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भाजपा की लुढ़कन कैसे रुके

बेंगलुरू में चल रही भाजपा की कार्यकारिणी की बैठक में क्या होगा? लगभग 300 सदस्यों की इस समिति का नाम कार्यकारिणी है। क्या-क्या कार्य करती है, यह? कुछ नहीं। कार्य करते हैं पार्टी के पदाधिकारी लोग और सत्तारूढ़ दल के मंत्री लोग। वास्तव में कार्यकारिणी तो होती है,विचारकारिणी। किसी भी पार्टी या सरकार में विचार या विचारधारा का कितना महत्व होता है,इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि कार्यकारिणी की बैठक साल-साल भर में होती है और सिर्फ दो दिन में 300 लोगों के विचार जानने की कोशिश की जाती है। वास्तव में कार्यकारिणी में कुछ नेताओं के लंबे-लंबे भाषण होते हैं और कुछ प्रस्ताव पारित होते हैं।
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प्रतिनिधिगण का मुख्य काम तालियां बजाना और प्रस्तावों पर सहमति के लिए हाथ उठाना होता है। कभी-कभी कोई प्रतिनिधि संशोधन भी सुझा देता है। ऐसा बहुत कम होता है कि कोई प्रस्ताव रखा जाए और उस पर डटकर बहस हो।

यही होना है बेंगलुरू अधिवेशन में भी! फिर भी अखबारों और टीवी चैनलों के लिए बड़ा मुद्दा यह है कि लालकृष्ण आडवाणी इस अधिवेशन में बोलेंगे या नहीं? जून, 2013 के अधिवेशन में वे गए ही नहीं, क्योंकि नरेंद्र मोदी को चुनाव अभियान का नेता घोषित कर दिया गया था। अब वे बोलेंगे या नहीं, इसका भी क्या महत्व है? यदि वे बोलेंगे तो भी क्या बोलेंगे? मार्गदर्शक मंडल के वे वरिष्ठतम सदस्य हैं, लेकिन पिछले 11 माह से मार्गदर्शक मंडल की बैठक ही नहीं हुई। वे मौन हैं। चाटुकारिता उनके स्वभाव में नहीं है और यदि वे सच बोल देंगे तो भूचाल आ जाएगा। यदि वे मोदी सरकार की गाड़ी को पटरी पर लाने के लिए कुछ सुझाव भर देंगे तो उन्हें भी कटु आलोचना की संज्ञा दी जाएगी। यह बात मार्गदर्शक मंडल के दूसरे वरिष्ठ सदस्य मुरली मनोहर जोशी पर भी लागू होती है। ये दोनों वरिष्ठ राजनेता जीवन भर आरएसएस के स्वयंसेवक रहे हैं।

‘अनुशासन’ उनकी रगों में दौड़ता-फिरता है। वे उसे भंग कैसे करेंगे? इतना ही नहीं, दोनों अपना मुंह तो खोल दें, लेकिन वे राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति बनने का अधखुला दरवाजा बंद क्यों करें?

बेंगलुरू अधिवेशन का दूसरा सबसे बड़ा मुद्दा है- भूमि अधिग्रहण कानून। जहां तक इस विधेयक का सवाल है, इसमें मोदी सरकार ने काफी संशोधन कर लिए हैं तथा उसकी पूंजीपति प्रेमी छवि भी घट गई है, लेकिन एक बात बिलकुल भी समझ में नहीं आती। वह है, किसानों से उनकी जमीन छीनते वक्त आप उनसे सहमति क्यों नहीं लेना चाहते? कांग्रेस सरकार के विधेयक में जितनी सहमति लेने का प्रावधान था, उससे भी ज्यादा का प्रावधान आपके विधेयक में क्यों नहीं है? जमीन तो किसानों को अपने प्राणों से भी ज्यादा प्यारी होती है। आप उन्हें बाजार भाव से चार गुना मुआवजा देंगे, लेकिन उनकी सहमति के बिना जमीन पर कब्जा करने पर आमादा क्यों हैं? क्या यह वही सामंती रवैया नहीं है कि चलते रास्ते आप किसी की भी बहन या बेटी का अपहरण कर लें और फिर कहें कि हमने तो उसे राजमहल की महारानी बना दिया है। यह ठीक है कि आप उद्योग-कारखाने लगाएंगे, गरीब किसानों को रोजगार देंगे, सड़कें और रेलें निकालेंगे, गांवों को सुविधाएं देंगे, उनका विकास करेंगे और इन सब कामों के लिए जमीन तो चाहिए ही, लेकिन यदि उसे लेने के लिए आप जबर्दस्ती करेंगे तो देश के करोड़ों किसान आपके विरुद्ध हो जाएंगे। एक काल्पनिक खतरा ही आपकी सरकार को लील जाएगा। जो पूंजीपति अभी तालियां बजा रहे हैं, वे आपके किसी काम नहीं आएंगे। यह विधेयक सारे विपक्ष को एक कर देगा। देश में एक नया आंदोलन उठ खड़ा होगा।

