Categories
कविता

गीता मेरे गीतों में….. गीत संख्या – 8, जीवात्मा है अमर

माधव समझाने लगे, अर्जुन को रण बीच।
आत्मा अविनाशी अमर सीख सके तो सीख।।

अविनाशी तलवार से कभी न काटा जाय ।
पानी से ना गल सके, आग से ना जल पाय।।

अविनाशी के मारने की जो कहते बात।
अज्ञानी वे हैं निरे ना समझें गहरी बात।।

मर नहीं सकता आत्मा और न मारा जाय ।
जो नर ऐसा मानता वह ज्ञानी कहलाय ।।

आत्मा और शरीर का विलय करना नहीं ठीक।
आत्मा ही सर्वोच्च है , वेदों की बात सटीक।।

शरीर को सब कुछ मानना वेद विरुद्ध यह बात।
मरणधर्म्मा होता यह – है वेदों का सिद्धांत ।।

आत्मा ‘गोपा’ वेद ने कही है मेरे मीत ।
यदि इसे समझना है तुझे तो ले इंद्रियों को जीत ।।

जब तक शरीर में आत्मा, तब तक इंद्रियां साथ।
प्रस्थान करे जब आत्मा – छोड़ें इंद्रियां साथ ।।

यदि इंद्रियां दूषित हो गईं, तो आत्मा का हो नाश ।
रहता अपने भाव में, पा ईश्वर का प्रकाश।।

अविनाशी किसी तत्व का, ना हो सकता उच्छेद।
ज्ञानी जन यह जानते , ना जाने मूरख भेद।।

किए का फल भोगना, निश्चित है सुनो पार्थ।
वेद का सिद्धांत है , फल भोगे हर पात्र ।।

जो तेरे सम्मुख खड़े , सब भोगें अपना भोग।
तू क्यों चिंता में पड़ा और क्यों करता है शोक।।

डॉ राकेश कुमार आर्य

Comment:Cancel reply

Exit mobile version