Categories
इतिहास के पन्नों से

स्वतंत्रता सेनानी विजय सिंह पथिक की 68 वी पुण्यतिथि पर विशेष आलेख

देवेंद्र सिंह आर्य (एडवोकेट) (चेयरमैन ‘उगता भारत’ समाचार पत्र)

पश्चिम उत्तर भारतवर्ष, वर्तमान के देश पाकिस्तान, कजाकिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, अफगानिस्तान ,जॉर्जिया आदि देशों में एक जाति पाई जाती है जिसको जुज्र कहा जाता था जिसके नाम पर रूस के तथा कश्यप सागर के पश्चिम में जॉर्जिया देश अवस्थित है। इसी का अपभ्रंश करके गुर्जर कहते हैं।
गुर्जर शब्द की उत्पत्ति के विषय में विभिन्न प्रकार की अवधारणाएं हैं।
उन अवधारणाओं में से एक अवधारणा यह भी है कि गुर्जर उस व्यक्तियों के समूह को अथवा समाज को, कहते थे जो देश व समाज की व्यवस्था को जर्जर होने से बचाएं । उसको विशुद्ध रूप प्रदान करते हुए उच्चतम शिखर तक ले जाए। जब क्षत्रियों में भी कुछ पतन होना प्रारंभ हुआ तो क्षत्रियों में से जो लोग देश की सेवा और समाज को दिशा देने वाले रहे ,व्यवस्थाओं को, परंपराओं को संरक्षित करने वाले रहे ,राष्ट्र की रक्षा करने में अग्रणी योगदान देने वाले रहे उनको गुर्जर कहा गया। इस प्रकार गुर्जरों का इतिहास इतना गौरवपूर्ण है यदि उसको एक जगह संकलित करके राष्ट्र के समक्ष प्रस्तुत कर दिया जाए तो जनमानस में क्रांति उत्पन्न हो जाएगी। तथा जो लोग यह कहते हैं कि गुर्जरों का इतिहास क्या है?
यह गुर्जर कौन होते हैं? उनको ऐसे सभी प्रश्नों के उत्तर सम्यक रूपेण प्राप्त हो जाएंगे ।आज हम जिन महापुरुष के विषय में वार्ता करने जा रहे हैं उनके समस्त कार्यों को, उपलब्धियों को, राष्ट्र के प्रति समर्पित भाव को, अध्ययन करने के उपरांत आपको ऐसा अनुभव होने लगेगा कि हमारे अतिरिक्त और किसी का योगदान भारत की स्वतंत्रता में इतना नहीं है, जितना कि हमारे स्वतंत्रता सेनानियों,अमर बलिदानियो ने दिया।
जी हां उनमें से एक हैं श्री विजय सिंह जी पथिक जिनकी 27 फरवरी को जयंती है।

27 फरवरी सन 18 82 में ग्राम गुठावली, जिला बुलंदशहर ,उत्तर प्रदेश की पावन भूमि पर एक बच्चे का “माता कमल कुमारी की कोख से पुत्र रतन का जन्म हुआ था। जिसके पिता श्री का नाम श्री हमीर सिंह राठी था। दादा का नाम इंदर सिंह राठी था।
श्री विजय सिंह पथिक का नाम बाल्यकाल में भूप सिंह राठी था।
श्री विजय सिंह पथिक के दादा इंदर सिंह राठी जी माला गढ़ जिला बुलंदशहर में एक छोटी सी रियासत हुआ करती थी जिसके प्रधानमंत्री( मुगल काल में प्रधानमंत्री को दीवान कहा जाता था,) हुआ करते थे। उसे रियासत के नवाब बलिदान खान थे। जिन्होंने 18 57 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अपनी जागीरदारी और जमीदारी की परवाह न करते हुए तत्कालीन दिल्ली के बाद शाह बहादुर शाह जफर के लिए दादरी के राव उमराव सिंह भाटी के साथ मिलकर गाजियाबाद हिंडन नदी पर अंग्रेजों के साथ संघर्ष किया था और कई अंग्रेज अफसरों को मौत की नींद सुला दिया था जिसके पीछे राष्ट्रीय भावना यदि कहीं कोई काम कर रही थी तो वह कोतवाल धन सिंह चपराना गुर्जर की देश को स्वतंत्र करने की भावना थी इसी को आगे बढ़ाते हुए प्रधानमंत्री इंदर सिंह ,राव उमराव सिंह अनेक गुर्जर योद्धाओं ने भारत के स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए अपना सर्वोत्तम बलिदान दिया।