उक्त दो मुद्दे तो अखबार उछाल ही रहे हैं, लेकिन जो सबसे पते की बात है, वह खबरों की पंक्तियों में कहीं-कहीं छुपी-सी दिखाई पड़ती है। वह है, मोदी सरकार की नीचे लुढ़कती हुई लोकप्रियता। इस लुढ़कन पर यदि भाजपा कार्यकारिणी ने गहन मंथन नहीं किया तो आप मानकर चल सकते हैं कि राजीव गांधी सरकार का जो हाल ढाई साल में हो गया था, वही हाल मोदी सरकार का दो साल में हो जाएगा। दो साल में इसलिए कि राजीव के मुकाबले मोदी अनुभवी नेता रहे हैं और उन्होंने स्पष्ट बहुमत प्राप्त करके जनता की आशा प्रचंड रूप से जगाई है। ऐसा नहीं कि मोदी सरकार कुछ कर ही नहीं रही है। उसके बजट की सर्वत्र प्रशंसा हुई है। बैंकों में आम आदमी के लिए जन-धन योजना भी उपयोगी मालूम पड़ती है। सरकारी कर्मचारी भी थोड़े-बहुत मुस्तैद हुए हैं। रोजमर्रा की चीजों के भाव भी आसमान नहीं छू रहे हैं। प्रधानमंत्री और विदेशमंत्री के धुआंधार विदेशी दौरे भी चल रहे हैं। अभी तक पार्टी या सरकार में भ्रष्टाचार का कोई मामला भी सामने नहीं आया है। कुछ अनर्गल बयानों को छोड़ दें तो सांप्रदायिक तनाव भी नहीं है, लेकिन कोई ऐसे काम नहीं हो रहे, जिनसे मालूम पड़े कि यह सरकार वाकई कुछ काम कर रही है। भाजपा की सदस्य संख्या 10 या 12 करोड़ हो जाएगी, आंकड़ों के हिसाब से यह विश्व स्तर की उपलब्धि होगी, लेकिन इसका महत्व क्या है? ये 10-12 करोड़ सदस्य क्या करेंगे? भाषणों पर तालियां बजाने और नोट व वोट की दलाली करने के अलावा कौन सा मिशन वे पूरा करेंगे? क्या वे गांवों में जाकर किसानों को बीज, खाद और पानी जुटाने में मदद करेंगे? क्या वे रिश्वत देने और लेने वालों को पकड़वाने का जिम्मा लेंगे? पार्टी अध्यक्ष ने गांधी, लोहिया और दीनदयाल का नाम लिया है। अब से लगभग 40 साल पहले दीनदयाल शोध संस्थान में एक भाषण के दौरान मैंने यह नारा दिया था। इसके मुताबिक क्या भाजपा जन-जागरण और जन-आंदोलन की पार्टी बन सकती है? क्या भाजपा अध्यक्ष में इतनी इच्छाशक्ति है कि वे इन तीनों महापुरुषों के सपनों की पार्टी खड़ी कर सकें? यदि वे इस दिशा में थोड़ा प्रयत्न भी कर सके तो भाजपा की लुढ़कन एकदम रुकेगी।

बेंगलुरू की कार्यकारिणी चाहे तो मोदी सरकार को अच्छा-खासा कार्यक्रम दे सकती है, जो अगले छह माह में ही उसकी लुढ़कन को रोक सकता है। इस देश में 365 दिन में से सरकारी कर्मचारियों को 202 दिन की छुट्‌टी मिलती है। लगभग 100 दिन की छुट्‌टी आसानी से काटी जा सकती है। सारे सांसदों, विधायकों और पार्षदों तथा सरकारी कर्मचारियों पर दो नियम सख्ती से लागू किए जाएं। एक तो उनके बच्चे सिर्फ सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में ही पढ़ें और दूसरा (अपवादों को छोड़कर) वे अपना इलाज सरकारी अस्पतालों में ही करवाएं। सारे देश के स्कूल-कॉलेजों में अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई पर प्रतिबंध लगाया जाए। न्यूनतम मजदूरी 500 रुपए रोज हो। काले धन की उत्पत्ति पर रोक लगे। दक्षिण एशियाई महासंघ की स्थापना हो। कार्यक्रम तो कई सुझाए जा सकते हैं, लेकिन इन्हें लागू करने के लिए सशक्त नेतृत्व होना चाहिए और नेता के पास इच्छाशक्ति और दृष्टि होनी चाहिए।

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