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राजद्रोह कानून और अनसुलझे सवाल

हितेश शंकर

“राजद्रोह कानून के मामले पर एक बार फिर चर्चा गर्म है। केन्द्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय से कहा है कि­ वह वर्तमान राजद्रोह कानून की समीक्षा के लिए तैयार है।”

राजद्रोह कानून के मामले पर एक बार फिर चर्चा गर्म है। केन्द्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय से कहा है कि­ वह वर्तमान राजद्रोह कानून की समीक्षा के लिए तैयार है। सरकार के इस रुख पर सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जब तक सरकार इस कानून के भविष्य पर फैसला नहीं करती, तब तक इसे रद्द रखा जाएगा और इसके आरोपी भी जमानत याचिका दायर कर सकते हैं।

राजद्रोह कानून के मामले पर एक बार फिर चर्चा गर्म है। केन्द्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय से कहा है कि­ वह वर्तमान राजद्रोह कानून की समीक्षा के लिए तैयार है। सरकार के इस रुख पर सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जब तक सरकार इस कानून के भविष्य पर फैसला नहीं करती, तब तक इसे रद्द रखा जाएगा और इसके आरोपी भी जमानत याचिका दायर कर सकते हैं। इस मुद्दे पर न्यायपालिका और केन्द्र सरकार जिस तरह आमने-सामने आई हैं, उसके बाद इस कानून के औचित्य और इससे जुड़े अलग-अलग पहलुओं पर सवाल खड़े होने लगे हैं।
बात यह है कि यह कोई एक-दो दिन की सुर्खियों तक सीमित रह जाने वाला मुद्दा नहीं है। यह एक बड़ा और जटिल मुद्दा है। देश में वर्तमान स्थिति में आंदोलनजीवी इस मुद्दे को भी खास रंग देकर गरमाना चाहते हैं। परंतु उन्हें समझना पड़ेगा कि ये बहस पुरानी है और बढ़ने वाली है।
सात सदस्यीय बेंच बनाम तीन सदस्यीय बेंच
पहली बात यह है कि राजद्रोह के मसले पर आदेश सर्वोच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय बेंच ने जारी किया है। इस बेंच के संज्ञान में राजद्रोह कानून के मामले में सबसे ज्यादा स्पष्ट रुख रखने वाला सर्वोच्च न्यायालय का वह पूर्व फैसला होना चाहिए जो उसने 20 जनवरी, 1962 को केदारनाथ बनाम बिहार राज्य में दिया था। वामपंथी केदारनाथ सिंह का मामला तत्कालीन ‘कांग्रेस’ राज के खिलाफ हल्लाबोल से जुड़ा था।
तब धारा 124ए के अपने विश्लेषण में, केदारनाथ सिंह बनाम बिहार मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने पहली बार उल्लेख किया कि कानून द्वारा स्थापित सरकार यह शब्द उस समय के लिए प्रशासन को चलाने में लगे हुए ‘व्यक्ति’ मात्र तक सीमित नहीं था, बल्कि सरकार को संदर्भित किया गया था। यानी राज्य- शासन का जीवंत प्रतीक।
तब न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राजद्रोह राज्य के खिलाफ अपराध था और इसका उद्देश्य राज्य के अस्तित्व की रक्षा करना था। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से माना है कि राजद्रोह कानून का उद्देश्य विधि द्वारा स्थापित सरकार को उलटने से रोकना है क्योंकि ‘कानून द्वारा स्थापित सरकार का निरंतर अस्तित्व राज्य की स्थिरता की एक आवश्यक शर्त है’। न्यायालय ने माना कि भारतीय दंड संहिता की धारा 124अ, जो राजद्रोह को अपराध बनाती है, संवैधानिक रूप से वैध है। हालांकि भाषण और अभिव्यक्ति की मौलिक स्वतंत्रता है किंतु जब प्रतिबंध सार्वजनिक व्यवस्था के हित में हों और मौलिक अधिकार के साथ अनुमेय विधायी हस्तक्षेप के दायरे में हों तो पर प्रतिबंध लग सकते हैं।
ध्यान दीजिए, केदारनाथ मामले में 7 न्यायाधीशों की पीठ थी। जबकि सर्वोच्च न्यायालय का नया आदेश 3 न्यायाधीशों की पीठ का है। कायदे से 7 सदस्यीय पीठ के कथन के आगे यदि कोई टिप्पणी करनी है तो कम से कम 9 न्यायाधीशों की पीठ होनी चाहिए। वरना सर्वोच्च न्यायालय पर ही सवाल उठने लगते हैं। और, आजकल तकनीक के दौर में शासन के सभी अंगों को उस स्थिति से बचना चाहिए कि वे सामाजिक आक्षेप का कहीं से भी कारण बनें।

