमुना का प्रवाह धाम में तबाही ला सकता है# गंगोत्री हाइवे में दरकता सुक्की टॉप गंगोत्री तक के सफर में खलल डाल सकता है# सुक्की टॉप के दरकते सातों मोड़ हाइवे के लिए मुसीबत#सात किमी लंबे हिस्से में जगह-जगह जलस्रोत फूट गए# बदरीनाथ धाम में भी संकट मंडराया था #

अशुभ घडी में कपाट खुलते ही जलजला आ गया- राजनीति में फेरबदल हुआ- हरीश रावत सीएम बन गये परन्‍तु स्‍थिति में परिवर्तन नही आ पाया- आज भी चार धाम यात्रा में राज्‍य सरकार अरबों रूपये खर्च करने का राग ही अलापती रही है, यह बात अलग है- कि धरातल पर खर्च में गंभीरता नही दिखायी जाती

गंगोत्री धाम का कपाट 21 अप्रैल को साढ़े बारह बजे दोपहर कर्क लग्न में यमुनोत्री धाम के कपाट 21 अप्रैल को सुबह 11 बजकर 30 मिनट पर, केदारनाथ के 24 को सुबह 8.30 बजे व बदरीनाथ के 26 अप्रैल को प्रात: 5.15 बजे खोल दिए जाएंगे। वही सूबे के मुख्यमंत्री हरीश रावत के आमंत्रण पर देश के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का केदारनाथ का कार्यक्रम तय हुआ है। 24 अप्रैल को केदारनाथ धाम के कपाट खुलने के अवसर पर राष्ट्रपति के केदारनाथ धाम आने से राज्‍य की उम्‍मीदें बहुत बढ गयी है। राष्ट्रपति के केदारनाथ में आने का संदेश देश विदेश में सुरक्षित यात्रा धाम यात्रा का संदेश प्रसारित होगा। परन्‍तु राष्ट्रपति के आने की आड में यात्रा धामों में लापरवाही की अनुमति नही दी जा सकती, लंबे समय से चार धाम यात्रा को सुगम बनाने के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन धरातल पर यह दावे हवाहवाई साबित हो रहे हैं। हालत यह कि जर्जर हाईवे और लटकी हुई योजनाओं से चार धाम यात्रा और ज्यादा मुश्किल भरी हो गई है। वर्ष 2013 की प्रचंड जलप्रलय के बाद उत्तराखंड के प्रति जिस तरह पूरी दुनिया में असुरक्षा का वातावरण बना, उस नकारात्मक माहौल को बदलने की मुहिम में राष्ट्रपति का यह उत्तराखंड दौरा करवाया जा रहा है। राज्य सरकार इसके लिए देश विदेश के मीडिया तंत्र का सहारा लेकर सब कुछ सुरक्षित होने का प्रचार करेगी परन्‍तु असलियत को छिपाने की कोशिश तथा धार्मिक परम्‍पराओं की आड में श्रद्वालुओं को आमंत्रित कर मानव जीवन के साथ खिलवाड करनाROAD कही से भी उचित नही माना जा सकता है।

ज्ञात हो कि चार धाम यात्रा की दृष्टि से महत्वपूर्ण बदरीनाथ हाईवे पर स्थित स्लाइड़िग जोन सिरोबगड़ मुसीबत खड़ा करेगा। इसके रोकथाम की कोई व्‍यवस्‍था नही की गयी है। चारधाम यात्रा का पहला धाम यमुनोत्री हर वक्त खतरे के साये में है। यमुनोत्री धाम केप्रति सरकार हमेशा से उपेक्षित रवैया अपनाती रही है। खतरों को लेकर बार-बार आगाह करने पर भी कार्रवाई न होने से धाम के अस्तित्व पर संकट गहरा गया है। गंगोत्री की यात्रा पड़ावों पर व्यवस्थाएं नदारद हैं। 21 अप्रैल को गंगोत्री धाम के कपाट खुलने तक गोमुख ट्रैक भारी बर्फबारी से खुलने के आसार नहीं बन रहे हैं। विशाल हिमखंडों को खोलने में इस बार काफी समय लग सकता है। हाइवे का हिस्सा लगातार दरक रहा है।