यही बालक भूप सिंह राठी आगे चलकर के देश का भविष्य बना और भारत की आजादी के लिए विभिन्न कार्य योजना एवं आंदोलन करने वाला और नेतृत्व प्रदान करने वाला अनूठा सिपाही बना ।उनको इसीलिए राष्ट्रीय पथिक एवं विजय सिंह पथिक नाम से भी प्रसिद्धि इतिहास में प्राप्त हुई क्योंकि उनका पथ केवल राष्ट्र जागरण था, केवल राष्ट्र के लिए कार्य करना था ,इसलिए राष्ट्र पथिक कहा गया।इसके अतिरिक्त देश की विजय की प्राप्ति के पथिक रहे इस कारण भी विजय सिंह पथिक कहे गए ।बचपन से ही क्रांतिकारियों रासबिहारी बोस ,सचिंद्र नाथ सान्याल आदि के साथ संपर्क रहा। ऐसे क्रांतिकारियों का घर में आना जाना प्रारंभ से ही रहा था क्योंकि दादा और पिता से क्रांति की भावना उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी।
श्री पथिक ने अपने किशोर वय में ही रिवॉल्यूशनरी ऑर्गेनाइजेशन में भाग लेकर अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई लड़कर के भारत माता को स्वतंत्र करने का भगीरथ प्रयास किया ।उन्हीं के प्रयासों से असहयोग आंदोलन चलाया गया।जिसको बिजोलिया आंदोलन इतिहास में कहा जाता है ।यह आंदोलन किसानों पर होते अत्याचारों से मुक्ति के लिए चलाया गया था। उनके आंदोलन से प्रभावित होकर लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने महाराणा फतेह सिंह को पत्र लिखकर श्री पथिक के बिजोलिया आंदोलन की मांग स्वीकार करने का अनुरोध किया ।उनके इस आंदोलन के कारण उनको निर्माण कराया गया था। किसान पंचायत ,महिला मंडल ,युवक मंडल आदि संगठन श्री पथिक जी को अपने यहां विशेष आमंत्रण देकर बुलाते थे । उनसे अपने संगठन का नेतृत्व करने का अनुनय करते थे।
महात्मा गांधी ने अपने सचिव महादेव देसाई को श्री पथिक के पास भेजा और आंदोलन करने का ककहरा सीखा। श्री पथिक जी ने संयुक्त राजस्थान के लिए आंदोलन किया । यह मांग तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू व गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल के समक्ष भी उठाई।
मेवाड़ के महिला जगत ने भी पथिक जी को अपना नेता माना क्योंकि पथिक जी यह जानते थे कि देश का विकास, उद्धार पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं को लेकर चलने से संभव है।
वास्तव में पथिक जैसा कोई अन्य देशभक्त नहीं है। पथिक जैसा कोई अन्य स्वतंत्रता सेनानी नहीं है। इंदिरा व्यास ने उनके विषय में लिखा है कि पथिक जी अपना जीवन बलिदान कर सकते थे लेकिन भारत मां का भाल या झंडा झुकने नहीं देना चाहते थे ।
इस पर एक कविता भी बनाई गई थी जो काफी प्रसिद्ध एवं प्रचलित रही।
श्री पथिक जी का व्यक्तित्व चहुमुखी प्रतिभा से धनी एवं ओतप्रोत था । वे केवल सत्याग्रह ,आंदोलन कर्ता ही नहीं बल्कि एक अच्छे कवि, लेखक, पत्रकार , संगठनकर्ता और विद्वान भी थे ।इसलिए उन्होंने राजस्थान केसरी,तथा नवीन राजस्थान समाचार पत्रों पत्रिकाओं का संपादन बहुत ही विद्वता पूर्ण, दूरदर्शिता पूर्ण एवं कुशलता पूर्वक किया।
उन्होंने अपनी स्वतंत्र साप्ताहिक पत्रिका राजस्थान संदेश व नव संदेश का अजमेर से प्रकाशन प्रारंभ किया ।तरुण राजस्थान पत्रिका के लिए भी लेखन एवं संपादन किया ।श्री पथिक ने अजय मेरु उपन्यास, पथिक प्रमोद( कहानी संग्रह), पथिक जी के जेल के पत्र, पथिक की कविताओं का संग्रह आदि संपादित हैं
