पर्यावरण प्रदूषण की समस्या से कैसे मिले निजात ?

images (9)

राजेश कश्यप 

पर्यावरण प्रदूषण में वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, नाभिकीय प्रदूषण आदि सब प्रदूषक शामिल हैं। वायु को प्रदूषित करने वाले मुख्यतः तीन कारक हैं, अचल दहन, चलायमान दहन और औद्योगिक अपशिष्ट।

नगरों-महानगरों में पर्यावरण प्रदूषण के कारण सांस लेना दूभर होता चला जा रहा है। कोरोना काल में आक्सीजन का संकट असंख्य जिन्दगियां लील रहा है। दिनोंदिन पृथ्वी गरम होती चली जा रही है। मौसम में अप्रत्याशित परिवर्तन व असंतुलन निरन्तर बढ़ रहा है। असाध्य बीमारियों का मकड़जाल अनवरत फैलता चला जा रहा है। अतिवृष्टि व अनावृष्टि कहर ढ़ाने लगी है। भयंकर चक्रवात तबाही मचा रहे हैं। भूस्खलन के मामले निरन्तर बढ़ रहे हैं। भूकम्प तांडव मचाने लगे हैं। हिमनद सूख रहे हैं। उत्तरी व दक्षिणी ध्रुवों की बर्फ पिंघलकर महाविनाश की भूमिका तैयार कर रही है। यह सब प्राकृतिक आपदाएं मानव द्वारा प्रकृति के साथ की जा रही छेड़छाड़ का ही नतीजा है। पर्यावरण प्रदूषण के कारण सामान्य जन-जीवन खतरे में पड़ चुका है। प्रतिवर्ष पर्यावरण दिवस मनाया जाता है और पर्यावरण प्रदूषण के प्रति गहन चिंतन किया जाता है। इसके साथ ही अधिक से अधिक पेड़ पौधे लगाने की शपथ भी ली जाती हैं। सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा पर्यावरण बचाने के लिए व जन-जागरूकता बढ़ाने के लिए कई तरह की गतिविधियां भी आयोजित की जाती हैं। लेकिन, सब औपचारिकताओं के दायरे में ही सिमटकर रह जाता है। जब तक हम पर्यावरण प्रदूषण के मूल को नहीं समझेंगे, तब तक हमें सकारात्मक परिणाम नहीं मिल सकते।

पर्यावरण प्रदूषण में वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, नाभिकीय प्रदूषण आदि सब प्रदूषक शामिल हैं। वायु को प्रदूषित करने वाले मुख्यतः तीन कारक हैं, अचल दहन, चलायमान दहन और औद्योगिक अपशिष्ट। अचल दहन के तहत जब कोयला, पेट्रोलियम आदि जीवाश्मी ईंधन जलते हैं तो इससे सल्फर डाइऑक्साइड, सल्फर ट्राइऑक्साइड, कार्बन मोनोक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड आदि गैंसें निकलती हैं और वातावरण में मौजूद जलीय कणों के साथ मिलकर गन्धकीय तेजाब, सल्फूरस अम्ल, नाइट्रिक अम्ल आदि का निर्माण करती हैं और अम्लीय वर्षा के रूप में पृथ्वी पर आकर अपने घातक प्रभाव डालती हैं। इन घातक प्रभावों में मुख्य रूप से पौधों की बढ़वार प्रभावित होना, मृदा के पोषक तत्वों का हनन होना, मत्स्य प्रजनन का रूकना, श्वसन तंत्र का प्रभावित होना आदि-आदि शामिल हैं। इन सबके अलावा भी इन गैसों के कुप्रभाव देखने में आते हैं।