आगामी 24 अप्रैल को केदारनाथ के कपाट खुलने के अवसर पर मंदिर के पीछे बने हेलीपैड पर राष्ट्रपति का हेलीकॉप्टर उतरेगा। मंदिर में कार्यक्रम स्थल पर कनात, बैरिकेटिंग मंच निर्माण कर सारी कमियों पर परदा डाल दिया जायेगा। सरस्वती वैलीब्रिज से मंदिर तक साफ सफाई की व्यवस्था मंदिर समिति करेगी। निम एवं अन्य निर्माण एजेंसियां केदारनाथ में चल रहे पुनर्निर्माण कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराने को तत्‍पर रहेगें, और उसकी बुकलेट तैयार कराकर भ्रमण के दौरान राष्ट्रपति को उपलब्ध कराई जायेगी। केदारनाथ में विद्युत, पेयजल समेत अन्य व्यवस्थाओं को चाक चौबन्‍द कर दिया जायेगा। तहसीलदार ऊखीमठ वीआइपी पालकी तैयार कराकर तैयार रहेगें। विश्व प्रसिद्ध धाम केदारनाथ यात्रा पर आने-जाने वाले भक्तों के रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था होगी। कई यात्री पैदल मार्ग और आधा रास्ते से ही लौट जाते हैं। ऐसे में दर्शन करने वाले यात्रियों का भी रजिस्ट्रेशन होगा। चार धाम यात्रा के लिए ऋषिकेश में भी रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था है, लेकिन केदारनाथ यात्रा के लिए अलग से भक्तों को रजिस्ट्रेशन कराना होगा। प्रशासन ने यात्रा के शुरूआत में केवल पंद्रह सौ भक्तों को ही केदारनाथ जाने की अनुमति देगा। केदारनाथ व पैदल मार्ग पर व्यापार करने वाले व्यापारियों, तीर्थपुरोहितों, पत्रकारों का पूरे छह माह के लिए एक बार ही बायोमैट्रिक रजिस्ट्रेशन किया जाएगा । सरकारी कर्मचारियों को रजिस्ट्रेशन नहीं होगा।

उत्‍तराखण्‍ड में लंबे समय से चार धाम यात्रा को सुगम बनाने के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन धरातल पर यह दावे हवाहवाई साबित हो रहे हैं। हालत यह कि जर्जर हाईवे और लटकी हुई योजनाओं से चार धाम यात्रा और ज्यादा मुश्किल भरी हो गई है। केदारनाथ धाम के पुनर्निर्माण व चारधाम यात्रा से पूर्व व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए सरकार ने जिला प्रशासन को राज्य आकस्मिक निधि से दस करोड़ स्वीकृत किए हैं परन्‍तु अभी तक यही दावे हो रहे हैं कि गौरीकुंड से सोनप्रयाग आपदा से क्षतिग्रस्त मोटर मार्ग को ठीक किया जा रहा है, इसके साथ ही पैदल मार्ग पर भी डेंजर जोन को यात्रा से पूर्व ठीक कर दिया जाएगा । यानि यात्रा शुरू होने वाली है और अभी तक सब कागजों में ही है।

2013 में आई आपदा के दौरान स्थानीय, देश व विदेशी लोगों ने सरकार साथ खड़े होकर आपदा पीड़ितों व प्रभावित क्षेत्रों के लिए खुलकर आर्थिक सहायता दी। लेकिन आपदा प्रभावित आज भी सहायता का इंतजार कर रहे हैं। स्थानीय छोटे ठेकेदारों का लंबे समय से भुगतान नहीं हुआ है। बावजूद इसके इन ठेकेदारों को काम देने की बजाय निजी कंपनियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। आपदा के दो वर्ष पूरे होने को है लेकिन सड़कों की हालात अब भी खराब है। पूरी घाटी में बहे पुल व छोटी पुलियाओं की कोई व्यवस्था अभी तक नहीं की गई है। केदारघाटी में बन रही जल विद्युत परियोजनाओं की निर्माण कंपनियों को प्रोत्साहित को किया जा रहा है लेकिन ये कंपनियां नदी और नालों में मलबा डाल रही हैं। इससे एक और आपदा का खतरा पैदा हो रहा है। आपदा के चलते यहां का पूरा पर्यटन उद्योग ध्वस्त हो गया है लेकिन बैंक की ओर से ऋण वसूली की जा रही है। आपदा के समय प्रदेश के मुख्यमंत्री व उनके मंत्रियों ने आपदाग्रस्त क्षेत्र के व्यापारियों को ऋण माफी व मुआवजा दिए जाने की घोषणा की थी लेकिन, सरकार की ओर से की गई गई घोषणाएं धरातल पर नहीं उतर पाई हैं। केदारघाटी की तर्ज पर पूरे प्रदेश को आपदाग्रस्त घोषित कर वास्तविक आपदा प्रभावितों के साथ घोर अन्याय किया गया।

