समित्पाणि शिष्य की तीन समिधाएं

जब विद्यार्थी विद्याग्रहण कर जीवन को उन्नत बनाने के दृष्टिकोण से गुरूकुल में प्रविष्ट होता था तो वह  समित्पाणि (हाथों में समिधायें लेकर) होकर ही गुरू के पास पहुंचता था। समित्पाणि होकर आने का विशेष महत्व होता था। इसका अभिप्राय था कि जैसे समिधाओं में अग्नि है, पर वह दिखता नही है, उसे एक विशेष क्रिया और प्रक्रिया के माध्यम से जलाया जाता है, या उत्पन्न किया जाता है, वैसे ही गुरू का शिष्य कहता है कि मेरे भीतर भी (अध्यात्म की) अग्नि है, ज्ञानाग्नि है, उसे जलाने के लिए भी एक विशेष क्रिया और प्रक्रिया की आवश्यकता है, और मैं उसी क्रिया और प्रक्रिया (अष्टांग योग) को जानने के लिए आपके पास आया हूं।

शिष्य के हाथों में तीन समिधायें होती हैं। उन तीनों का भी अर्थ है, और विशेष अर्थ है। हमारे शरीर विज्ञान को समझने के लिए वायु, पित्त और कफ को समझना आवश्यक होता है, जीवन और जगत की पहेली को समझने के लिए ईश्वर, जीव और प्रकृति (त्रैतवाद) को समझना आवश्यक है, जीवन की अवस्थाओं को समझने के लिए बालपन, यौवन और वृद्घावस्था (शरीर की तीन अवस्थाएं) को समझना आवश्यक है। संसार चक्र को समझने के लिए स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर को समझना आवश्यक है। आत्मा के लिए मिले इस शरीर रूपी पिंजड़े को समझने के लिए शरीर (स्थूल)  मन (सूक्ष्म) और आत्मा (कारण) को समझना आवश्यक है। लोकों को समझने के लिए पृथ्वी (स्थूल) आकाश (सूक्ष्म) और द्युलोक (कारण) को समझना आवश्यक है।

इस प्रकार तीन-तीन की यह आवृत्ति की सूची बड़ी विस्तृत और गंभीर ज्ञान प्रदायिनी हैं। शिष्य के हाथों की तीन समिधाएं इन्हीं तीनों की ओर संकेत करती हैं कि ज्ञान, कर्म और उपासना की त्रयीविद्या के माध्यम से संसार चक्र से मुझे गुरू ही मुक्ति दिला सकता है। इसलिए वह प्रतीक रूप में अपने हाथों में समिधाएं लेकर आता है। मानो ये समिधाएं स्थूल, सूक्ष्म और कारण के बंद कमरों  को खोलने की कुंजियां हैं। जिन्हें वह आकर अपने गुरू (अंधकार को मिटाने वाला) को सौंप देता है कि मुझे तो कुंजी प्रयोग का ध्यान नही और ज्ञान नही, इसलिए गुरूवर आप ही बतायें कि मैं इन समिधाओं के माध्यम से जीवन-जगत के गंभीर रहस्यों के तालों को कैसे खोलता जाऊं और कैसे अपने इहलोक और परलोक का कल्याण कर सकूं?

यज्ञ में आचार्य (ब्रह्मा) शिष्य से तीन समिधाएं चार मंत्रों से अग्नि में रखवाता है। पहली समिधा ‘अयन्त इध्म आत्मा’ इस मंत्र से रखी जाती है। दूसरी समिधा के लिए ‘समिधाग्निम्’ और ‘सुसमिद्वाय शोचिषे’ ये मंत्र बोले जाते हैं, जबकि तीसरी समिधा के लिए ‘तन्त्वा समिदभिरंगिरों’ मंत्र का उच्चारण किया जाता है। ऐसा महर्षि दयानंद जी महाराज का कहना है।

विद्वानों का और वैयाकरणिकों का मानना रहा है कि स्वाहा शब्द सु+आ+हा से बना है। जिसका अर्थ ‘सु’=उत्तम वस्तुओं का ‘आ’=पूर्णरूपेण ‘हा’=त्याग करना, ऐसा माना गया है। हम यज्ञ में यज्ञीय भावना (दूसरों के लिए त्याग करना और अंत में त्याग का भी त्याग कर देना, अर्थात जो दिया है, उसे भी भूल जाना) से प्रेरित होकर त्याग करते हैं।इसलिए मंत्राहुति के पश्चात ‘स्वाहा’ बोला जाता है।

