फांसी दे दो बेरोजगार बनाने वाली इस शिक्षा पद्घति को

unemployementकभी कहावत थी कि-‘पढ़े फारसी बेचे तेल।’ यह उस समय की बात है जब देश पर मुगलों का शासन था। उस समय फारसी पढ़े लिखे व्यक्ति को बेरोजगार नही रहना पड़ता था, पर यदि फारसी पढक़र भी कोई व्यक्ति बेरोजगार रह जाता था, अपने परंपरागत व्यवसाय (तेल बेचना आदि) में ही लगा रह जाता था तो उसके लिए यह मुहावरा प्रचलित हो गया था कि ‘पढ़े फारसी बेचे तेल।’ उस समय फारसी पढऩे पर किसी व्यक्ति का ‘हाकिम’ (उच्चाधिकारी) बनना निश्चित रहता था।

अंग्रेजी-काल में यह स्थिति बदल गयी और तब फारसी का स्थान इंग्लिश ने ले लिया। इसलिए अंग्रेजी के प्रति उन भारतीयों का आकर्षण बढ़ा जो हाकिम बनने की इच्छा रखते थे। अंग्रेजी पढ़े लिखे लोगों को स्वयं को ‘बाबू’ कहलाकर प्रसन्नता होती थी। यह ‘बाबू’ बबून शब्द से बना है, जो एक विशेष किस्म के बंदरों की प्रजाति है। तब अशिक्षित लोगों को भी सुरक्षा बलों या सैन्य बलों में नौकरियां मिल जाती थीं। इसका एक कारण यह भी था कि देश के लोग उस समय अंग्रेजों की नौकरी करने को अपराध मानते थे।

सेना में अंग्रेज भारतीयों को केवल कटवाने मरवाने के लिए ही भरती करते थे, इसलिए उनकी योग्यता केवल इतनी रखी गयी कि वह ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति निष्ठावान रहेगा और दूसरे उसकी शारीरिक स्थिति पूर्णत: ठीक है। ब्रिटिश काल में हमारे सैनिकों की स्थिति लगभग भेड़ बकरियों जैसी ही थी। पर ब्रिटिश काल में अच्छी नौकरी पाने केे लिए अंग्रेजी को एकअच्छा हथियार माना जाने लगा। उस समय अंग्रेजी बोलने वाले को अंग्रेज विशेष सम्मान देते थे, वह समझते थे कि अंग्रेजी बोलने वाला ब्रिटिश साम्राज्य का स्वाभाविक निष्ठावान व्यक्ति है। इससे हमारे भीतर धीरे-धीरे यह धारणा बनी कि अंग्रेजी पढऩे, लिखने व बोलने से विशेष सम्मान मिलता है। व्यक्ति का आत्मविश्वास का स्तर ऊंचा रहता है। यद्यपि इसके पीछे का कारण भी यही था कि अंग्रेजी बोलने वाले को अंग्रेज लोग विशेष प्रोत्साहन देते थे।

आजादी के पश्चात होना यह चाहिए था कि अंग्रेजी के प्रति देश में बनी झूठी अवधारणाओं (यथा यह सम्मान दिलाने वाली भाषा है, या इसके बोलने से व्यक्ति का आत्मविश्वास का स्तर बढ़ता है इत्यादि) को मिटाया जाना चाहिए था, पर हमने ऐसा नही किया। हमने सोचा कि अंग्रेजी को सारे देश में फैला दोगे तो सब व्यक्तियों को बड़ी नौकरियां मिल जाएंगी और सबके सब आत्मविश्वास से भर जाएंगे। इसलिए सबके शिक्षित करने पर बल दिया गया। शिक्षित किया जाना अच्छी बात है, पर उससे भी अच्छी बात है व्यक्ति को सुसंस्कारित किया जाए। जिसे इस शिक्षा प्रणाली ने कहीं पीछे छोड़ दिया। परिणामस्वरूप देश में ‘शिक्षित कुसंस्कारी’ बढऩे लगे।

अब शिक्षितों की भीड़ बढऩे लगी। यह भीड़ इतनी बढ़ी कि जिस नौकरी पर कभी कोई 5वीं या 8वीं पास व्यक्ति लग जाता था, वहां अब बी.ए., एम.ए. पास किये लडक़े जाने लगे। एक बार तो लोगों को अच्छा लगा। पर थोड़ी देर और रूककर देखा गया कि बी.ए., एम.ए. या बी.कॉम व बी.एस.सी. का जमाना लद चुका है और जमाना बी.टैक, बी.बी.ए. इत्यादि का आ गया है तो उधर को भेड़ चाल बढ़ गयी। बेरोजगारों की भीड़ ने बी.टैक व बी.बी.ए. इत्यादि की ओर टिड्डी दल की भांति हमला कर दिया तो अब बी.टैक या बी.बी.ए. इत्यादि किये छात्र भी केवल बेरोजगारों की भीड़ का एक हिस्सा बनते जा रहे हैं।