उत्तराखंड में चारधाम यात्रा जल्द प्रारंभ होने जा रही है। जून 2013 में प्राकृतिक आपदा से हुई भीषण तबाही के बाद प्रदेश का पर्यटन व तीर्थाटन व्यवसाय जिस कदर लकवाग्रस्त हुआ है, उसे पुनर्जीवित करने के लिहाज से चारधाम यात्रा से काफी उम्‍मीद की जा रही है। 24 अप्रैल को केदारनाथ धाम के कपाट खुलने के अवसर पर राष्ट्रपति के केदारनाथ धाम आने से उम्‍मीदें बहुत बढ गयी है। राष्ट्रपति के केदारनाथ में आने का संदेश देश विदेश में सुरक्षित यात्रा धाम यात्रा का संदेश प्रसारित होगा।

चार धाम यात्रा की दृष्टि से महत्वपूर्ण बदरीनाथ हाईवे पर स्थित स्लाइड़िग जोन सिरोबगड़ मुसीबत खड़ा करेगा। सरकार कई बार इस जोन के विकल्प की बात कह चुकी है, लेकिन कोई कार्रवाई शुरू नहीं हो सकी यह मार्ग रुद्रप्रयाग व चमोली जनपवासियों के लिए लाइफ लाइन कहा जाता है। मार्ग बंद होने से दूध, सब्जी समेत जरूरी सामान की किल्लत पूरे क्षेत्र में पैदा हो जाती हे। चीन सीमा को जोड़ने वाले इस मार्ग पर बनी समस्या को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। लंबे समय से बनी इस समस्या को ठीक नहीं किया गया है। इस बार की शुरू होने वाली यात्रा सीजन के दौरान यहां आने वाले तीर्थ यात्रियों को परेशानियां उठानी पड़ सकती है।

– चारधाम यात्रा का पहला धाम यमुनोत्री हर वक्त खतरे के साये में है। दरकती कालिंदी पहाड़ी और मंदिर परिसर की ओर बढ़ता यमुना का प्रवाह धाम में तबाही ला सकता है। पुरुषोत्तम उनियाल सचिव, यमुनोत्री मंदिर समिति का कहना है कि चारधाम यात्रा के पहले तीर्थ यमुनोत्री धाम केप्रति सरकार हमेशा से उपेक्षित रवैया अपनाती रही है। खतरों को लेकर बार-बार आगाह करने पर भी कार्रवाई न होने से धाम के अस्तित्व पर संकट गहरा गया है। वही यमुनोत्री धाम लंबे समय से कुदरत के कहर से जूझ रहा है। 2004 में कालिंदी पर्वत दरकने से धाम में छह लोगों की मौत हुई थी और मंदिर परिसर को भारी नुकसान हुआ। 2007 में यमुना के मुहाने पर झील बनने और 2010 में नदी के कटाव से भी धाम को नुकसान हुआ। इस बीच मंदिर की सुरक्षा पर लाखों रुपये खर्च किए गए। लेकिन सुरक्षा कार्यो में घटिया निर्माण सामग्री का इस्तेमाल किया गया।

जून 2013 में फिर से कालिंदी पर्वत से पत्थर गिरने से मंदिर को नुकसान पहुंचा और परिसर यमुना नदी के कटाव की जद में आ गया। इस दौरान भूवैज्ञानिकों ने धाम का सर्वेक्षण कर मंदिर की सुरक्षा को लेकर प्रशासन को रिपोर्ट सौंपी। वैज्ञानिकों ने मंदिर को यमुना के कटाव से बचाव के लिए नदी से मलबा हटाने, पूर्वी तट पर सीसी ब्लॉक का निर्माण करने और कालिंदी पर्वत से भूस्खलन रोकने को रॉक बोल्डिंग के साथ ही मजबूत वायरक्रेट लगाने केसुझाव दिए थे। जिला प्रशासन ने 2014 भूवैज्ञानिकों की रिपोर्ट के आधार पर यमुनोत्री धाम की सुरक्षा के लिए प्रस्ताव भी भेजा। लेकिन अभी तक शासन स्तर पर कोई निर्णय नहीं लिया जा सका है। तीर्थ पुरोहित और स्थानीय लोग शासन-प्रशासन से यमुनोत्री धाम की सुरक्षा को ठोस कदम उठाने की मांग कर चुके हैं। हालत यह है कि नदी से हो रहा कटाव और कालिंदी पर्वत से गिरते बोल्डर यमुनोत्री धाम में कभी भी कहर ढा सकते हैं।