चलायमान दहन के तहत स्कूटर, मोटरसाइकिल, कार, बस, हवाई जहाज, रेल आदि परिवहन के समस्त साधनों से निकलने वाले धुएं से वातावरण में जहर घुलता है। इस धुएं में कार्बन मोनोक्साइड, नाइट्रोजन आक्साइड तथा हाइड्रोकार्बन का मिश्रण होता है। इसके अलावा पेट्रोलियम के जलने से ट्रेटाइथल लैड, ट्रेटामिथाइल लैड जैसे लैड योगिक पैदा होते हैं और शरीर में हीमोग्लोबिन के निर्माण को रोककर बेहद घातक कुप्रभाव डालते हैं। औद्योगिक कारखानों में रासायनिक प्रक्रियाओं से होने वाले उत्पादन, उद्योगों से निकलने वाली कार्बन मोनोक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड आदि विषैली गैसों और औद्योगिक कारखानों से निकलने वाले प्रदूषित कचरे से पर्यावरण बेहद प्रदूषित होता है। जल प्रदूषण के लिए हमारी छोटी बड़ी सभी लापरवाहियां उत्तरदायी हैं। इनमें मशीनों का असहनीय शोर-शराबा, डायनामाइट विस्फोट, गोला-बारूद का प्रयोग, हथियारों व बमों का परीक्षण, वाहनों का भारी शोर, लाउडस्पीकरर्स आदि सब चीजें जिम्मेदार हैं। विकिरण प्रदूषण ने तो समस्त जीव जगत के जीवन पह गहरे प्रश्नचिन्ह लगा दिए हैं आण्विक विखण्डनों से होने वाली विघटनाभिका प्रक्रिया के तहत विकिरण प्रदूषण होता है। इतिहास साक्षी है वर्ष 1945 का, जिसके दौरान अमेरिका ने जापान के दो प्रमुख नगरों हीरोशिमा व नागासाकी आण्विक बम गिराए थे और जिससे पूरी दुनिया दहल उठी थी। आज साढ़े छह दशक बाद भी उन नगरों को उस आण्विक हमले की चोट से मुक्ति नहीं मिली है। क्योंकि नाभिकीय अपशिष्ट के रेडियोऐक्टिव तत्व कम से कम एक हजार वर्षों तक सक्रिय रहने की क्षमता रखते हैं। नाभिकीय परीक्षणों के चलते तो विकिरण प्रदूषण विश्व के लिए एक गंभीर स्थिति पैदा हो चुकी है।
कुल मिलाकर पर्यावरण प्रदूषण ने मौसम और अन्य पर्यावरणीय समीकरणों को गड़बड़ाकर रख दिया है। मौसम और पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक अपनी चरम प्रदूषण के चलते प्रमुख सात एशियाई देशों की जलवायु में अप्रत्याशित परिवर्तन आ चुका है और स्थिति निरन्तर भयावह होती चली जा रही है। कई साल पहले ही अनेक देशों के सरकारी और निजी अनुसंधान संस्थानों के विशेषज्ञों चेता दिया था कि भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, मलेशिया, वियतनाम और फिलीपीन जलवायु परिवर्तन के दुश्चक्र में फंस चुके हैं और इन देशों के तापमानों व समुद्री जल स्तर में निरन्तर वृद्धि हो रही है, जिससे इन देशों के तटवर्ती स्थानों पर समुद्री तूफान अपना कहर बरपाएंगे, करोड़ों लोग शरणार्थियों का जीवन जीने के लिए बाध्य होंगे और महामारियों की बाढ़ भी आएगी।

प्रकृति के साथ हो रही निरन्तर छेड़छाड़ के कारण ही अनेक जीव-जन्तुओं की प्रजातियों पर गहरा संकट छा चुका है। एक अनुमान के अनुसार धरती पर पाई जाने वाली लगभग चार करोड़ प्रजातियों में से लगभग एक सौ प्रजातियां प्रतिदिन नष्ट हो रही हैं। एक प्रसिद्ध जीव विज्ञानी तो वनों की अंधाधुंध कटाई से प्रतिदिन एक सौ चालीस रीढ़ वाले जीवों की प्रजातियां लुप्त हो रही हैं। समुद्र में तेल के रिसाव व पानी में गन्दे कूड़े-कचरे के बहाव के चलते कई समुद्री जीवों का तो अस्तित्व ही खतरे में पड़ चुका है। पेयजल के बढ़ चुके संकट ने दुनिया की नींद हराम करके रख दी है। बाढ़ व सूखे की विकरालताओं ने भी सबको हिलाकर रख दिया है। कृषि की उपज व मिट्टी की उपजाऊ क्षमता में भी भारी कमी आने लगी है। कई छोटे समुद्री द्वीपों के डूबने का खतरा भी मंडराने लगा है। हमारी लापरवाहियों के चलते पर्यावरण प्रदूषण बढ़ा है और उसी के चलते धरती गरमा उठी है। विशेषज्ञों का कहना है कि पर्यावरण प्रदूषण से उत्पन्न होने वाली गैसें पृथ्वी का तापमान बढ़ाने के साथ-साथ मानव जीवन की रक्षा कवच ओजोन परत को भी बड़ी तेजी से छिन्न-भिन्न कर रही हैं। यह ओजोन परत गैस की ऐसी परत है, जो सूर्य की पराबैंगनी किरणों को पृथ्वी पर आने से रोकती हैं और हमें चमड़ी के रोगों व कैंसर जैसी असंख्य दुःसाध्य बीमारियों के प्रकोप से बचाती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार निरन्तर बढ़ रहे पर्यावरण प्रदूषण के चलते हमारी रक्षा-कवच ओजोन परत अत्यन्त क्षीण हो चुकी है और इसमें किसी भी समय भयंकर छिद्र हो सकता है। अगर ऐसा हुआ तो पृथ्वी के समस्त जीवों के जीवन खतरे में पड़ जाएंगे और पृथ्वी का स्वर्गमयी वातावरण नरक में तब्दील हो जाएगा।
निरन्तर बढ़ रहे पर्यावरण प्रदूषण के प्रति सभी देशों की सरकारें अत्यन्त गंभीर तो हैं, लेकिन, इसे रोकने में अहम् भूमिकाएं नहीं निभा पा रहे हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि सैकड़ों देश प्रतिवर्ष इक्कठे बैठकर पर्यावरण प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन पर जो चिन्ताएं व्यक्त करते हैं और उससे निपटने के लिए जो बड़ी-बड़ी योजनाएं बनाते हैं, उन्हें वास्तविकता में तब्दील करने की कड़ी आवश्यकता है, वरना सभी देशों की यह सब गतिविधियां मात्र एक ढकोसले के सिवाय कुछ भी नहीं होंगी। विश्व के देशों की सरकारों के साथ-साथ प्रत्येक व्यक्ति को भी पर्यावरण प्रदूषण के प्रति जागरूक होना होगा और पर्यावरण प्रदूषण के प्रति अपनी लापरवाही, अज्ञानता व स्वार्थता पर एकदम अंकुश लगाना होगा। इसके लिए जरूरी है कि जन-जन को अधिक से अधिक पेड़ लगाने का दृढ़ संकल्प लेना होगा और लगे हुए पेड़ों के संरक्षण पर भी बराबर ध्यान रखना होगा।

Comment:

betpark güncel giriş
betgaranti güncel giriş
kolaybet güncel giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark güncel giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
meritking giriş
virüsbet giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
meritking giriş
marsbahis giriş
meritking giriş
realbahis giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark 2026
bets10 giriş
casinoroyal
casinoroyal
hititbet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
supertotobet giriş
supertotobet giriş
supertotobet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
supertotobet giriş
supertotobet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
Betpark Giriş
Betpark Giriş
vaycasino giriş
trendbet
trendbet
betnano giriş
betnano giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
betorder giriş
betorder giriş
betorder giriş
betorder giriş
trendbet
trendbet
trendbet
trendbet
hitbet
betnano giriş
restbet giriş
restbet giriş
casinoroyal giriş
casinoroyal giriş
padişahbet giriş
padişahbet giriş
betlike giriş
betlike giriş
casinoroyal
casinoroyal
trendbet
trendbet