हमारी वाणी मिठास भरी हो, ‘सु’=उत्तम हो, दूसरों को प्रसन्नतादायिनी हो। स्वाहा का एक अर्थ ‘सु’+आह अर्थात उत्तम कहना-बोलना भी है, तो एक अर्थ स्वं+प्रति+आह=अपने प्रति कहना ऐसा भी है। इसका अभिप्राय है कि अपने प्रति कहना, आत्म निरीक्षण करना, आत्मचिंतन करना। मैं कौन हूं, कहां से आया हूं? कहां मुझे जाना है? इत्यादि प्रश्नों को अपने भीतर उठाना और उनका उत्तर खोजने के लिए विचार करना। स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती लिखते हैं कि यज्ञ ब्रह्माण्ड की अनुकृति है। द्युलोक का अभिमानी देवता (जड़ देवता) सूर्य है। पृथिवी लोक का देवता अग्नि है। अंतरिक्ष लोक के  दो देवता है-विद्युत और वायु। दो देवताओं के कारण दूसरी समिधा के लिए दो मंत्र रखे गये हैं।

यज्ञ तीन आश्रमों में किया जाता है-ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ में। संन्यासी यज्ञ से मुक्त होता है, ब्रह्मचारी अकेला होता है, वानप्रस्थ भी अपवाद को छोडक़र प्राय: अकेला ही होता है। गृहस्थ में पति, पत्नी दो होते हैं, इस कारण से भी दूसरी समिधा के लिए दो मंत्र रखे गये हैं।

दो समिधाओं से एक आहुति देने का एक अन्य कारण भी है। अग्नि तीन प्रकार की हैं-इद्वं, समिद्घ और सुसमिद्घ। इद्व अग्नि वह है जो बहुत कम जल रही है, धुंधा भी निकल रहा है। ऐसी अग्नि में आहुति देने पर वह आहुति ‘इदमग्नये इदन्न इम्’ केवल पृथिवी लोक तक जाएगी। समिध अग्नि वह है जिसमें धुंआ नही है, इद्व की अपेक्षा कुछ अधिक जल रही है। ऐसी अग्नि में आहुति देने से वह आहुति ‘इदमग्नये जातवेदसे-इदन्नमम्’ अंतरिक्ष लोक तक जाएगी। सुसमिद्घ अग्नि वह है जिसमें काली कराली च मनोजवा च’ ज्वालाएं निकल रही हैं (अज्ञानी लोगों ने इसी अग्नि का अर्थ न समझकर काली कराली देवी की मूर्ति बना ली, जिससे वैदिक धर्म की वैज्ञानिकता भंग हो गयी)  लपटें उठ रही हैं, अत्यंत तीव्र और प्रचंड हैं। ऐसी अग्नि में आहुति देने का फल होगा कि वे आहुतियां ‘इदमग्नेय अंगिरेसि-इदन्नमम्’ द्युलोक तक जाएंगी।

द्युलोक तक अपनी बात को मंत्रों की हविषा (सवारी) बनाकर पहुंचाना ही यज्ञ का उद्देश्य होता है। इसलिए इन तीनों मंत्रों में तीव्र अग्नि रखने की ओर संकेत किया गया है। लपटें काली कराली उठें और हमारी बात सीधे द्युलोक तक जाएं। जहां दिव्यात्माएं निवास करती हैं। उन दिव्यात्माओं का आवाह्न करना या उनकी अपने साथ उपस्थिति मान लेने की भावना इसी समिधादान से ही निकलती हैं। जिसका लोगों ने गलत अर्थ लगा लिया है कि सारी दैव शक्तियां मेरे वश में हैं, या मैं जब चाहूं देवताओं से कुछ भी करा सकता हूं। सच ये है कि हमारी तीव्र अग्नि ‘हविषा’ बनकर देताओं को (दिव्य-द्युलोक में रहने वाली दिव्यात्माओं को) प्रसन्न करती है, जिसका लाभ हमें भी मिलता है और  दिव्यता का अनुभव हमें होने लगता है। आवश्यकता है अपनी याज्ञिक क्रियाओं के रहस्य को समझने की।

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