श्री पथिक को मध्य भारत, राजपूताना का प्रांतीय अध्यक्ष चुने जाने का भी गौरव प्राप्त रहा है। उनकी स्मृति में डाक टिकट भी जारी किया गया था।
28 मई वर्ष 1954 में अजमेर में श्री पथिक जी का परलोक गमन हुआ।
श्री पथिक भारत के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे। अपनी पहचान छिपाने के उद्देश्य से 1915 में फिरोजपुर षड्यंत्र के पश्चात अपना नाम भूप सिंह राठी से बदलकर विजय सिंह पथिक रख लिया था।
उनके पैतृक ग्राम गुठावली में उनकी एक भव्य प्रतिमा लगी है एक पुस्तकालय और यहां पर एक जिम भी उनके नाम पर स्थापित है सूबेदार जयचंद राठी इन के संरक्षक हैं। उनके गांव में जयंती एवं पुण्यतिथि के अवसर पर प्रत्येक वर्ष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
जिससे यह उक्ति चरितार्थ होती है कि ।
शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले।
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशा होगा।
वस्तुतः वर्ष 1912 में अंग्रेजों ने कोलकाता से राजधानी हटाकर दिल्ली लाने का निर्णय किया ।इस अवसर पर भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड हार्डिंग ने दिल्ली प्रवेश करने के लिए एक शानदार जुलूस का आयोजन किया। उस समय अन्य क्रांतिकारियों ने जुलूस पर बम फेंक कर मारने की कोशिश की परंतु लॉर्ड हार्डिंग बच गया था।
स्वतंत्रता सेनानी रासबिहारी बोस जोरावर सिंह प्रताप सिंह पथिक जी व अन्य सभी क्रांतिकारी अंग्रेजों के हाथ नहीं आए और फरार हो गए वर्ष 1915 में रासबिहारी बोस के नेतृत्व में लाहौर में क्रांतिकारियों ने निर्णय लिया कि 21 फरवरी को देश के विभिन्न स्थानों पर अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति की तर्ज पर सशस्त्र विद्रोह किया जाए ।भारतीय इतिहास में इसे अंग्रेजों ने गदर कहा है। इस योजना के अंतर्गत यह तय था कि एक तरफ तो भारतीय ब्रिटिश सेना को विद्रोह करने के लिए उकसाया जाए दूसरी तरफ देशी राजाओं की सेनाओं से विद्रोह में सहयोग लिया जाए ।राजस्थान में इस क्रांति का संचालन करने का जिम्मा श्री पथिक को सौंपा गया।
उस समय फिरोजपुर केस में फरार चल रहे थे ।तथा खरवा राजस्थान में गोपाल सिंह के पास रह रहे थे ।इन दोनों ने मिलकर 2000 युवकों का दल” युवक दल” तैयार किया ।तथा 30,000 से अधिक बंदूके एकत्र की। परंतु दुर्भाग्यवश अंग्रेजों को इस बड़ी क्रांति की भनक लग गई और भेद खुल गया। इसको दबाने के लिए देशभर के क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। गोपाल सिंह व पथिक जी ने गोला-बारूद सब भूमिगत कर दिया । तथा सैनिकों को विसर्जित कर दिया ,लेकिन कुछ समय पश्चात अजमेर के कमिश्नर ने 500 सैनिकों के साथ पथिक जी व गोपाल सिंह को खरवा के जंगलों से गिरफ्तार करके टॉडगढ़ की जेल में डाल दिया। किसान बेलगाम मालगुजारी से त्रस्त थे । इसलिए किसानों की दशा अच्छी नहीं थी