राजद्रोह से जुड़े इस प्रकार के कानून अभी ईरान, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, सऊदी अरब, मलेशिया एवं अन्य देशों में भी हैं। इसलिए यह कहना कि भारत में कोई विचित्र या अनोखी स्थिति है और लोकतंत्र को सांस नहीं मिल रही, मनगढंत बातें हैं। दरअसल एक कोटरी है जो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र पर सवाल उठाती है और अराजकता को लगातार बढ़ावा देना चाहती है।

कानून की कड़ियां और ललकारते हिंसक आंदोलन
दूसरा मुद्दा बदलते सामाजिक परिवेश और भारत विरोधी शक्तियों की लामबंदी से जुड़ा है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस कानून को फिलहाल टालने के आदेश में कहा कि राजद्रोह कानून की जो कठोरता है, वह मौजूदा सामाजिक परिवेश के अनुसार नहीं है, इसलिए समीक्षा होने तक इस कानून को रोक रहे हैं। ये आयाम ठीक भी है। किंतु यह नहीं भूला जा सकता कि शीर्ष अदालत ने केदारनाथ प्रकरण में कहा था कि

कानून-व्यवस्था में व्यवधान व हिंसा को बढ़ावा देने

स्थापित शासन को हिंसक तौर तरीकों से अस्थिर करने वाले मामलों में राजद्रोह कानून का इस्तेमाल हो सकता है।
अब बदलते सामाजिक परिवेश के संदर्भ में- भारत विरोधी ताकतों की बौखलाहट और सामाजिक व्यवस्थाओं को बाधित करने, सरकार को हिंसक तरीके से ललकारने वाले घटनाक्रम देखिए : सीएए आंदोलन को याद करें, जब राजधानी को लगभग बंधक बना दिया गया, सालभर लोगों के रास्ते बाधित कर दिए गए, देश के पूर्वोत्तर को मुस्लिम बहुलता के आधार पर खास तरीके से काटने की बातें जनांदोलन की आड़ में की गईं, और इसके लिए वर्ग विशेष को आक्रोशित करने का प्रयास किया गया। इसे हम किस श्रेणी में रखेंगे। दूसरे, किसान आंदोलन के नाम पर पूरी राजधानी की घेराबंदी की गई, 1 वर्ष तक राष्ट्रीय राजमार्ग को बंधक बनाया गया। भारतीय राज्य सत्ता के प्रतीक लालकिले पर राष्ट्रध्वज उतार फेंकने के लिए हिंसक चढ़ाई हुई, और जिस तरह अराजक तत्वों के हाथ में पूरा आंदोलन रहा, एक आदमी की सड़क पर हत्या कर दी गई, महिलाओं से बलात्कार हुआ, क्या यह जनव्यवस्था और सत्ता के लिए खतरे नहीं हैं?
परिवेश में बदलाव की बात करें तो अब एक परिवेश रचा जा रहा है, जिसमें तकनीक के माध्यम से कुछ खास वर्गों को उकसा कर, सड़कों पर लाकर ‘लोक’ को ‘तंत्र’ के विरुद्ध खड़ा करने का खेल चल रहा है. नए सामाजिक परिवेश में राजद्रोह के नए पैंतरों और तकनीकी तिकड़मों का भी संज्ञान लेना होगा। आज हिंसक तौर-तरीकों में हथियार क्या है ? जो काम पहले डेटोनेटर करता था आज वह काम डाटा से हो जाता है।
एकांतिक डाटा से भ्रम का प्रसार
तीसरी बात यह है कि तर्क दिया जा रहा है कि अचानक यह कानून राजनीतिक औजार बन गया है। कुछ लोग ऐसा स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। वे खासकर 2014 के बाद इसके तहत दर्ज मामलों की संख्या का उदाहरण देते हैं। और जब ऐसा कहा जाता है तो यह लोगों को भ्रमित करने का प्रयास है। इसे सीधे-सीधे लोगों को झांसे में डालने वाली बात के तौर पर देखना चाहिए। तथ्य यह है कि नेशनल क्राइम ब्यूरो ने 2014 से ही इसका डेटा दर्ज करना शुरू किया है। इससे पहले राजद्रोह से जुड़े मामलों का डेटा दर्ज ही नहीं किया जाता था। इसमें अगर थोड़ी और गहराई से जाएं तो कुछ और बात भी निकलती है।
 