–इसके अलावा गंगोत्री की यात्रा शुरू होने के लिए एक माह से भी कम समय है, लेकिन अब तक यात्रा पड़ावों पर व्यवस्थाएं नदारद हैं। ऐसे में यात्रा काल में श्रद्धालुओं को सुविधाओं के लिए जूझना पड़ेगा।

अगले महीने 21 अप्रैल को गंगोत्री धाम की यात्रा शुरू हो जाएगी। इसके साथ ही देश विदेश से पहुंचने वाले तीर्थयात्रियों का भी सैलाब गंगोत्री की ओर रुख करेगा। लेकिन यात्रा पड़ावों पर पेयजल, शौचालय समेत पार्किंग गायब हैं। इतने कम समय में यहां व्यवस्था जुटाना बेहद मुश्किल होगा। पिछले दो साल में आपदा की मार से सीजन फीका रहा। पर इस बार यात्रा सीजन से पर्यटन व्यवसायियों को काफी उम्मीद है।

गंगोत्री धाम से 18 किलोमीटर का ट्रैक कर गोमुख तक पहुंचा जाता है। यह क्षेत्र गंगोत्री नेशनल पार्क के कोर जोन में है। लिहाजा पार्क प्रशासन पर इस ट्रैक रूट पर यात्रा को संचालित करने और ट्रैक को दुरुस्त रखने की जिम्मेदारी है। हर साल बड़ी संख्या में यात्री, पर्यटक और पर्वतारोही दल गोमुख पहुंचते हैं। इस बार इस ट्रैक की हालत पर नजर डालें तो मार्च माह के पहले पखवाड़े तक हुई भारी बर्फबारी ने इसे पूरी तरह बंद किया हुआ है। देरी तक हुई बर्फबारी के कारण गंगोत्री से तीन किलोमीटर दूर ट्रैक के प्रवेश द्वार कनखू बैरियर से भी आगे बढ़ना बेहद मुश्किल है। माना जा रहा है कि ट्रैक पर देवगाड, ऋषिनाला, भुजगढ़ी व कच्ची ढांग में आने वाले विशाल हिमखंडों को खोलने में इस बार काफी समय लग सकता है। इन जगहों पर हर साल भारी हिमखंड पसरे होने से कई बार इनके ऊपर से ही रास्ता तैयार किया जाता है। वहीं कई जगहों पर हिमस्खलन के कारण ट्रैक रूट के बुरी तरह ध्वस्त होने का भी अंदेशा है। ऐसे में 21 अप्रैल को गंगोत्री धाम के कपाट खुलने तक गोमुख ट्रैक के भी खुलने के आसार नहीं बन रहे हैं।

गंगोत्री हाइवे में दरकता सुक्की टॉप गंगोत्री तक के सफर में खलल डाल सकता है। सुक्की टॉप के दरकते सातों मोड़ हाइवे के लिए मुसीबत बने हुए हैं। यहां फूटे पानी के स्रोतों से हाइवे का यह हिस्सा लगातार दरक रहा है। इसके चलते गंगोत्री धाम यात्रा में व्यवधान पैदा हो सकता है। सुक्की का सात किमी लंबा हिस्सा बीआरओ के लिए अभी भी चिंता का सबब बना हुआ है। डबराणी से लेकर सुक्की गांव तक हाइवे में सात मोड़ है। इन सातों मोड़ों पर 2012 से धंसाव जारी है। बीते साल यहां हाइवे तकरीबन महीने भर तक बंद रहा था। दरकते इस हिस्से को लगातार बीआरओ आवाजाही लायक बनाता रहा है, लेकिन अब यह हाइवे का सबसे खराब हिस्सा बन गया है।

सात किमी लंबे हिस्से में जगह-जगह जलस्रोत फूट गए है। जिसके चलते इसके दरकने में तेजी आ गई है। हाइवे के इस हिस्से को दरकने से बचाने के लिए बीआरओ भी एड़ी चोटी का जोर लगा चुकी है लेकिन दरकते सुक्की टॉप को बचाना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। ऐसे में यहां यात्रा शुरू होने के बाद हल्की बरसात में भी आवाजाही थमने की पूरी आशंका है। अभी भी इस हिस्से पर भारी वाहनों की आवाजाही भी बेहद मुश्किल से हो पाती है। यात्रा सीजन के दौरान लगातार भारी वाहनों की आवाजाही को झेलना इस हिस्से के लिए बेहद मुश्किल होगा।

लंबे समय से चार धाम यात्रा को सुगम बनाने के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन धरातल पर यह दावे हवाहवाई साबित हो रहे हैं। हालत यह कि जर्जर हाईवे और लटकी हुई योजनाओं से चार धाम यात्रा और ज्यादा मुश्किल भरी हो गई है।

उत्तरकाशी जनपद में गंगोत्री और यमुनोत्री दो धाम हैं। इन दोनों धामों को जाने वाले यात्री कई परेशानियों से जूझते हैं। टिहरी झील बनने के बाद गंगोत्री हाईवे की ऋषिकेश से तीस किलोमीटर की दूरी बढ़ने के साथ ही दोनों धामों की दूरी भी बढ़ गई। चारधाम यात्रा के पहले धाम यमुनोत्री तक पहुंचने के लिए अब भी पांच किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। यहां खरसाली यमुनोत्री रोपवे योजना बीते पांच सालों से लटकी हुई है। अब तक इस योजना का काम धरातल पर शुरू नहीं हो सका है। वहीं यमुनोत्री हाईवे पर खरादी से जानकीचट्टी के बीच बाडिया, स्यानाचट्टी व जानकीचट्टी से पहले सड़क की खराब हालत यात्रियों को अक्सर परेशान करती है। बरसात के दौरान तो हाईवे के इस हिस्से में बड़े वाहनों की आवाजाही कई दिनों तक बंद हो जाती है। यही स्थिति गंगोत्री हाईवे की भी है। हाईवे पर सुक्की बैंड से झाला तक सीधे सड़क निर्माण योजना अधर में लटकी हुई है। इस सड़क के बनने से गंगोत्री धाम की दूरी बारह किलोमीटर कम होने के साथ ही यात्रियों को सुक्की टॉप तक पहुंचने के दौरान चार स्लिप जोन का भी सामना नहीं करना पड़ता। गंगोत्री धाम से केदारनाथ के लिए अब भी लोगों को रुद्रप्रयाग तक पहुंचने के लिए तीन सौ किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है, जबकि निर्माणाधीन कमद अयांरखाल मोटर मार्ग से यह दूरी लगभग आधी हो जाएगी। लेकिन वन स्वीकृति मिलने के बावजूद बीते चार सालों में इस सड़क का दस किलोमीटर हिस्सा बनकर तैयार नहीं हो सका है। इस स्थिति से नहीं लगता कि आगामी सीजन में भी चारधाम यात्रा में यात्रियों की परेशानी कम होंगी।

वर्ष 2013 की प्रचंड जलप्रलय के बाद उत्तराखंड के प्रति जिस तरह पूरी दुनिया में असुरक्षा का वातावरण बना, उस नकारात्मक माहौल को बदलने की मुहिम में राष्ट्रपति का यह उत्तराखंड दौरा करवाया जा रहा है। राज्य सरकार इसके लिए देश विदेश के मीडिया तंत्र का सहारा लेकर सब कुछ सुरक्षित होने का प्रचार करेगी परन्‍तु असलियत को छिपाने की कोशिश तथा धार्मिक परम्‍पराओं की आड में श्रद्वालुओं को आमंत्रित कर मानव जीवन के साथ खिलवाड करना कही से भी उचित नही माना जा सकता है। राज्‍य सरकार को केदारनाथ धाम में सभी व्यवस्थाएं चाक-चौबंद करनी चाहिए थी, बल्कि चारधाम यात्रा मार्गो को भी दुरुस्त करके पूरी तरह सुगम व सुरक्षित बनाने की ओर गंभीर होना चाहिए था। आपदा में बुरी तरह तबाह केदारनाथ के पुनर्निर्माण में नेहरू पर्वतारोहण संस्थान ने जरूर सराहनीय कार्य किया, परन्‍तु यात्रा मार्गो को ठीक करने में राज्य की सरकारी एजेंसियों असफल साबित हुई है। चारधाम यात्रा उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था में भी विशेष स्‍थान रखता है। वही यात्रा मार्गो से सटे इलाकों में तीर्थाटन व्यवसाय हजारों परिवारों के लिए आजीविका का एक प्रमुख जरिया भी है। जून 2013 की आपदा के बाद पर्यटन व तीर्थाटन ठप होने से यात्रा मार्गो पर रह रहे परिवारों के समक्ष गंभीर संकट गहरा गया है। आपदा राहत के तौर पर मिली आर्थिक मदद इनके लिए नाकाफी सिद्व हुई है। सुरक्षित यात्रा मार्गो के अभाव में शीतकालीन चारधाम यात्रा भी छलावा सिद्व हुई।

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