उसी समय लाहौर षड्यंत्र में भी पथिक जी का नाम सामने आया ।उन्हें लाहौर ले जाने की योजना अंग्रेज बनाई रहे थे कि पथिक को जब इस तथ्य की जानकारी हुई तो टॉडगढ़ जेल से फरार हो गए। गिरफ्तारी से बचने के उद्देश्य से पथिक जी ने अपनी वेशभूषा में भी परिवर्तन करते हुए राजस्थानी राजपूतों जैसे कपड़े पहनना प्रारंभ कर दिया । चित्तौड़गढ़ क्षेत्र में रहने लगे बिजोलिया से आए एक साधु सीतारामदास पथिक जी से बहुत प्रभावित हुए।तथा उन्होंने पथिक से आग्रह किया कि बिजोलिया के किसानों को उत्पीड़न, शोषण और अत्याचार से मुक्ति दिलाने हेतु आंदोलन का नेतृत्व आप स्वीकार करें। क्योंकि किसानों को मालगुजारी और लगान से बहुत ही उत्पीड़ित किया जा रहा था। किसानों की दशा अच्छी नहीं थी ।बल्कि पथिक जी ने दुर्दशा देखकर साधु सीताराम दास का यह आग्रह स्वीकार कर लिया और बिजोलिया आंदोलन का नेतृत्व करना करीब
1915_16 से प्रारंभ किया।
क्या था बिजोलिया आंदोलन।
वर्ष 1897 में मेवाड़ राज्य के किसानों द्वारा बिजोलिया आंदोलन का बिगुल फूंका गया था ।यह आंदोलन किसानों पर अत्यधिक लगान लगाए जाने के विरोध में था ।बिजोलिया भीलवाड़ा ,राजस्थान की एक जागीर होती थी जहां के किसान करों के विरुद्ध एकजुट हुए ,आंदोलन किया ।यही आंदोलन फिर आसपास की जागीरो में भी फैल गया जिसका नेतृत्व भिन्न-भिन्न समय पर भिन्न-भिन्न महा मूर्तियों द्वारा किया गया। साधु सीताराम दास ,विजय सिंह पथिक, मानिक लाल वर्मा ने क्रमशः 1897 से 1914 तक 1914 से 1923 तक तथा 1923 से 1941 तक किया था।
यह आंदोलन 1897 से प्रारंभ होकर वर्ष 1941 तक 44 वर्ष अर्थात करीब आधी सदी तक चलता रहा था ।यह आंदोलन धाकड़ जाति के किसानों द्वारा प्रारंभ किया गया था।
इस प्रकार के कर मे लालबाग कर ,लाटा कुंता कर (खेत में खड़ी फसल के आधार पर कर) चंवरी कर( किसान की बेटी की शादी पर )तलवार बधाई पर (नई जागीरदार बनने पर) आदि 84 प्रकार के कर थे।
यह एक बार आंदोलन सर्वाधिक लंबा चलने वाला भारतीय इतिहास में है जिसका नेतृत्व महिला नेत्रियों जैसे अंजना देवी चौधरी ,नारायण देवी वर्मा, रमा देवी आदि ने भी प्रमुखता से किया था ।
पथिक जी के प्रयास से प्रत्येक गांव में किसान पंचायत स्थापित की गई। किसानों की मुख्य मांगे भूमि कर ,अधिकारों एवं बेगार से संबंधित सभी मांगों के लिए सरकार पर दबाव बनाए जाने लगा। किसानों से उस समय 84 कर वसूले जा रहे थे। युद्ध कोष भी बहुत बड़ा प्रश्न था। एक अन्य मुद्दा साहूकारों से संबंधित था जो जमीदारों के सहयोग और संरक्षण से किसानों को लूट रहे थे।
पंचायतों ने भूमि कर न देने का निर्णय लिया।
तभी 1917 में रूस में बोल्शेविक क्रांति हुई थी। उसी क्रांति का प्रभाव भारत में भी आया ।उसी क्रांति की तरज पर किसान आंदोलन पथिक जी के नेतृत्व में चलाया गया । पथिक जी ने प्रत्येक सभा में, प्रत्येक संभाषण में , प्रत्येक उद्बोधन में, संबोधन में यही कहा कि रूसी क्रांति से सीख लेने की आवश्यकता है।
कानपुर से उस समय गणेश शंकर विद्यार्थी एक पत्र प्रताप प्रकाशित कर रहे थे। उस पत्र में पथिक जी ने बिजोलिया आंदोलन के विषय में लेख छपवा या तो सारे देश की नजर बिजोलिया आंदोलन पर पड़ी ।बिजोलिया आंदोलन की चर्चा देशव्यापी ,देश स्तर पर होने लगी।
