“मौलिक रचना ऋग्वेद काव्यार्थ का प्रथम भाग प्रकाशित”

ओ३म्
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ऋग्वेद और अन्य तीन यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद संसार का आदि ज्ञान एवं विश्व की प्राचीनतम पुस्तकें हैं। चारों वेद ईश्वर से प्रादुर्भूत हुए हैं। वेदों की भाषा संस्कृत है जिसके शब्द रूढ़ न होकर नित्य एवं यौगिक हैं। वेद के पदों का अर्थ अष्टाध्यायी महाभाष्य तथा निरुक्त पद्धति से किया जाता है। लौकिक सस्कृत व्याकरण से वेद के सभी मन्त्रों का सत्यार्थ नहीं किया जा सकता। ऋषि दयानन्द ने वेदों के यथार्थ अर्थ करने की पद्धति हमें प्रदान की है। उन्होंने वेदार्थ पद्धति से ऋग्वेद का आंशिक तथा यजुर्वेद का पूर्ण भाष्य भी किया है। उनका वेदार्थ आदर्श एवं अपूर्व है। ऋषि के बाद वेदों का प्रचार करने के लिए ऋषि के अनुयायी वैदिक विद्वानों ने वेदों पर संस्कृत एवं हिन्दी में भाष्य वा टीकायें लिखी हैं। अंग्रेजी में वेदों का अनुवाद व टीका भी प्रकाशित हुई है। चार वेद संस्कृत में काव्यरचना में रचे गये हैं। कविता में किसी बात को कहने का प्रभाव गद्य की तुलना में अधिक होता है। कविता की रचना करना सभी विद्वानों के लिए सम्भव नहीं होता। ईश्वर प्रदत्त काव्य रचना की प्रतिभा से युक्त समाज में कुछ लोग ही कविताओं की रचना कर सकते हैं। हमारे रामायण एवं महाभारत ग्रन्थ भी संस्कृत काव्य रचनायें ही हैं। श्री वीरेन्द्र कुमार राजपूत, मुरादाबाद ऋषि दयानन्द सहित वैदिक धर्म एवं संस्कृति के लिए समर्पित आर्य-कवि एवं विद्वान हैं। उनको प्रेरणा हुई की वह चारों वेदों पर काव्यार्थ की रचना करें। उन्होंने इस प्रेरणा को साकार रूप देते हुए वेदों पर काव्यार्थ रचना का कार्य किया जिसका परिणाम यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद पर काव्यार्थ रचना का कार्य पूर्ण होकर प्रकाशित हो चुका है। वर्तमान में आर्यकवि वीरेन्द्र जी ऋग्वेद पर काव्य रचना के कार्य में प्रवृत्त हैं। ऋग्वेद काव्यार्थ का प्रथम दशांश वह पूरा कर चुके हैं जिसका प्रकाशन हो चुका है। आगामी 15 मई, 2022 को इस ऋग्वेद काव्यार्थ दशांश का लोकार्पण वैदिक साधन आश्रम तपोवन, देहरादून के ग्रीष्मोत्सव के समापन समारोह के अवसर पर हो रहा है। विद्वान आर्य कवि ने वेदों पर काव्यार्थ का जो कार्य वा तप किया है, उसके लिए वह आर्यजगत् की ओर से धन्यवाद एवं आदर के पात्र हैं। ऋग्वेद काव्यार्थ प्रथम दशांश पुस्तक का परिचय हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं।

ऋग्वेद काव्यार्थ प्रथम दशांश में प्रथम मण्डल के 1149 मन्त्रों का काव्यार्थ प्रस्तुत किया गया है। अधिकांश मन्त्रों का काव्यार्थ दोहों में प्रस्तुत किया गया है। कुछ मन्त्रों का काव्यार्थ कवित्त में भी प्रस्तुत किया गया है। इस ऋग्वेद प्रथम दशांश के काव्यार्थ की प्रकाशिका श्रीमती प्रतिभा सिंह राजपूत, देहरादून हैं। प्रतिभा जी कवि वीरेन्द्र जी की सुपुत्री हैं। ग्रन्थ का प्रकाशन डा. अशोक कुमार आर्य, आर्यावर्त प्रिंटर्स, अमरोहा से हुआ है। पुस्तक को निम्न स्थानों से प्राप्त किया जा सकता है।

1- श्रीमती प्रतिभा सिंह राजपूत, 326/13, मोहित नगर, देहरादून (उत्तराखण्ड)-248006, मोबाइल न. 9656607695

2- आर्यावर्त प्रकाशन, सौम्या सदन, गोकुल विहार, अमरोहा (उ.प्र.)-244221, मोबाइल फोन न. 9412139333

3- वैदिक साधन आश्रम तपोवन, नालापानी रोड, देहरादून। सम्पर्क नं. 9412051586।

पुस्तक का मूल्य 200 रुपये हैं। पुस्तक में कुल 400 पृष्ठ हैं। पुस्तक में जिन प्रथम 1149 मन्त्रों का काव्यार्थ प्रस्तुत किया गया है उन सभी मन्त्रों के सूक्तों एवं सूक्तान्तर्गत मन्त्र संख्या का एक विवरण तालिका भी पुस्तक के आरम्भ में दी गई है। इससे विदित होता है कि इस काव्यार्थ में ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के 107 सूक्तों के 1149 सम्मिलित किये गये हैं।

प्रकाशकीय में श्रीमती प्रतिभा सिंह जी ने बतया है कि भूमण्डल के समस्त प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ मनुष्य है। भगवान ने उसी को विकसित बुद्धि प्रदान की है। उसे अपनी तथा मानव समाज की उन्नति करने के लिये वेद ज्ञान दिया है। यह वेद हमारी अमूल्य धरोहर हैं। उस अमूल्य धरोहर वेद का महत्व अपना अलग ही है।

घृणा, द्वेष अरु, भेदभाव की बात न वेद बताता,
खुशियों का भण्डार रहा, उन्नति की राह दिखाता,
भव सागर में डूब रहे का करता बेड़ा पार।
सदा भ्रान्ति से दूर, सत्य का ज्ञान वेद में पाते,
सृष्टि-नियम अनुकूल बात केवल है वेद बताते,
ये तो हैं प्राचीन बड़े ही, करते सब स्वीकार।
वैज्ञानिक उन्नति जितनी है, वेदों से है आयी,
क्या उसका उपयोग करें, यह देता नहीं दिखायी,
इसी पीड़ा का एक मात्र है वेदों में उपचार।

ऐसा यह महत्वपूर्ण वेद भारतीय सस्कृति का मूल है। इसी वेद ने भारत को विश्व-गुरु का दर्जा दिया, पथ-प्रदर्शक बनाया। इसी वेद को अग्रेजों ने अपने राजनैतिक स्वार्थ के कारण तथा ईसाई धर्म का भारत में प्रचार-प्रसार करने के कारण मैक्समूलर सरीखे स्वनामधन्य विद्वानों द्वारा गडरियों का गीत कह कर प्रचारित किया। अंग्रेजी शासन के काल में, परम देशभक्त महर्षि दयानन्द ही वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने हमें वेदों के सच्चे स्वरूप का बोध कराया। प्रस्तुत ऋग्वेद काव्यार्थ उन सामान्य जागरुक लोगों को वेद भक्त बनाने के लिये है जो नहीं जानते कि वेद में क्या है।

प्रस्तुत काव्यार्थ के रचयिता, चारों वेदों के प्रत्येक मन्त्र का हिन्दी कविता में अर्थ करने का प्रण करके, तीन वेदों का काव्यार्थ कर तथा उसे प्रकाशित कर, अंतिम ऋग्वेद का काव्यार्थ करने वाले, वैदिक धर्म, मानवता और राष्ट्र के परम हितैषी कवि श्री वीरेन्द्र कुमार राजपूत जी हैं। उनके अनुसार इस कार्य को उन्होंने अपने एक अभिन्न मित्र के कहने पर, उसी के आदेश का पालन करते हुए किया है। उन्होंने (कवि में मित्र परमात्मा ने) उनसे कहा-

मेरा प्रभुवर है मेरा मित्र।
करता है वह मुझे सुगन्धित, बन गुलाब का इत्र।
उसने कहा मित्र मेरे, बात, कान धर सुन तू,
हिन्दी में सम्पूर्ण वेद के काव्यार्थ को कर तू,
यही काव्य तेरे लोगों का उज्जवल करे चरित्र।

उन्होंने अपने मित्र के बारे में यह भी बताया-

उसका कहा न मानूं, तो वह कान ऐठ देता है,
उसका कहा करुं तो अपनी बाहों में भर लेता है।
तथा प्यार के छींटे देकर करता मुझे पवित्र।

मैं उनकी साधारण पुत्री (प्रकाशकीय लेखिका) न होकर, प्राणों से प्रिय पुत्री रही हूं। मेरे विवाह के अवसर पर उन्होंने अपने मन की भावना निम्न प्रकार व्यक्त की थी।

विधि ने लगता कर डाला जादू-टोना
आया सपनों का राजकुमार सलोना,
उसका कुछ ऐसा रुप हृदय में पैठा,
अपने दिल के टुकड़े को मैं दे बैठा
हर्षित है मन, पर धीर नहीं पाता है,
सूना-सूना संसार नजर आता है,
अब ज्ञात हुआ, वो सत्य नहीं सपना था,
अपना धन समझा जिसे, नहीं अपना था।

मेरे मन ने मुझे प्रेरित किया और मजबूर किया कि उनकी इस अन्तिम कृति का प्रकाशन मैं करूं। ऐसे पवित्र ग्रन्थ का प्रकाशन करते हुए, आपके हाथों में सौंपते हुए मुझे अपार हर्ष का अनुभव हो रहा है। इस पवित्र ग्रन्थ ऋग्वेद काव्यार्थ को आप पढ़ें, आनन्दित हों और प्रेरित हों तथा अपने जीवन को सफल बनायें।

पुस्तक की भूमिका डा. बीना/डा. अशोक कुमार आर्य जी ने लिखी है। वह लिखते हैं कि कवि श्री वीरेन्द्र कुमार राजपूत एक ऐसे तपोनिष्ठ साधक, कर्मयोगी याज्ञिक व वेदानुरागी प्रखर कवि हैं, जिनका तन, मन, धन निष्काम रूप से वैश्विक कल्याण व सत्य सनातन वैदिक धर्म के प्रति समर्पित है। उन्होंने अपने काव्यात्मक सृजन से अनेक उत्कृष्ट कृतियों की संरचना की है। श्रद्धेय कवि वीरेन्द्र कुमार राजपूत जी ने चारों वेदों के काव्यार्थ का परम पुरुषार्थ किया है। अब तक उनके द्वारा विरचित यजुर्वेद (सम्पूर्ण काव्यार्थ – 4 भागों में), सामवेद (सम्पूर्ण काव्यार्थ 1 भाग में) एवं अथर्ववेद (सम्पूर्ण काव्यार्थ 4 भागों में) प्रकाशित किए जा चुके हैं।

उपर्युक्त क्रम में ही उनके द्वारा ऋग्वेद (प्रथम मण्डल) के काव्यार्थ का वन्दनीय एवं स्तुत्य कार्य किया गया है। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने आर्यसमाज के तीसरे नियम में कहा है कि ‘वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढ़ना-पढ़ाना तथा सुनना-सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है।’ वेद अनन्त ज्ञान के अक्षय भण्डार हैं। जहां वेदों का पठन-पाठन तथा श्रवण-वाचन परम धर्म कहा गया है वहीं इसका काव्यात्मक प्रस्तुतिकरण तो निश्चय ही, एक महानतम कार्य है। वास्तव में उनके द्वारा यह महान कार्य परमपिता परमात्मा की असीम अनुकम्पा से ही सम्भव हो सकता है।

आर्यसमाज तथा ऋषिवर दयानन्द के मिशन के प्रति समर्पित उच्च कोटि के कवि वीरेन्द्र राजपूत जी ने वेदमाता की सेवा करना अपना परम धर्म माना है। वे अपने पावन पुरुषार्थ से वह 82 वर्ष की आयु में भी वेदों के काव्यार्थ की दिशा में उद्यत हैं। निश्चय ही समाज के उदारमना महानुभावों तथा सामाजिक संस्थाओं को ऐसे कवि साधक को इनके प्रकाशनों को जन-जन तक पहुंचाने की दृष्टि से अर्थिक सहयोग रूपी आर्थिक आहुति प्रदान करनी चाहिए। ईश्वर से प्रार्थना है कि सहयोगी महानुभावों के पावन योगदान से प्रकाशन की यह ज्योति निरन्तर प्रज्जवलित होती रहे। सुधी व श्रद्धालु पाठको की सेवा में यह ग्रन्थ स्वाध्याय हेतु सादर प्रस्तुत है।

आर्य विद्वान सन्त विदेह योगी, कुरुक्षेत्र ने कवि वीरेन्द्र राजपूत जी के भागीरथ पुरुषार्थ के लिए उन्हें बधाई दी है। उन्होंने लिखा है कि श्री वीरेन्द्र कुमार राजपूत जी अपनी लघु लेखनी से वेदरूपी समुद्र को पार करने का प्रयास कर रहे हैं, और मुझे पूर्ण विश्वास है कि जैसे महाकवि कालिदास ने रघुवंश महाकाव्य की रचना पूर्ण कर ली थी, वैसे ही श्री राजपूत जी भी चारों वेदों के काव्यानुवाद को अवश्य ही पूर्ण करेंगे। यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद, इन तीन वेदों का काव्यानुवाद श्री राजपूत जी पूर्ण करके आर्य जनता को समर्पित कर चुके हैं। अब ऋग्वेद का काव्यानुवाद भी ये अवश्य ही पूर्ण कर लेंगे, क्योंकि परम कवि परमेश्वर ने अपने दिव्य काव्य वेद का लोकभाषा में काव्यानुवाद कराने हेतु वैदिक कवि श्री वीरेन्द्र कुमार राजपूत जी की नियुक्ति स्वयं की है। परमेश्वर ने ऐसे कवि का चयन किया है, जो पूर्णतया संकल्पित है वैदिक परम्परा को, ऋषि दयानन्द की परम्परा को, और जो व्यक्ति वैदिक परम्परा व ऋषि दयानन्द की परम्परा को संकल्पित और समर्पित हो, उसका संकल्प कभी कमजोर नहीं हो सकता। घर की परिस्थितियां कैसी भी हों, वे बाधा नहीं बन सकतीं। इसमें एक खास बात यह भी है कि इनकी धर्मपत्नी सुशीला जी का इस कार्य में विशेष सहयोग है। वे स्वयं एक प्रेरणा बनी हुई हैं। मैंने तो यह अनुभव किया है कि शरीर बहुत बाधा नहीं बनता, जब व्यक्ति का संकल्प सुदृण होता है।

मैं कविराट् श्री राजपूत जी के सम्बन्ध में क्या कहूं? बहुत ही सरल तथा मिलनसार स्वभाव के व्यक्ति हैं ये, और संकल्प के धनी हैं। लक्ष्य निश्चित करके उसकी ओर दौड़ पड़ते हैं। लक्ष्य प्राप्त करके ही दम लेते हैं, उससे पहले रुकने का कोई काम नहीं। मैं श्री वीरेन्द्र कुमार राजपूत जी को उनके भागीरथ पुरुषार्थ के लिये बधाई देता हूं और उनके कार्य करने की प्रबल इच्छा के लिये बधाई देता हूं। मैं पूर्ण विश्वास करता हूं कि ईश्वर ने इन्हें नियुक्त किया है, तो जहां इनकी नियुक्ति हुई है, जिस कार्य के लिये नियुक्ति हुई है, वे संकल्प के धनी हैं, इसलिये वे संकल्प को पूर्ण करके ही विश्राम करेंगे। आशा है वेद स्वध्यायशील-जन इस वेद काव्यानुवाद का रसास्वान कर ईशानन्द की प्राप्ति कर सकेंगे।

श्री विदेह योगी जी के शब्दों के बाद ऋग्वेद प्रथम मण्डल का काव्यार्थ आरम्भ होता है। हम यहां बानगी के रूप में ऋग्वेद के प्रथम मन्त्र ‘अग्निमीले पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्। होतारं रत्नाधातमम्।’ का काव्यार्थ प्रस्तुत कर रहे हैं:-

जग रचना के पूर्व से जो है वर्तमान।
मैं उसकी पूजा करुं, करुं प्रतिक्षण गान।।
यज्ञों का प्रकाश जो करे हमारे हेतु।
प्रति क्षण पूजा योग्य है जो मांगें वह देतु।।
जे प्रभु धारण किये हैं ग्रह उपग्रह सम रत्न।
उसको पाने हेतु मैं प्रतिक्षण करता यत्न।।

हमें श्री वीरेन्द्र राजपूत जी ने बताया है कि ऋग्वेद प्रथम मण्डल के 1149 मन्त्रों के काव्यार्थ की यह पुस्तक वैदिक साधन आश्रम तपोवन, देहरादून (मंत्री श्री प्रेमप्रकाश शर्मा मोबाइल नम्बर 9412051586) से आधे मूल्य अर्थात् 100 रुपये में प्राप्त की जा सकती है। वेद स्वाध्याय के इच्छुक काव्य प्रेमी बन्धु इस पुस्तक से लाभ उठाने के लिए पुस्तक प्राप्त कर साथ साथ कवि महोदय का उत्साहवर्धन भी कर सकते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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