प्रश्न सिर्फ एक कानून में फेरबदल का नहीं है, प्रश्न यह है कि क्या हम इतने बड़े स्तर पर बदलावों के लिए राजनीतिक और सामाजिक रूप से सहमत और एकजुट हैं? क्या हम न्यायपालिका की दीवारों से बाहर, देश की सबसे बड़ी पंचायत में, शहरी गली, मोहल्लों से लेकर गांव की चौपालों तक न्याय तंत्र में आमूलचूल बदलाव के लिए, एक बड़ी बहस के लिए तैयार हैं?

चौथी बात यह कही जाती है कि इसमें दोष सिद्धि कम है यानी लोगों को इसमें फंसा दिया जाता है। भारत में राजद्रोह कानून के आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं। कई लोगों का मानना है कि सरकारें राजद्रोह कानून का गलत इस्तेमाल करती हैं। इसे लेकर लोकसभा में रखे गए एक आंकड़े के मुताबिक, देश में साल 2014 से 2020 तक कुल 399 राजद्रोह के मामले लगाए गए। लेकिन आरोपपत्र से न्यायालय तक आते-आते ये केवल 125 यानी करीब एक तिहाई रह गए। वहीं अपराध सिद्ध होने तक राजद्रोह के केवल 8 मामले ही बचे। किंतु कानून को रद्द करने का आधार बनाने की दृष्टि से यह तर्क बहुत लचर है कि फलां कानून में दोष सिद्धि की दर बहुत कम है। जब इस बात को आधार बनाते हैं तो कई और कानूनों पर भी सवाल उठने लगते हैं। जैसे दहेज उत्पीड़न के मामले हैं, उनमें दोषसिद्धि की दर बहुत कम होती है। एससी-एसटी के मामले हैं, इसमें भी दोषसिद्धि दर बहुत कम होती है। मगर दोषसिद्धि की दर कम होने से क्या इन सभी कानूनों को रद्द कर देंगे? यह एक बड़ी बहस को न्योता देने वाली बात है।
भाजपा शासन और राजद्रोह
पांचवीं बात यह है कि इस मसले में दर्ज मामलों को भाजपा सरकारों द्वारा रचित या प्रेरित बताने का प्रयास किया जा रहा है। यदि दर्ज मामलों का विस्तार देखें तो 2010 के बाद बिहार में 171 मामले दर्ज हुए हैं, दूसरे स्थान पर 143 मामलों के साथ तमिलनाडु है। तीसरे स्थान पर 127 मामलों के साथ उत्तर प्रदेश और चौथे पर 64 मामलों के साथ झारखंड आता है। सबसे ज्यादा 4641 आरोपी झारखंड में बनाए गए। वहीं, तमिलनाडु में 3601, बिहार में 1608, उत्तर प्रदेश में 1383 आरोपी बनाए गए। यानी झारखंड और तमिलनाडु जैसे गैर भाजपा शासित राज्य जो आकार और जनसंख्या की दृष्टि से उत्तर प्रदेश से बहुत छोटे हैं, इस कानून को आजमाने में भाजपा शासित राज्यों से कहीं आगे हैं। इसलिए अगर इस अवधि में दर्ज कुल मामलों को किसी एक राजनीतिक दल का औजार बताने की कोशिश करेंगे, तब भी तर्क थोथा ही बैठेगा।
क्या सिर्फ भारत में है कानून?
इस कानून का जिक्र आईपीसी की धारा 124ए में आता है। यह कानून 1870 में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अंग्रेजों के समय अमल में आया था। इसका विरोध लंबे समय से होता रहा है। परंतु क्या ऐसा कानून सिर्फ भारत में है? और क्या अंग्रेजों के समय का होने के कारण किसी कानून को रद्द कर देना चाहिए। निश्चित ही जो कानून अप्रासंगिक हो गए हैं, उन्हें रद्द करना चाहिए, जिनमें परिवर्तन की आवश्यकता है, उनमें परिवर्तन करना चाहिए। किंतु जब लोग एक पक्षीय तर्क देते हैं कि इस कानून के नाम पर भारत में बड़ी ज्यादती हो रही है तो याद रखिए कि लोकतंत्र एक व्यवस्था के तहत ही काम करता है। और, ये बात पूरी दुनिया स्वीकार करती है। राजद्रोह से जुड़े इस प्रकार के कानून अभी ईरान, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, सऊदी अरब, मलेशिया एवं अन्य देशों में भी हैं। इसलिए यह कहना कि भारत में कोई विचित्र या अनोखी स्थिति है और लोकतंत्र को सांस नहीं मिल रही, मनगढंत बातें हैं। दरअसल एक कोटरी है जो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र पर सवाल उठाती है और अराजकता को लगातार बढ़ावा देना चाहती है।
औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति की राह
छठी बात, अभी न्यायपालिका की ओर से यह टिप्पणी भी आई कि राजद्रोह कानून की कठोरता मौजूदा सामाजिक परिवेश के अनुसार नहीं है, इसलिए समीक्षा होने तक कानून पर रोक रहेगी। देश में नागरिकों की सुरक्षा और नागरिकों की स्वतंत्रता इन दोनों में संतुलन आवश्यक है।
गौर कीजिए, हाल ही में भारत के विधि आयोग ने भी राजद्रोह के परामर्श पत्र, 2018 में, राष्ट्रीय अखंडता की रक्षा करने की आवश्यकता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, असहमति और नीतिगत मुद्दों की आलोचना के संबंध में दस महत्वपूर्ण बिंदु सुझाए हैं।
राजद्रोह कानून का उल्लेख करते हुए बार-बार ‘औपनिवेशिक बोझ’ होने की बात कही जा रही है। न्यायपालिका तंत्र और इससे जुड़ते गलियारों में यह बात बार-बार उठ रही है कि भविष्य की राह पर हम औपनिवेशित बोझ के साथ नहीं चल सकते। यह बहुत अच्छी बात है। भारत में इसका स्वागत होना चाहिए कि न्यायपालिका इस बारे में सोच रही है। कानूनों में ही नहीं, वास्तव में आचार, व्यवहार और फैसलों, हर जगह यह भावना होनी चाहिए। जब लोग न्यायपलिका में जजों, अधिवक्ताओं को जून-जुलाई की गर्मी में काले कोट पहने हुए देखते हैं, तो इस शाश्वत औपनिवेशिक बोझ का अनुभव करते हैं। जब जनता के हाथ में फैसले आते हैं, जो उनकी भाषा में नहीं होते, जिसे वे समझ नहीं सकते, सिर्फ न्यायपालिका से जुड़े हुए लोग ही समझ सकते हैं तो वे इस औपनिवेशिक बोझ को महसूस करते हैं। औपनिवेशिक बोझ को अगर हमें खत्म करना है तो न्यायपालिका को आंतरिक बदलाव भी लाने पड़ेंगे। समाजहित में सामाजिक परिवेश के अनुरूप कानूनों को भी बदलना पड़ेगा और न्यायपालिका को गहरे आंतरिक बदलावों से भी गुजरना पड़ेगा।
किंतु बात फिर वही है। प्रश्न सिर्फ एक कानून में फेरबदल का नहीं है, प्रश्न यह है कि क्या हम इतने बड़े स्तर पर बदलावों के लिए राजनीतिक और सामाजिक रूप से सहमत और एकजुट हैं? क्या हम न्यायपालिका की दीवारों से बाहर, देश की सबसे बड़ी पंचायत में, शहरी गली, मोहल्लों से लेकर गांव की चौपालों तक न्याय तंत्र में आमूलचूल बदलाव के लिए, एक बड़ी बहस के लिए तैयार हैं?

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