वर्ष 1919 में अमृतसर कांग्रेस में पथिक जी के प्रयत्न से बाल गंगाधर तिलक ने बिजोलिया प्रस्ताव रखा पथिक ने ही मुंबई में गांधी जी के साथ मिलकर किसानों की करुण व्यथा सुनाई। गांधी जी ने मेवाड़ सरकार को चेतावनी दी कि यदि आप ने किसानों के साथ न्याय नहीं किया तो आंदोलन का नेतृत्व स्वयं मैं करूंगा ।महाराणा फतेह सिंह को गांधीजी ने पत्र लिखा परंतु कोई हल नहीं निकला ।पथिक जी ने मुंबई में ही गांधी जी से मिलकर यह निश्चय किया था कि वर्धा से राजस्थान केसरी समाचार पत्र निकाला या प्रकाशित किया जाए ।यही पत्र संपूर्ण भारतवर्ष में लोक प्रिय हो गया था ।कुछ समय तक सभी ठीक रहा परंतु श्री पथिक जी के विचारों से जमनालाल बजाज की विचारधारा मेल नहीं खाती थी ,इसलिए वर्धा छोड़कर पथिक जी अजमेर आ गए।
वर्ष 1920 में पथिक जी ने अजमेर में राजस्थान सेवा संघ की नींव डाली । अति अल्प काल में इस संघ की शाखाएं पूरे प्रदेश में खुल गई ।यहीं से पथिक जी ने नवीन राजस्थान पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया । वर्ष 1920 में पथिक जी ने अपने सहयोगियों के साथ नागपुर अधिवेशन में शिरकत की इसी अधिवेशन के दौरान एक प्रदर्शनी का आयोजन किया गया जिसमें राजाओं द्वारा किसानों के साथ बरती जा रही निरंकुशता का चित्रण किया गया था।
गांधी जी पथिक जी के आंदोलन से प्रभावित तो हुए ,परंतु गांधी जी ने प्रभावी तरीके से राजाओं का विरोध नहीं किया, बल्कि इस मुद्दे पर गांधीजी नरम ही रहे। लेकिन पथिक जी समझौता वादी व्यक्ति नहीं थे।
वास्तव में कांग्रेस और गांधी यह समझने में पूर्णतयाअसफल रहे कि सामंतवाद साम्राज्यवाद का ही एक स्तंभ है । तथा ब्रिटिश साम्राज्यवाद को समूल नष्ट करने के लिए प्रथम त: सामंतवाद को उखाड़ फेंकना होगा। तथा सामंतवाद विरोधी संघर्ष करना आवश्यक है ।
इसके बाद हद तब हो गई जब अहमदाबाद अधिवेशन में गांधी जी ने बिजोलिया के किसानों को सलाह दे दी कि वे क्षेत्र छोड़कर अन्यत्र लौट जाए।
पथिक जी ठहरे क्रांतिकारी उनका गांधी के साथ इस विषय में तालमेल और सामंजस्य नहीं बैठ पाया। इस पर उन्होंने गांधीजी से सहमति नहीं रखते हुए कहा कि यह मर्दों का काम नहीं है ,यह हिजड़ों के लिए उचित है।
वर्ष 1921 के आने तक पथिक जी द्वारा अनेक आंदोलन किए गए ।इनमें बेगू ,पारसोली ,भिंडर, बासी और उदयपुर आदि शक्तिशाली आंदोलन विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वस्तुतः बिजोलिया आंदोलन अन्य क्षेत्रों के लिए भी किसानों के लिए प्रेरणा स्रोत बन गया था। पथिक जी के कुशल नेतृत्व के कारण ऐसा आभास होने लगा था कि मानो राजस्थान में किसान आंदोलन की लहर चल पड़ी है ।इससे ब्रिटिश सरकार डर गई और उसकी बोल्शेविक क्रांति की प्रति छाया अंग्रेज सरकार भारतवर्ष में देखने लगी थी।
इसीलिए सरकार ने अंततः राजस्थान के ए oजीoजीo हालैंड को बिजोलिया किसान पंचायत में बोर्ड के समक्ष और राजस्थान सेवा संघ से वार्ता करने के लिए नियुक्त किया। शीघ्र ही दोनों पक्षों में समझौता हुआ। जिस समझौते के तहत पथिक जी के नेतृत्व में किसानों की मांग मान ली गई थी , 84 करों में से 35 कर माफ कर दिए गए थे। कर्मचारी (कारिंदे) जो किसानों पर जुल्म कर रहे थे उनको बर्खास्त कर दिया गया था। इससे किसानों की अभूतपूर्व विजय हुई थी। इसी बीच बेगू आंदोलन तेज हो गया। मेवाड़ सरकार ने पथिक जी को गिरफ्तार कर लिया ।उन्हें 5 वर्ष की सजा सुनाई गई। जिससे वर्ष 1927 में जेल से रिहा हुए।

