क्या आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा दक्षिण में भी गाड़ सकेगी अपना झंडा

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पूनम पाण्डे 

उत्तर भारत में लगभग सब जगह अपनी मजबूत पकड़ बना चुकी बीजेपी की निगाहें पिछले काफी समय से दक्षिण भारत पर टिकी हैं। बीजेपी के मिशन 2024 के लिए दक्षिण भारत काफी अहम है। दक्षिण भारत के पांच राज्यों आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना, केरल और कर्नाटक से कुल मिलाकर लोकसभा की 129 सीटें आती हैं। बीजेपी को अगर केंद्र की सत्ता में बने रहना है तो उसे दक्षिण भारत में अपनी सीटों की संख्या बढ़ाने पर फोकस करना होगा, जो बीजेपी कर भी रही है। केरल में लोकसभा की 20 सीटें हैं। 2019 के चुनाव में कांग्रेस ने केरल से 15 सीटें जीतीं। 2 सीट मुस्लिम लीग, 1 सीपीएम, 1 केसीएम और 1 आरएसपी को मिली। जब कांग्रेस सब जगह कमजोर थी, केरल में उसे अच्छी सीटें मिलीं। बीजेपी का मानना कि 2024 में यह स्थिति नहीं होगी, क्योंकि बीजेपी को अब वहां लोग विकल्प के तौर पर देखना शुरू कर रहे हैं।

वैसे तो केरल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ काफी सालों से एक्टिव है, लेकिन बीजेपी को यहां सफलता नहीं मिल पाई। पिछली विधानसभा में केरल में बीजेपी की एक सीट थी, लेकिन इस विधानसभा में बीजेपी को एक भी सीट नहीं मिल पाई। केरल में लेफ्ट की मजबूत पकड़ है। मुकाबला लेफ्ट और कांग्रेस के बीच रहता है। लेकिन बीजेपी को उम्मीद है कि कांग्रेस जिस तरह हर जगह से खत्म होती जा रही है, उसी तरह केरल में भी आधार खो देगी। कुछ समय बाद बीजेपी ही लेफ्ट के सामने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी बनेगी। बीजेपी का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी पिछले साल जी-20 समिट में जब पोप से मिले थे, तब क्रिश्चियन समुदाय में इसका अच्छा संदेश गया था। केरल में 20 पर्सेंट आबादी क्रिश्चन है। हाल ही में केरल में एक क्रिश्चन लड़की की मुस्लिम युवक से शादी का मामला उठा। इस पर बीजेपी ने कहा कि लव जिहाद का मसला सिर्फ हिंदू के लिए ही नहीं, क्रिश्चियन के लिए भी बड़ा इश्यू है। बीजेपी यहां क्रिश्चियन समुदाय में अपनी पकड़ बनाने की कोशिश कर रही है।
कर्नाटक से तमिलनाडु तक
कर्नाटक में लोकसभा की 28 सीटें हैं जिनमें से पिछले चुनाव में बीजेपी ने 25 सीटों पर जीत दर्ज की थी। बीजेपी के लिए यहां अपने प्रदर्शन को बरकरार रखने की चुनौती है। कर्नाटक में अगले साल विधानसभा चुनाव भी हैं। बीजेपी के येदियुरप्पा यहां लिंगायत समुदाय के सबसे बड़े नेता हैं। बीजेपी ने कुछ महीने पहले उन्हें हटाकर यहां बसवराज बोम्मई को सीएम बनाया। हालांकि वह भी इसी समुदाय से आते हैं। यहां 17 पर्सेंट आबादी लिंगायत समुदाय की है। इसलिए बीजेपी येदियुरप्पा को नाराज नहीं करना चाहती। दूसरी ओर कर्नाटक में बीजेपी गुटबाजी से भी जूझ रही है, सरकार पर लगातार भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं। बीजेपी को इस स्थिति से निकलते हुए यहां अपनी इमेज सुधारनी होगी।
तमिलनाडु में 2021 विधानसभा चुनाव में एआईएडीएमके के साथ सीट शेयरिंग कर बीजेपी ने चार सीटें जीतीं। उसके बाद हुए लोकल बॉडी में बीजेपी ने उससे बेहतर प्रदर्शन किया। तमिलनाडु में बीजेपी का कैडर नहीं है और बीजेपी इसे तैयार करने की कोशिश में जुटी है। यहां लोकसभा की 39 सीटें हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में डीएमके की अगुआई में यूपीए ने 38 सीटें जीतीं। महज एक सीट एआईएडीएमके के खाते में आई। यहां बीजेपी ने एआईएडीएमके साथ गठबंधन किया था और पांच सीटों पर चुनाव लड़ी थी। बीजेपी के मिशन 2024 के लिए तमिलनाडु इसलिए अहम है क्योंकि यहां बीजेपी अभी जीरो ही है। उसके लिए तमिलनाडु चैलेंजिंग भी है क्योंकि बीजेपी को यहां उत्तर भारत की पार्टी के तौर पर देखा जाता है, साथ ही उसकी इमेज हिंदुत्ववादी पार्टी की है, जिसमें ज्यादातर ब्राह्मण हैं। साथ ही बीजेपी पर यह भी आरोप लगता रहता है कि वह सब पर हिंदी थोपने की कोशिश कर रही है। बीजेपी को तमिलनाडु में अगर अपनी जगह बनानी है तो उसे यहां के लोगों से इमोशनली कनेक्ट होना होगा और हिंदुत्ववादी पार्टी के साथ ही हिंदी थोपने की कोशिश वाली इमेज से बाहर निकलना होगा।
आंध्र और तेलंगाना का टेस्ट
तेलंगाना में लोकसभा की 17 सीटें हैं। 2019 लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने यहां चार सीटें जीतीं। 9 सीटें टीआरएस, 3 कांग्रेस और एक सीट एआईएमआईएम को मिली। बीजेपी यहां इस कोशिश में है कि वह टीआरएस के विकल्प के तौर पर खुद को स्थापित कर पाए, और अभी जो जगह कांग्रेस ने ली है उस पर खुद आ सके। तेलंगाना से बीजेपी इसलिए भी उम्मीद कर रही है कि वह दो सीटों पर उपचुनाव जीती है। तेलंगाना में करीब 50 पर्सेंट ओबीसी हैं। लेकिन सत्ता में ज्यादातर अपर कास्ट को प्रतिनिधित्व मिल रहा है। बीजेपी यहां ओबीसी लीडरशिप को आगे कर रही है। मौजूदा सीएम केसीआर खुद अपर कास्ट से हैं। वह जिस वेलामा कम्युनिटी से आते हैं उसकी आबादी तेलंगाना में करीब 2 पर्सेंट है। यहां दूसरी पावरफुल कम्युनिटी रेड्डी है जो कांग्रेस के साथ मानी जाती है। अगले साल तेलंगाना में भी विधानसभा चुनाव हैं। यह चुनाव 2024 के लिए बीजेपी की तैयारियां का लिटमस टेस्ट हो सकता है।
दशकों तक कांग्रेस का गढ़ रहे आंध्र प्रदेश में बीजेपी को टीडीपी और वाईएसआरसीपी दोनों से मुकाबला करना है। जब टीडीपी बनी तो उसने कांग्रेस को चुनौती दी थी और जब वाईएसआरसीपी बनी तो कांग्रेस की जगह बहुत सिमट गई। कांग्रेस को यहां सभी कास्ट की पार्टी माना जाता है लेकिन रेड्डी का दबदबा ज्यादा है। जब एनटी रामाराव की स्टार अपील के साथ टीडीपी सत्ता में आई तब उन्होंने भी सोशल इंजीनियरिंग की। टीडीपी में कम्मा समुदाय के लोगों का दबदबा ज्यादा है और कांग्रेस की तरह ही वाईएसआरसीपी में रेड्डी का दबदबा है। 2014 में जब आंध्र प्रदेश और तेलंगाना अलग हुए तब कांग्रेस के खिलाफ माहौल बना। लेकिन फिर स्पेशल स्टेट्स के मसले पर बीजेपी के खिलाफ भी लोगों की नाराजगी दिखी। 2019 में बीजेपी का आंध्र प्रदेश में बहुत खराब प्रदर्शन रहा। हालांकि बीजेपी मान रही है कि 2019 के बाद यहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इमेज सुधरी है। कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने और फिर कोरोना मैनेजमेंट की वजह से इमेज मजबूत हुई। बीजेपी यहां लोगों को बता रही है कि जिस तरह टीडीपी करप्ट थी उसी तरह यह वाईएसआरसीपी भी करप्ट है, बस दोनों का स्टाइल ऑफ करप्शन अलग है। अभी वाईएसआरसीपी सत्ता में है तो जाहिर तौर पर सीधा निशाना वही है। बीजेपी यहां चुनावी मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश में है। आंध्र प्रदेश में लोकसभा की 25 सीटें हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में वाईएसआरसीपी ने इसमें से 22 सीटें जीत लीं। तीन सीटें टीडीपी को मिल पाईं।

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