ऊंची डिग्रियां लिए हुए लडक़े चपरासी की नौकरी कर रहे हैं। पिछले दिनों कुछ नगरपालिकाओं में सफाईकर्मियों के लिए भी ऊंची डिग्री लिए लडक़ों ने आवेदन दिये और अपनी नियुक्ति करा गये। इस प्रकार अंग्रेजी ने उच्च शिक्षित लडक़ों को सफाईकर्मी बना दिया, जो इस शिक्षा प्रणाली की असफलता का मुंह बोलता प्रमाण है। इसने ‘जैसी जिसकी योग्यता वैसा उसको काम’ जैसे शिक्षा के अनिवार्य लक्ष्य को धूमिल कर दिया। अब सफाईकर्मी बने अंग्रेजीदां लोगों को उसी अंग्रेजी को बोलने में हीन भावना लगती है जिसके बारे में यह बात फैलायी गयी थी कि अंग्रेजी सम्मान दिलाती है और  इसके बोलने से आत्मविश्वास बढ़ता है। ऊंची डिग्री लेकर भी ऐसी छोटी नौकरी करने वालों को देखकर अब यह कहा जा रहा है कि ‘पढ़ें अंग्रेजी और बेचें तेल।’

इस स्थिति से स्पष्ट होता है कि अंग्रेजी भी हमारे लिए निष्फल सिद्घ हो चुकी है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली का दीवाला निकल चुका है। इसने सामाजिक विसंगतियों को बढ़ाया है, व्यक्ति का आत्मविश्वास छीना है और उसे कहीं का नही छोड़ा है। अंग्रेजी ने सबसे बड़ी मूर्खता यह की है कि इसने हमारे छात्रों को और युवावर्ग को अपने परंपरागत व्यवसाय और धंधे से घृणा करना सिखाया है, इसने परंपरागत व्यवसायों के बारे में युवा वर्ग में ऐसी भ्रांत धारणा पैदा की है कि ये छोटे कार्य हैं, और यदि तुम्हारे पूर्वज भी इन्हें करते आ रहे हैं तो वह भी छोटे ही थे। इसलिए इन कार्यों के प्रति और अपने परिवार के बड़े बुजुर्गों के प्रति श्रद्घाभाव युवा पीढ़ी में समाप्त हो चुका है।  परिणामस्वरूप युवा वर्ग पढ़ लिखकर न केवल अपने परंपरागत व्यवसाय से मुंह फेर रहा है, अपितु वह अपनी पिछली पीढ़ी से भी मुंह फेर रहा है। वह आगे की ओर (फलक) देख रहा है और अपने मूल (जड़) से घृणा कर रहा है, आज के समाज की सबसे बड़ी विडम्बना है यह। इसी लिए समाज में सर्वत्र हताशा का वातावरण है।

यह एक सर्वमान्य सत्य है कि संसार में जितने मनुष्य हैं, संसार के नियंता ने हमारे लिए अपनी प्रतिभा को विकसित करने के लिए उतने ही अनंत अवसर प्रदान किये हैं। ईश्वर ने जितने प्राणी बनाये हैं, उतनी ही अनंत संभावनाओं के साथ उनके पेट भरने के अवसर बनाये हैं। एक व्यक्ति अपने जीवन में अपने पेट पालन के लिए या अपने विकास के लिए किसी एक अवसर (व्यवसाय, वृत्ति, आजीविका चलाने का साधन)  का ही लाभ उठाता है, और बार-बार के अभ्यास से उसकी प्रतिभा अवसर के उसी एक केन्द्र पर बार-बार चोट करती है तो वही उसकी उन्नति के द्वार खोल देती है। एक व्यक्ति किसी ऐसे एक ही गुण का गुणी होता है-इसी को उसकी प्रतिभा कहते हैं। कोई भी व्यक्ति कभी भी बहुमुखी प्रतिभा का धनी नही हो सकता। संसार के लोगों के साथ उसका उठना-बैठना, रहना-सहना, सबके प्रति अपने कत्र्तव्य का निर्वाह करना और सबसे घुल मिलकर रहना इत्यादि प्रतिभाएं नही हैं, ये तो मानव के स्वाभाविक गुण हैं, और उसकी उत्कृष्ट जीवनशैली का एक अंग है। जबकि लोग ऐसी बातों को भी प्रतिभा मानने की भूल कर दिया करते हैं। संसार में जितने भर भी परंपरागत धंधे हैं (खेतीबाड़ी, बढ़ई, लुहार, स्वर्णकार, बुनकर इत्यादि) वे सबके सब व्यक्ति की प्रतिभा को निखारने वाले होते हैं, और वे इसलिए भी हैं कि संसार को उनकी आवश्यकता है। इसलिए उनमें भी शिक्षित और संस्कारित लोगों का जाकर लगना अनिवार्य है। सारी चीजों को यदि मशीनों से तैयार कराओगे तो ‘मशीनी’ होकर रह जाओगे। इस शिक्षा पद्घति ने सारे समाज को ‘मशीनी’ बनाकर रख दिया है।