अंग्रेज जितना अपने साम्राज्य की नींव को भारतवर्ष में जमाने का प्रयास कर रहे थे ,उतना ही भारतीय जनता उनके खिलाफ हो रही थी। इसका प्रभाव राजपूताना क्षेत्र में नसीराबाद, देवली, अजमेर, कोटा ,जोधपुर आदि जगह पर भी देखने को मिला था। राजपूताना में उस समय अट्ठारह रजवाड़े थे । जो विदेशी शासक अंग्रेज राज्य के प्रबल समर्थक थे। फिर भी यहां के छोटे जागीरदारों एवं जनता का जनमानस अंग्रेजों के विरुद्ध था। जिसके फलस्वरूप मेरठ में हुई क्रांति का प्रभाव पड़ा।
मारवाड़ के तत्कालीन महाराजा तख्त सिंह कोटा के महाराव राम सिंह दोनों अंग्रेज भक्त थे फिर भी मारवाड़ में आउवा के ठाकुर कुशल सिंह के नेतृत्व में 8 सितंबर को तथा कोटा में लाला जयदयाल एवं मेहराब खान पठान के नेतृत्व में 15 अक्टूबर 18 57 को मारवाड़ में अंग्रेज सरकार के विरुद्ध विद्रोह भड़क गया था।
तत्कालीन अंग्रेज मेजर बर्टन चाहता था कि महाराज अपनी सेना में विद्रोह फैलाने वाले जयदयाल आदि 57 अफसरों को गिरफ्तार कर उन्हें दंडित करें तथा उन्हें अंग्रेजों के हवाले कर दिया जाए 14 अक्टूबर को मेजर बर्टन दरबार से मिलने गढ़ में गए और उन्हें अपनी बात दोहराई।
महाराज राम सिंह पूर्ण ता अंग्रेज शक्ति, उनकी भक्ति और अपने सेना के विद्रोही रुख को भी भली-भांति पहचानते थे। फिर भी यह उनके वश में नहीं था कि वह जयदयाल कायस्थ और मेहराब आदि सेनापतियों को गिरफ्तार करके उन्हें दंड दे सके। इसलिए उसने मेजर बर्टन की राय नहीं मानी, लेकिन मेजर बर्टन की इस राय के जाहिर होने पर फौज भड़क उठी ,और 15 अक्टूबर 18 57 को एकाएक सेना और जनता ने एजेंट के बंगले को चारों ओर से घेर लिया। कोटा नगर के बाहर नयापुरा में मौजूद कलेक्ट्रेट के पास स्थित वर्तमान बृजराज भवन में रहता था विद्रोहियों ने एजेंट के बंगले पर 4 घंटे तक गोलाबारी की, बाकी कुछ लोग सीढ़ी लगाकर बंगले में घुस गए, व छत पर पहुंचे ,और मेजर बर्टन तथा उसके दोनों पुत्रों को तलवार से मौत के घाट उतार दिया।
मेजर बर्टन का सिर काटकर कोटा शहर में घुमाया और तोप से उड़ा दिया। इसके बाद सारे कोटा नगर पर विद्रोहियों ने कब्जा कर लिया। महाराज ने गढ़ में अपने कुछ राजपूत सरदारों के साथ असहाय अवस्था में बंद कर लिया। विद्रोहियों का कब्जा कोटा नगर पर 20 अप्रैल 18 58 तक यानी कि 6 माह तक रहा। महाराज की सेना, अंग्रेजी सेना तथा विद्रोहियों के मध्य अनेक लड़ाई होती रही। इससे पहले मार्च के महीने में चंबल की तरफ से अंग्रेजी सेना आ चुकी थी। महाराज ने कुछ राजपूत सरदारों को बुला लिया था। फिर 27 अप्रैल 1858 को कोटा पर फिर पूर्णत: अंग्रेजों का कब्जा हो गया था।
उसके पश्चात अंग्रेजों के अत्याचार बढ़ते चले गए लड़ाई में अनेकों विद्रोही नेता मारे गए, और स्वतंत्रता सेनानियों में भगदड़ मच गई। अधिकतर के सिर कटवा दिए गए ।लाला जय दयाल और महाराज बचकर निकल गए थे ।उन्हें मालवा और मध्य भारत की तरफ से गिरफ्तार करके कोटा लाया गया। इन दोनों आजादी के दीवानों को अंग्रेजी सरकार ने कोटा महाराव पर दबाव डालकर पोलिटिकल एजेंट की उपस्थिति में नयापुरा में फांसी लगाई गई ,जहां अदालत के सामने चौराहे पर शहीद स्मारक बना हुआ है।
किसी ने सच ही तो कहा है

” जिनकी लाशों पर चलकर यह आजादी आई
उनकी याद लोगों ने बहुत ही गहरे में दफनाई ।।

यह महत्वपूर्ण तथ्य यहां पर इसलिए जोड़ा गया है कि सन 18 57 के स्वतंत्रता संग्राम में जहां गुर्जर कोतवाल धन सिंह चपराना गुर्जर राव उमराव सिंह आदि का अग्रणी योगदान रहा वहीं पर विजय सिंह पथिक गुर्जर जो मूल रूप से बुलंदशहर उत्तर प्रदेश के ही रहने वाले थे ,का भी विशेष योगदान है क्योंकि उनके पिता और उनके दादा कोतवाल धन सिंह के साथ प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में कार्य कर चुके थे वह प्रभाव पथिक जी के जीवन में मृत्यु पर्यंत रहा।
इसके अतिरिक्त कोटा की इसी घटना से प्रेरित होकर विजय सिंह पथिक, केसरी सिंह बारहठ, और नयन राम शर्मा ने हाड़ौती में क्रांति का शंखनाद किया था।विजय सिंह पथिक गुर्जर की प्रेरणा पर राजस्थान सेवा संघ के कार्यकर्ता साधु सीताराम दास ,रामनारायण चौधरी, हरिभाई किंकर मानिक लाल वर्मा ,नयन राम शर्मा ने बेगार प्रथा व भारी लगान और अनेक लागत और छोटे जागीरदारों द्वारा किए गए अत्याचारों से जनता को छुटकारा दिलाने के लिए आंदोलन में सत्याग्रह प्रारंभ किए, जेल की यातनाएं सही ।
आधुनिक विश्व में यदि विजय सिंह पथिक गुर्जर को सत्याग्रह का जन्मदाता कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। भारत में सबसे पहले पथिक ने बिजोलिया सत्याग्रह का सूत्रपात किया था। सत्याग्रह के कथित प्रवर्तक महात्मा गांधी ने उसके पश्चात चंपारण सत्याग्रह का चमत्कार किया था।
एक बार जब किसी ने गांधी जी से सत्याग्रह शब्द की व्याख्या करने को कहा तो गांधी ने उत्तर दिया था कि सत्याग्रह के बारे में जानना चाहते हो तो पथिक से जाकर पूछो ।
बाद में जोरावर सिंह, प्रताप सिंह बारहठ परिवार ,पंडित अभिन्नहरि, शंभू दयाल सक्सेना, बेनी माधव शर्मा, रामेश्वर दयाल सक्सेना, अर्जुन सिंह वर्मा, हीरालाल जैन ,भेरूलाल, काला बादल, जोरावर मल जैन, कुंदन लाल चोपड़ा, श्याम नारायण सक्सेना ,तनसुख लाल मित्तल, सेठ मोतीलाल जैन ,शिव प्रताप श्रीवास्तव, गोपाल लाल, संत नित्यानंद, मेहता गोपाल लाल कोटिया, मांगीलाल भव्य आदि नेता और कार्यकर्ता स्वाधीनता आंदोलन में हाडोती के जनमानस पर उभर कर पथिक जी के प्रभाव से ही आए।
छात्र नेताओं में नाथूलाल जैन ,सुशील कुमार त्यागी, सीताशरण देवलिया, रमेश, अनिल, इंद्र दत्त, स्वाधीन पंडित ब्रज सुंदर शर्मा, रामचंद्र सक्सेना आदि अनेक नवयुवक छात्र राष्ट्र सेवा के क्षेत्र में पथिक जी के प्रभाव से उतरे। जिन्हें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप। से श्री विजय सिंह पथिक और केसरी सिंह बारहठ के अनुपम त्याग और बलिदान से प्रेरणा मिलती रही।
किस प्रकार विजय सिंह पथिक का भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन में विशेष और महत्वपूर्ण स्थान है ।
पथिक जी ने न केवल गांधी जी का मार्गदर्शन किया, बल्कि अन्य अनेक नेताओं का निर्माण कर उन्हें भी देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ने की प्रेरणा दी ।उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर अनेकों लोगों ने अब जाकर शोध करना आरंभ किया है, तब इस महान व्यक्तित्व का नाम हमारे देश के लोगों के संज्ञान में आना आरंभ हुआ है ।जिन लोगों ने गांधीवाद से प्रेरित होकर केवल और केवल गांधी जी के इर्द-गिर्द। सारी आजादी की लड़ाई को घुमाने का अपराध किया और इतिहास को छुपाया उन्हीं लोगों ने पथिक जी जैसे महान क्रांतिकारी नेताओं को इतिहास की पुस्तकों से बाहर फेंकने का पाप भी किया है।
पथिक जी का चिंतन पूर्णतया राष्ट्रवादी और देशभक्ति पूर्ण था ।उन्होंने देश के लिए त्याग और तपस्या के जीवन को अपनाया और इसी प्रकार के अनेकों साधकों को मां भारती की सेवा में सोपकर देश की अनुपम सेवा की। यह एक गौरवपूर्ण तथ्य है कि अंग्रेजों के लिए पथिक जी जैसे क्रांतिकारियों को क्रांतिकारी आंदोलन ही हमेशा सिर दर्द बना रहा कांग्रेस का नरम पंथी आंदोलन अंग्रेजों के लिए कभी भी चिंता का विषय नहीं था।
पथिक जी का गृहस्थ जीवन एवं कुछ अन्य तथ्य

वर्ष 1930 में पथिक जी ने 48 वर्ष की आयु में एक विधवा अध्यापिका से विवाह किया ।परंतु 1 माह बाद फिर गिरफ्तार कर लिए गए ।उनकी पत्नी जानकी देवी ने ट्यूशन पढ़ा पढ़ा कर अपने घर का खर्चा चलाया। वर्ष 1954 में अपनी मृत्यु से पूर्व उन्होंने दुख जताया था कि मैं राजस्थान सेवा आश्रम को ज्यादा दिनों तक नहीं चला पाया। और यह मिशन उनका अधूरा रह गया।
जीवन पर्यंत पथिक जी देश सेवा में लगे रहे ।भारत माता का यह सपूत 28 मई 1954 को चिर निद्रा में सो गया ।उनकी मृत्यु के समय कोई संपत्ति, मकान, धन, दौलत, बैंक बैलेंस उनके नाम नहीं था ।जबकि कई कई मंत्री उनके शिष्य थे। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री शिवचरण माथुर ने पथिक जी को राजस्थान की जागृति के अग्रदूत एवं महान क्रांतिकारी सत्याग्रह करने वाला माना है, क्रांतिकारी के रूप में प्रतिष्ठित किया। इतिहासकारों ने बिजोलिया आंदोलन को देश का पहला किसान सत्याग्रह माना है पथिक जी की निम्न पंक्तियां बहुत ही लोकप्रिय हैं।
यश वैभव सुख की चाह नहीं ,
परवाह नहीं जीवन न रहे।
यदि इच्छा है तो यह है ,
जग में स्वेच्छा चार दमन न रहे।
हमें इस बात पर गर्व है कि हम ऐसे महान देशभक्तों के, स्वतंत्रता सेनानियों के, अमर बलिदानियो के उत्तराधिकारी एवं वंशज हैं।

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
betnano giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpas giriş
betorder giriş
betnano giriş
betnano giriş
mariobet giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
betnano giriş
betper giriş
rekorbet giriş
betnano giriş
betticket giriş
betnano giriş
betper giriş
savoybetting giriş
grandpashabet giriş
jojobet giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vaycasino
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpas giriş
betpas giriş
betorder giriş
betorder giriş
betpas giriş
betpas giriş
betorder giriş
betorder giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
betnano giriş
restbet giriş
safirbet giriş
betnano giriş
restbet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
sonbahis giriş
betgaranti giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
pumabet giriş
betpas giriş
betpas giriş
betnano giriş