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विश्व की अनोखी धरोहर है भारत का ओयल का मेढक मंदिर

पूनम नेगी

हमारा भारत अद्भुत विविधताओं से भरा हुआ है। हमारी देवभूमि के तीर्थ व मंदिर समूची दुनिया में अपनी विशिष्टताओं के लिए विख्यात हैं। भारतीय संस्कृति के इस बहुरंगी गुलदस्ते का ऐसा ही अनोखा मंदिर है उत्तर प्रदेश के लखीमपुर जिले का मेढक मंदिर। यह मंदिर अपने आप में किसी अजूबे से कम नहीं है। दिलचस्प तथ्य है कि तंत्रशास्त्र पर आधारित इस मंदिर में देवाधिदेव महादेव लिंगरूप में मेंढक की पीठ पर विराजमान हैं। खीरी जिले के ऐतिहासिक ओयल कस्बे में स्थित यह विशालकाय शिव मंदिर प्राचीन तांत्रिक परम्परा की अनुपम धरोहर ही नहीं; अपितु वास्तुशिल्प व मूर्तिकला का भी उत्कृष्ट नमूना है। पुरातत्विक व ऐतिहासिक दृष्टिकोण से विशेष महत्व रखने वाला यह मंदिर वर्तमान समय में ओयल के राजपरिवार के स्वामित्व में है। जिला गजेटियर में दर्ज उल्लेखों के अनुसार मंडूक तंत्र पर निर्मित इस अनूठे मंदिर का निर्माण दो शताब्दी पूर्व चाहमान वंश के तत्कालीन शासकों ने अपनी प्रजा को सूखे के प्रकोप से बचने के लिए कराया था। इस मंदिर पर राजस्थानी स्थापत्य कला का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। वर्तमान समय में पूजा अर्चना के साथ यह मंदिर तंत्र साधना के प्रमुख केन्द्र के रूप में समूचे क्षेत्र में जाना जाता है।

ओयल का यह मेंढक मंदिर अड़तीस मीटर लम्बाई व पच्चीस मीटर की चौड़ाई में निर्मित एक विशालकाय मेढक की पीठ पर बना हुआ है। इस मेंढक का मुख तथा अगले दोनों पैर उत्तर दिशा में हैं तथा पिछले पैर दक्षिण दिशा में। मेंढक का मुख दो मीटर लम्बा, डेढ़ मीटर चौड़ा तथा एक मीटर ऊंचा है। इसके पीछे का भाग दो मीटर लम्बा तथा डेढ़ मीटर चौड़ा है। यह विशाल मंडूक आकृति मेंढक के बैठने की स्वाभविक मुद्रा में बनायी गयी है। मेंढक की उभरी हुई गोलाकार आंखें तथा मुख का भाग अत्यंत जीवन्त प्रतीत होता है। मेढक की आकृति के ऊपर लगभग सौ मीटर की वर्गाकार जगती में मुख्य मंदिर का निर्माण श्री यंत्र के अनुसार किया गया है। मंदिर के निर्माण में लखौरी ईंटों और चूने के गारे का प्रयोग किया गया है। मंदिर तक जाने के लिए चारो तरफ पांच सीढिय़ां बनी हैं। सबसे ऊपर मंदिर का गुम्बदाकार शिखर है तथा मुख्य मंदिर के चारो कोनों पर चार अन्य छोटे मंदिर निर्मित हैं तथा मंदिर के चारो ओर लगभग 150 मीटर वर्गाकार में चहारदीवारी निर्मित है।
मंदिर के मुख्य गर्भगृह में सहस्त्र कमल दलों से अलंकृत सफेद संगमरमर की दीर्घा है। मुख्य मंदिर की बाहरी दीवारों तथा चारो कोनों पर बने लघु मंदिरों की दीवारों पर तंत्र साधना में निरत आकृतियां उत्कीर्ण हैं। इनमें खड्ग धारिणी देवी चामुण्डा, मोरनी पर आरूढ़ चार शीश वाले देवता तथा बलि के दृश्य तांत्रिक अनुष्ठान की पराकाष्ठा को प्रदर्शित करते हैं। यूं तो देश के अनेक स्थान पर तंत्रवाद से संबंधित मंदिर एवं प्रतिमाएं पाई जाती हैं जिनमें चौसठ योगिनियों के मंदिर प्रमुख हैं; किन्तु “मांडूक तंत्र” पर आधारित यह मेंढक मंदिर अपने आप में अद्वितीय है। जहां एक ओर मंदिर की बाहरी दीवारों में बनी विशालकाय ताखों में तांत्रिक क्रियाओं वाली मूर्तियां आकर्षण का केन्द्र हैं वहीं मंदिर की भीतरी दीवारों को दांतेदार मेहराबों, पद्म पंखुडिय़ों, सुंदर बेल-बूटों व पुष्प पत्र के अलंकरणों से सुसज्जित किया गया है। मंदिर के उत्तर में दो किलोमीटर लम्बा और एक किलोमीटर चौड़ा एक कुण्ड है जो संभवत: भक्तजन के स्नान के लिए बनाया गया होगा।
तंत्रवाद पर आधारित इस मंदिर की वास्तु संरचना अपनी विशेष शैली के कारण मनमोह लेती है। प्राचीन भारत के वास्तुकला विशेषज्ञ डा. अशर्फीलाल श्रीवास्तव बताते हैं कि ग्यारहवीं सदी की तांत्रिक संरचनाओं में अष्टदल कमल का बहुत महत्व रहा है। ओयल के मेंढक मंदिर में अंकित अष्टदल कमल की विशिष्ट संरचनाएं इसे तंत्र विद्या के विशिष्ट केन्द्र के रूप में स्थापित करती हैं। मंदिर का आधार भाग अष्टदल कमल के आकार का ही बना हुआ है। मंदिर का मुख्य द्वार पूर्व की ओर तथा दूसरा द्वार दक्षिण की ओर है। मंदिर के गर्भगृह में सहस्त्र कमल की पंखुडिय़ों से युक्त अरघे पर नर्मदेश्वर से लाया गया दिव्य शिवलिंग स्थापित है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि मंदिर में स्थापित यह पवित्र शिवलिंग दिन में तीन बार अपना रंग बदलता है।

मंदिर की अन्य खासियतों में यहां स्थापित नंदी की खड़ी प्रतिमा तथा मंदिर का छत्र है। कहते हैं कि यह छत्र पहले सूर्य की रोशनी के साथ पहले घूमता था तथा पथिकों के लिए दिशा सूचक का कार्य करता था पर अब यह क्षतिग्रस्त हो चुका है। आमतौर पर शिव मंदिरों में नंदी की प्रतिमा बैठी अवस्था में होती है मगर यहां नंदी खड़ी अवस्था में स्थापित की गई हैं। इस विपरीत प्रथा के पीछे भी कोई न कोई रहस्य तो अवश्य होगा। रोचक तथ्य यह भी है कि मंदिर में शिवलिंग को अर्पित किया गया जल नलिकाओं के माध्यम से मेढक के मुंह से बाहर निकलता है।
इस मंदिर से जुड़ा एक और अनोखा आकर्षण है यहां बनी भूलभुलैया। हालांकि अब इस भूलभुलैया में जाना वर्जित है। मंदिर कक्ष के भीतर ही एक द्वार बना हुआ है। इस द्वार पर हमेशा ताला लटका रहता है और किसी को भी इसके भीतर जाने की इजाजत नहीं। बताया जाता है कि पुराने समय में इसका प्रयोग युद्ध के समय राजा अपने परिवार के साथ सुरक्षित बाहर निकलने के लिए इस्तेमाल करते थे। इस भूलभुलैया में कई द्वार हैं लेकिन केवल एक ही द्वार सही दिशा में ले जाता है। बाकी द्वार से गुजरने पर लोग अंधेरे कुएं में गिर जाते हैं। खतरनाक होने की वजह से इस द्वार को बंद ही रखा जाता है।
ऐतिहासिक साक्ष्यों के मुताबिक मध्ययुग में यह क्षेत्र शैव संप्रदाय का प्रमुख केंद्र था। यहां के शासक भगवान शिव के अनन्य उपासक थे। इस बात का पुख्ता प्रमाण है मंडूक यंत्र पर आधारित यह प्राचीन शिव मंदिर। इस मंदिर के निर्माण के पीछे दो सौ साल पुरानी एक रोचक जनश्रुति समूचे क्षेत्र में प्रचलित है। एक जनश्रुति के अनुसार एक बार इस राज्य में अकाल पड़ा। ओयल राज्य के प्रजा पालक राजा बख्श सिंह इससे बहुत दुखी थे और निवारण का उपाय तलाश रहे थे। तभी एक रात स्वप्न में उन्हें एक विशाल मेढक ने दर्शन देकर वर्षा के लिए मंडूक यंत्र पर आधारित एक मंदिर बनाने की प्रेरणा दी थी।
इस स्वप्न को देखने के बाद राजा की उद्विग्नता शांत हुई इस स्वप्न को देखने के बाद राजा की उद्विग्नता शांत हुई और उन्होंने कपिला के महान तंत्राचार्यों और वाराणसी के विद्वानों की देखरेख में शुरू कराया। उनके निधन के उपरांत इस मंदिर का निर्माण कार्य राजा बख्त सिंह के उत्तराधिकारी राजा अनिरुद्ध सिंह ने 19वीं शताब्दी के पूर्वाद्ध में पूर्ण कराया था। जिला गजेटियर में दर्ज उल्लेखों के मुताबिक इस मंदिर का निर्माण 18वीं शताब्दी के उत्तराद्र्ध में शुरू हुआ था। इतिहासकारों की मानें तो 13-14 वीं शताब्दी से 19वीं शताब्दी के पूर्वाद्ध तक यह क्षेत्र चाहमान शासकों के आधीन था। भले ही समय के थपेड़ों में मंदिर की पच्चीकारी, नक्काशी और रंग रोगन क्षरित होता जा रहा हो; बावजूद इसके, यह अनोखा मंदिर अब भी बेहद आकर्षक है।
दीपावली पर इस अनूठे मंदिर में तंत्र सिद्धि के अनुष्ठान किये जाते हैं तथा विविध पर्व त्योहारों, खासतौर पर श्रावण मास व महाशिवरात्रि पर बड़ी संख्या में भक्त इस मेंढक मंदिर में भगवान शिव के दर्शन पूजन के लिये आते हैं। मान्यता है कि इन अवसरों पर यहां पूजा करने से विशेष फलों की प्राप्ति होती है। जानकारों का कहना है कि अतीतकाल में ओयल कस्बा प्रसिद्ध तीर्थ नैमिषारण्य क्षेत्र का ही एक हिस्सा था और अपनी समृद्ध कला-संस्कृति के लिए समूचे क्षेत्र में विख्यात था। गौरतलब हो कि प्राचीनकाल से वर्तमान तक आध्यात्मिक क्रियाकलापों के प्रमुख केन्द्र के रूप में विख्यात नैमिषारण्य वही प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है जहां तथा श्रीहरि विष्णु का सुदर्शन चक्र चक्रतीर्थ में गिरा था तथा दधीचि ने वज्र के निर्माण के लिए अपनी अस्थियां देवताओं को प्रदान की थीं। अब इस अदभुत मेंढक मंदिर को यूपी की पर्यटन विभाग ने भी चिह्नित कर रखा है। बताते चलें कि दुधवा टाइगर रिजर्व कॉरीडोर में इस मंदिर को भी विश्व मानचित्र पर लाने के प्रयास जारी हैं।

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