प्राचीनकाल में हमारे यहां लोग बच्चों को विद्याध्ययन केवल इसलिए कराते थे कि वह सुसंस्कारित बने, मानव बने। विद्याध्यायन के पश्चात उसे परंपरागत काम दे दिया जाता था। उसे सिखाया जाता था कि अपने परंपरागत कार्य के प्रति निष्ठा और श्रद्घा उत्पन्न करो। इसलिए वह व्यक्ति समाज में आकर बेरोजगार नही होता था। वैसे यह भी संभव नही है किसरकार सभी पढ़े-लिखे लोगों को रोजगार दे दे, या तो वह सारे रोजगारों का सरकारीकरण करे (जैसा कि कम्युनिस्टों ने करके देख लिया है) या परंपरागत व्यवसायों को समाप्त कर दे। पर वास्तव में ये दोनों ही कार्य असंभव है।

हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि प्राथमिक पाठशालाओं में शिक्षा लेने वाले बच्चों की संख्या यदि देश में पांच करोड़ है तो बड़ी कक्षाओं में जाते-जाते या डिग्री लेकर बाहर आने वाले विद्यार्थियों की संख्या दस पांच लाख रह जाती है। उन दस पांच लाखों को भी वर्तमान शिक्षा प्रणाली रोजगार नही दे पा रही है, उल्टे उन्हें बेरोजगार बना रही है। यदि प्राथमिक पाठशालाओं मेंं बैठने वाले करोड़ों बच्चे ज्यों के त्यों आगे तक पढ़ते जाऐं तो सारा देश ही बेरोजगार हो जाएगा। वह तो अच्छा है कि ये अपने परंपरागत व्यवसायों में जाकर लग जाते हैं और पढ़ाई बीच में छोडक़र अपने आपको बेरोजगार होने से बचा लेते हैं। सचमुच आज देश की शिक्षा प्रणाली में आमूल चूल परिवर्तन करने की आवश्यकता है। पूरी की पूरी शिक्षा व्यवस्था को परिवर्तित कर युवा वर्ग को शिक्षित संस्कारित और विद्यावान बनाकर समाज के लिए और उसे स्वयं अपने लिए उपयोगी बनाना ही शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए। ऐसे गुण संस्कृत सीखे हुए छात्र के भीतर स्वाभाविक रूप से आते हैं। इसलिए शिक्षा का आधार संस्कृत हो। संस्कृत से ही संस्कृति का निर्माण होता है। संस्कृति से ही आत्मविश्वास का बीज हमारे भीतर अंकुरित होता है और वह स्थायी प्रभाव दिखाता है। अत: अंग्रेजी के विषय में भ्रांत धारणाएं टूटनी चाहिए। बेरोजगार बने युवा को जब चाकू-छुरा चलाते या कुछ और ऐसे ही गलत कार्य करते देखा जाता है तो इसके लिए दोषी ये युवा नही हैं, दोषी शिक्षा प्रणाली है और हमारा मानना है कि उसी को फांसी दे दो। समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन होगा।

Comment:

meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking güncel giriş
betnano güncel giriş
betnano güncel giriş
betnano giriş
meritking giriş
meritbet giriş
meritbet giriş
betpark giriş
betpark giriş
pokerklas
pokerklas
vdcasino
pokerklas
pokerklas
betnano giriş
betasus giriş
pokerklas
pokerklas giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
hititbet
hititbet
vdcasino giriş
pokerklas giriş
maritbet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
maritbet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betpas giriş
betpas giriş
favorisen giriş
favorisen giriş
norabahis giriş
norabahis
norabahis giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
betpark
betpark
betpark giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino
vdcasino
meybet
meybet
harbiwin giriş
betnano giriş
norabahis
favorisen giriş
favorisen giriş
favorisen giriş
meybet
norabahis giriş
norabahis giriş
favorisen giriş
favorisen giriş
hazbet giriş
hazbet giriş
maritbet giriş
maritbet
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
hititbet
hititbet
vdcasino
vdcasino
hititbet giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
hititbet giriş
hititbet
hititbet giriş
hititbet giriş
vdcasino
vdcasino
betnano giriş
betoffice giriş
betoffice giriş
hititbet
hititbet
betpark giriş
betpark
betpark
norabahis giriş
norabahis giriş
betpark giriş
hititbet giriş
kavbet giriş
kavbet
norabahis giriş
norabahis giriş
betpark giriş
vdcasino
vdcasino
timebet giriş
meybet giriş
timebet giriş
meybet giriş
bettilt
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
kavbet giriş
kavbet giriş
betpark giriş
bettilt
norabahis giriş
norabahis
betnano giriş
betnano giriş
bettilt
norabahis giriş
norabahis giriş
bettilt
norabahis giriş
bettilt
hitbet giriş
betbox giriş
betbox giriş
grandpashabet giriş
ganobet giriş
ganobet giriş
bettilt giriş
hitbet giriş
betoffice giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
extrabet giriş
extrabet giriş
betoffice giriş
betcio giriş
betcio giriş
meritbet giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş